Wednesday, March 14, 2012

देवास-एंट्रिक्स सौदे में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले जैसी मनमानी

महज 20 लाख रुपये की अधिकृत शेयर पूंजी पर 578.8 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश। न उपग्रह तैयार थे न सैटेलाइट मोबाइल फोन की तकनीक, लेकिन मॉरीशस से लेकर जर्मनी तक की कंपनियों को इक्विटी की बिक्री। देवास मल्टीमीडिया के इस खेल पर किसी को भी हैरत हो सकती है, पर सरकार को नहीं हुई। एंट्रिक्स से समझौते के बाद देवास ने छह साल में हैरतअंगेज रफ्तार और ऊंचे प्रीमियम पर इक्विटी बेची और वित्त मंत्रालय कंपनी के शेयर ढांचे में बदलाव के हर प्रस्ताव को मंजूर करता चला गया। नई नवेली डाएच टेलीकॉम भी देवास की पीठ पर बैठकर भारतीय बाजार में आ गई। देवास-एंट्रिक्स घोटाले को लेकर बाहर आ रहे तथ्य 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले जैसा रंग दे रहे हैं। जिस तरह स्पेक्ट्रम लेने के बाद दूरसंचार कंपनियों ने अपनी हिस्सेदारी बेच दी, ठीक उसी तरह महज दो शेयरधारकों वाली गुमनाम देवास ने एस बैंड स्पेक्ट्रम के लिए एंट्रिक्स से समझौते के बाद पांच साल में अपनी 74 फीसद इक्विटी बेच डाली और शेयरधारकों की संख्या दो से बढ़ाकर 17 कर ली। 28 जनवरी, 2005 को समझौते पर दस्तखत किए गए और ज्यादातर निवेशक सिर्फ 2007 से 2009 के बीच आए। महज एक लाख रुपये की चुकता पूंजी वाली एक कंपनी की इक्विटी शायद इस समझौते के कारण ही इतनी कीमती हो गई थी कि इसने 578.80 करोड़ रुपये का प्रीमियम जुटा लिया। घोटाले की जांच करने वाली बीके चतुर्वेदी एवं रोडम नरसिम्हन समिति ने भी अपनी रिपेार्ट में देवास के शेयरधारकों के ढांचे में बदलाव को गंभीर अनियमितता माना है। समिति ने संदेह जताया है कि विदेशी संचार कंपनियों ने देवास के जरिये देश के दूरसंचार बाजार में पिछले दरवाजे से प्रवेश किया। डाएच टेलीकॉम का देवास में इक्विटी लेना चौंकाने वाला है। यह जर्मन कंपनी यूरोप की प्रमुख मोबाइल कंपनी है। 2011 में करीब 58 बिलियन यूरो के कारेाबार वाली यह कंपनी 50 देशों में मौजूद है। अगर चतुर्वेदी समिति की बात मानें तो देवास के निदेशकों में इसरो के कुछ वैज्ञानिक भी थे और देवास के एंट्रिक्स से समझौते का उद्देश्य यह था कि देवास अंतरिक्ष स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल की तकनीक विकसित करेगी। समिति मानती है कि शेयरधारकों के ढांचे में बदलाव से मकसद खत्म हो गया।