Thursday, January 31, 2013

जाति न पूछो भ्रष्टाचार की





मशहूर समाजशास्त्री आशीष नंदी ने एक नई बात कही है। उनके कहे का अर्थ है कि सरकार और राजनीति को भ्रष्टाचार से मुक्त रखना है तो पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को इससे दूर रखो। अपनी बात के समर्थन में वह पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार का उदाहरण देते हैं, जिसने इन वगरें को सत्ता से हमेशा दूर रखा। अगले ही पल आशीष नंदी कहते हैं कि भ्रष्टाचार अच्छा है, क्योंकि यह समाज के विभिन्न वगरें में न केवल बराबरी लाता है, बल्कि सामाजिक समरसता को बनाए रखने में भी सहायक है। उन्हें दाऊद इब्राहिम का गैंग पंथनिरपेक्ष नजर आता है क्योंकि उसमें हिंदू भी हैं। समाजशास्त्री होते हुए भी अपनी बात के समर्थन में वह कोई प्रमाण या अध्ययन पेश नहीं करते। क्या आशीष नंदी जो कह रहे हैं उस पर यकीन करना चाहिए? क्या उनका विरोध होना चाहिए? क्या इसके लिए उन पर मुकदमा चलना चाहिए? आशीष नंदी इन वगरें के विरोधी नहीं रहे हैं इसलिए उनकी बात पर विचार करते समय इस संदर्भ को याद रखना जरूरी है। उन्होंने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि उनका इरादा किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं था। अगर अनजाने में उनके बयान से ऐसा हुआ है तो उन्हें इसका खेद है। भावनाओं को आहत तो उन्होंने किया है। उनके वक्तव्य से एक मोटी बात निकल कर आई है कि पिछड़े, दलित और आदिवासी भ्रष्ट हैं और सवर्ण जातियों के लोग ईमानदार। अपनी सफाई में उन्होंने कहा कि उनके कहने का अर्थ यह था कि समाज का ऊपरी तबका अपने भ्रष्टाचार को छिपाना जानता है इसलिए पकड़ा नहीं जाता। वास्तविक स्थिति का यह अति सरलीकरण है। उनकी बात में देश के युवाओं को सच्चाई नजर आ सकती है क्योंकि इस वर्ग ने सवर्ण जातियों के राजपाट को एक हद तक जाते हुए और पिछड़ों, दलितों व आदिवासियों के राजनीतिक सशक्तीकरण का दौर देखा है। इस आयु वर्ग के लोगों ने मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, मायावती और मधु कोड़ा को सत्ता में आते और भ्रष्टाचार के आरोप लगते देखा है। सत्ता भ्रष्टाचार सिखाती है, जाति नहीं। भ्रष्टाचार से कमाए पैसे छिपाने के गुर जाति विशेष में पैदा होने से नहीं आते। यह कला लगातार लंबे समय तक सत्ता में रहने से आती है। इस वर्ग के लोगों का भ्रष्टाचार केवल इसलिए उजागर नहीं हो जाता, क्योंकि वे वंचित जातियों के हैं। इस वर्ग के लोगों के मन में अभी तक यह भरोसा नहीं बन पाया है कि वे लंबे समय तक सत्ता में बने रहेंगे। सबसे ज्यादा अनिश्चित कार्यकाल मधु कोड़ा का था इसलिए उन्होंने सबसे कम समय में सबसे ज्यादा पैसा कमाया। भ्रष्टाचार के इस खेल से सवर्ण बाहर हो गए हों ऐसा भी नहीं है। जिन नेताओं का नाम आशीष नंदी ने लिया है उन सबके वित्तीय प्रबंधकों के नाम पर गौर करें तो सब सवर्ण जातियों के हैं। मधु कोड़ा के भी, जिसके भ्रष्टाचार की उपलब्धियों का जिक्र करते समय नंदी साहब लगभग गौरव का अनुभव कर रहे थे। पश्चिम बंगाल का उदाहरण देकर आशीष नंदी ने भ्रष्टाचार को सीधे जाति से जोड़ने का जो प्रयास किया उसका कोई अनुभवसिद्ध आधार नहीं है। भ्रष्टाचार मनुष्य की एक स्वाभाविक वृत्ति- लालच का नतीजा है। आशीष नंदी को भ्रष्टाचार के कीचड़ में कमल दिख रहा है। उन्हें लग रहा है जो काम सामाजिक सुधार के तमाम आंदोलन, शिक्षा, सरकारी कार्यक्रम और सशक्तीकरण के उपाय नहीं कर पाए वह भ्रष्टाचार ने कर दिखाया। इसलिए भ्रष्टाचार को वह जरूरी मानते हैं। भ्रष्टाचार से अगर सामाजिक विषमता की समस्या खत्म होती तो दुनिया के बहुत से देशों में सामाजिक विषमता न होती। क्या भ्रष्टाचार का ऐसा महिमामंडन वंचित जातियों का भला कर पाएगा? आशीष नंदी की नजर में चार व्यवसायों- राजनीति, मनोरंजन उद्योग, अपराध और खेल में जाति-धर्म के भेद के बिना व्यक्ति की प्रतिभा को विकसित होने का अवसर मिलता है। उनकी नजर उन करोड़ों वंचितों पर नहीं है, जो भ्रष्टाचार की मार झेल रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की इन तबकों के लिए चलने वाली योजनाओं का ज्यादातर पैसा उसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है जिसे वे समतामूलक बता रहे हैं। आशीष नंदी के बयान पर जो और जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं वे एक दूसरे संकट की ओर इशारा करती हैं। अभिव्यक्ति की आजादी सचमुच खतरे में है। राजस्थान पुलिस की कार्रवाई, राज्य के मुख्यमंत्री और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष का बयान इसकी पुष्टि करता है। आशीष नंदी के बयान का आप विरोध कर सकते हैं, आलोचना कर सकते हैं, निंदा कर सकते हैं, लेकिन उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करना संविधान से मिले अभिव्यक्ति के अधिकार पर सीधा हमला है। नेताओं को इसमें विभाजनकारी राजनीति का एक और अवसर नजर आ रहा है। रामविलास पासवान जैसे चुके हुए नेता राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उनकी गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं। केंद्र सरकार खामोश है। विरोधी विचारों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता जनतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। कमल हासन जैसे नास्तिक फिल्म कलाकार को भी धर्म के चश्मे से देखने की कोशिश हो रही है। सरकारें ऐसे मसलों में कोई फैसला लेने का साहस नहीं दिखातीं। उन्हें लगता है कि अदालत में फैसला हो तो बेहतर। कमल हासन देश छोड़ने के विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं। यह सत्ता प्रतिष्ठान और एक उदारवादी समाज के रूप में हमारे लिए चुनौती और शर्म दोनों की बात है। अपने विरोधी विचारों को अभिव्यक्ति का मौका देने से जनतंत्र मजबूत होता है, कमजोर नहीं। यह बात विभाजन की राजनीति की खेती करने वालों को समझ में नहीं आती। यहीं समाज और सरकार की जिम्मेदारी का सवाल आता है। उन्हें ऐसे लोगों के बचाव में आना चाहिए। पर सरकार तो खिलाफ खड़ी है। निराशा के इस माहौल में आशा की किरण की तरह आया है दलित चिंतक कांचा इलैया का बयान। कांचा इलैया ने अपने समाज के राजनेताओं के ठीक विपरीत रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि आशीष नंदी ने भावनाओं को ठेस तो पहुंचाई है पर दलित समाज का बुद्धिजीवी इतना सक्षम है कि वैचारिक हमले का जवाब विचार से दे सकता है। यह बयान दलित समाज की बौद्धिक ताकत का ही नहीं अपनी क्षमता के प्रति आत्मविश्वास का भी प्रतीक है। कांचा इलैया के समाज पर हमला हुआ है। वह पीडि़त हैं पर उनका जवाब फौरी आवेश का शिकार नहीं हुआ। वह विचार का जवाब विचार से ही देना चाहते हैं। इस पूरे विवाद का यह सकारात्मक पहलू है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Dainik jagran National Edition 31-01-2013 page-8 (Hkz”Vkpkj

Saturday, December 8, 2012

पिछले एक साल में भ्रष्टाचार बढ़ा



नई दिल्ली (एजेंसी)। भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ भले ही आंदोलन चल रहे हैं, लेकिन आम आदमी को इससे राहत नहीं है। एक अध्ययन में कहा गया है कि बड़े शहरों में झुग्गियों में रहने वाले 60 फीसद से अधिक लोगों का मानना है कि पिछले एक साल में भ्रष्टाचार में इजाफा हुआ है। ‘सीएमएस इंडिया करप्शन स्टडी 2012’ ने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार पिछले बारह महीनों बढ़ा है जबकि इस दौरान देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आंदोलन हुए। ‘सेंटर फार मीडिया स्टडीज’ द्वारा यह अध्ययन अहमदाबाद, बेंगलुरू, भुवनेर, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, गोवा, कोलकाता और मुंबई की झुग्गियों में किया गया। इसमें कहा गया कि इन सभी शहरों में झुग्गियों में रहने वालों ने कहा कि पुलिस सेवा में विशेष रूप से भ्रष्टाचार बढ़ा है। शुक्रवार को जारी अध्ययन में कहा गया कि 2012 में नौ बड़े शहरों में झुग्गियों में रहने वाले पचास फीसद से अधिक लोगों का मानना है कि पिछले 12 महीनों में सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार में इजाफा हुआ है जबकि करीब 29 फीसद की राय है कि सावर्जनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार लगातार बना हुआ है। करीब 88 फीसद लोगों ने कहा कि उन्हें पिछले एक साल में पुलिस सेवा में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा। अध्ययन ने कई रूचिकर बातों पर भी प्रकाश डाला जिसमें पुलिस को ‘अक्सर दी जाने वाली राशि’ शामिल थी। यह राशि पांच सौ रुपए थी और दिल्ली में एक झुग्गीवासी द्वारा पुलिस को आवासीय प्लाट के लिए सात हजार रुपए दिए गए। कोलकाता में एक झुग्गीवासी ने मासिक राशन के लिए पांच रुपए दिए। इस सव्रेक्षण के अनुसार, अहमदाबाद में सव्रेक्षण में शामिल लोगों में से 23 फीसद को ही इस साल भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा जबकि 2008 में यह आंकड़ा 41 फीसद था। हालांकि अन्य शहरों में इस आंकड़े में बढोत्तरी दर्ज की गई और मुंबई में 96 फीसद झुग्गीवासियों का कहना है कि वह भ्रष्टाचार के शिकार हैं। 2008 में यह केवल 17 फीसद था। यह अध्ययन ऐसे समय आया है जब सामाजिक संगठन मजबूत लोकपाल विधेयक की मांग कर रहे हैं। अध्ययन में कहा गया कि वर्ष 2008 के बाद से शहरी भारत में भ्रष्टाचार की घटनाएं 34 फीसद से 67 फीसद बढ़ी हैं। जितने लोगों से रित देने के लिए कहा गया, उनमें से 84 फीसद ने सेवाएं लेने के लिए रित दी। इसमें कहा गया कि लोगों ने मासिक राशन, राशन कार्ड, नया बिजली कनेक्शन, जल आपूर्ति, कूड़ा करकट हटाने, अस्पतालों में ओपीडी कार्ड बनाने, प्राथमिकी दर्ज कराने या पुलिस रिकार्ड से आरोपी का नाम हटाने के लिए रित दी। झुग्गीवालों ने कहा, पुलिस सेवा में विशेष रूप से बढ़ा है भ्रष्टाचार, जबकि इस दौरान देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आंदोलन हुए अध्ययन
1.       Rashtirya sahara National edition 8-12-2012 Page -2 Hkz”Vkpkj)

Friday, November 30, 2012

कैग ने फिर सरकार को लपेटा



ठ्ठ जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने केंद्र की जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम) में मकानों व बुनियादी ढांचे के निर्माण की सुस्त चाल पर सरकार को लपेटा है। संसद में गुरुवार को पेश अपनी रिपोर्ट में कैग ने कहा है कि योजना के तहत 115 करोड़ रुपये की राशि को शहरी नवीनीकरण के बजाय अन्य कार्यो में खर्च कर दिया गया। जबकि मिशन के तहत मंजूर 2815 परियोजनाओं में महज 253 निर्धारित समय 31 मार्च, 2011 तक पूरी हुई हैं। कैग के मुताबिक, सरकार के मंत्रालय इस तरह की विशालकाय योजना को चलाने और निगरानी करने में सक्षम नहीं हैं। लिहाजा केंद्र को राज्य सरकारों के साथ मिलकर योजना की खामियों की पहचान कर उन्हें दूर करने के लिए दो वर्ष में इंतजाम करने चाहिए। कैग की 103 पेज की रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 से 2011 के दरम्यान 1517 आवास तथा 1298 बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। लेकिन आवास योजनाओं में सिर्फ 22 योजनाएं मार्च 2011 के तय समय पर पूरी हुईं। जबकि 1298 शहरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में केवल 231 को समय पर पूरा किया जा सका। मिशन के तहत आठ मामलों में धन को दूसरे कार्यो में लगाया किया गया। ऐसा झारखंड, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में हुआ। यहां 115 करोड़ की राशि दूसरे कार्यो में लगाई गई। एक मामले में नगर निगम के कर्मचारियों को वेतन देने में धन का इस्तेमाल हुआ, जबकि बाकी कार्यो का मिशन से कोई संबंध ही नहीं था। मालूम हो कि जेएनएनयूआरएम को दिसंबर 2005 में शुरू किया गया था। इसके तहत कुल एक लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश से शहरों का कायाकल्प किए जाने का प्रस्ताव है। पहले निवेश में केंद्र व राज्यों सरकारों की हिस्सेदारी आधी-आधी थी, लेकिन बाद में वर्ष 2009 में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी बढ़ाकर 66,084.65 करोड़ रुपये कर दी गई। जेएनएनयूआरएम को वर्ष 2012 में पूरा करने का लक्ष्य है। इसके तहत 65 प्रमुख शहरों को कवर किया जाना है।
1.        Dainik Jagran National Edition 30-11-2012 Page -3 (Hkz”Vkpkj)

Monday, November 19, 2012

घपले-घोटालों के इस दौर में पूंजीवाद को अनैतिक मानने की गहराती धारणा




वह अक्टूबर के शुरुआती दिनों की एक खुशनुमा शाम थी। एक मुख्य समाचार चैनल के एंकर अरविंद केजरीवाल के नवीनतम शिकार की करतूतों की व्याख्या करते हुए गला फाड़-फाड़कर लालच पर दोष मढ़ रहे थे। उसी दिन केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ से गलत तरीके से सस्ती जमीन लेने के आरोप लगाए थे। अगले ही पल एंकर बताने लगे कि इस पूरी समस्या की जड़ क्रोनी कैपिटलिज्म यानी राजनेताओं की मिलीभगत से चलने वाले व्यावसायिक उपक्रम हैं। हमारे मीडिया में शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब पूंजीवाद की व्याख्या के लिए लालच शब्द का इस्तेमाल न किया जाता हो। वे कहते हैं कि यदि समाजवाद में ईष्र्या पाप है तो पूंजीवाद में लालच। पूंजीवाद को लालच की व्यवस्था तक कह दिया जाता है। यही कारण है कि यह भारत में आसानी से नहीं पनप पा रहा है। बहुत से भारतीय पूंजीवाद में खोट ढूंढते नहीं थकते। वे इसे आधुनिक पंथनिरपेक्ष पश्चिम का उत्पाद बताते हैं, जिसमें धार्मिक मूल्यों का अवमूल्यन हो गया। पूंजीवाद के खिलाफ हमारी धारणा शायद साम्यवाद के असफल होने के बाद तब बनी जब लोगों में यह विश्वास बढ़ने लगा कि बाजार बेहतर समृद्धि लेकर आता है, लेकिन पूंजीवाद अनैतिक व्यवस्था है। वे अब भी यही मानते हैं कि नैतिकता को धर्म आधारित ही होना चाहिए। पूंजीवाद को लालच बताना भूल है। हम बाजार में स्वहित और स्वार्थ या लालच के बीच उलझ जाते हैं। पूंजीवाद के मूल में एक ही विचार है, साधारण और स्वहित केंद्रित ऐसे लोगों का लेन-देन, जो बाजार में शांतिपूर्वक अपना हित तलाशते हैं। एडम स्मिथ ने इसे हमारी सस्ता खरीदने की मंशा और अपना हित देखते हुए बेचने की चाहत कहा है। यह ठीक वैसी ही भावना है जैसे कोई सुबह-सुबह अपने बिस्तर से खुद ही उठता है या बारिश में अपना छाता लेकर निकलता है। इसमें स्वार्थ जैसा कुछ नहीं है। इंसान होना स्व-केंद्रित होना है और यही बात बाजार पर लागू होती है। दूसरी तरफ लालच या स्वार्थ इस स्वहित की अति हो जाना है और इसमें अक्सर दूसरे के अधिकारों पर अतिक्रमण कर लिया जाता है। यह हम सभी में है, लेकिन हम इसे दूसरों में आसानी से देख लेते हैं। लालच से लूट को बढ़ावा मिल सकता है और दूसरे को चोट पहुंचाने की मानसिकता से हिंसा को, जो महात्मा गांधी के बताए अहिंसा पथ के विरुद्ध है। लालच का दूसरा सकारात्मक पहलू भी है और जब इस पहलू को सही दिशा दी जाती है तो यह जिंदगी बनाने वाला होता है। मानव अस्तित्व की समस्या यही है कि इंसान के भीतर मौजूद जो शक्तियां उसे आसानी से बुराई की ओर ले जा सकती हैं, वही उसे मानव जाति की भलाई के लिए भी प्रेरित कर सकती हैं। बस उन्हें सही दिशा देने की जरूरत होती है। जो लोग सोचते हैं कि पूंजीवाद को साम्राज्यवादी पश्चिम ने हम पर थोपा है वे भी गलत हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रेडरिक हाइक ने बाजार को सहज प्रवृत्ति का बताया है। इंसान के लिए वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान स्वाभाविक है और इसी तरह हर समाज बाजार में व्यवहार के मार्गदर्शन के लिए धन, कानून, परंपरा और नैतिकता विकसित करता है। ये इंसान के उद्यम के स्वाभाविक उत्पाद हैं। पश्चिम के साम्राज्यवादी या आधुनिक होने से पहले भारत के बाजार में प्रतियोगिता थी। यह पसंद और नापसंद का विषय हो सकता है, लेकिन भारत ने एक प्रकार के लोकतांत्रिक पूंजीवाद की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। भारत की मुक्त बाजार से मोहब्बत शुरू हुए और समाजवाद से मोहभंग हुए दो दशक बीत चुके हैं। साम्यवादी अल्पसंख्यकों के छोटे से धड़े के अलावा भारत में मुश्किल से ही कोई ऐसा होगा जो उत्पादन में सरकार का स्वामित्व चाहता है, जहां प्रतियोगिता की गैर मौजूदगी में नागरिक का चरित्र ज्यादा बिगड़ जाता है, जैसा कि हम लाइसेंस राज के दिनों में देख चुके हैं। भारतीयों का मानना है कि पूंजीवाद प्रभावशाली तो है, मगर नैतिक नहीं है। हालांकि बाजार न तो नैतिक होता है और न अनैतिक। बाजार में स्वहित इंसान को आम तौर पर अच्छे व्यवहार की ओर ले जाता है। जो विक्रेता अपने ग्राहक को ठगने की कोशिश करता है वह बाजार का बड़ा हिस्सा खो देगा। खामियों वाले उत्पाद बेचने वाली कंपनी के ग्राहक टूट जाएंगे। जो कंपनी सबसे योग्य कर्मचारियों को आगे नहीं बढ़ाती वह अपने प्रतिद्वंद्वियों से प्रतिभा के मामले में पिछड़ जाएगी। झूठ और ठगी किसी भी फर्म की छवि नष्ट कर देंगे। कर्जदाता और आपूर्तिकर्ता उसे अछूत बना देंगे। इस प्रकार मुक्त बाजार नैतिक व्यवहार की ज्यादा प्रबल संभावनाएं बनाते हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब राज्य की संस्थाएं ईमानदारी से इसके पक्ष में करें। अब सवाल उठता है कि यदि बाजार में नैतिकता पहले से ही है तो उसमें इतने बुरे लोग क्यों हैं? इसका जवाब यही है कि हर समाज में बुरे लोग होते हैं और इसीलिए हमें पुलिस और जजों जैसे प्रभावी नियंताओं की जरूरत होती है। हमें अपने संस्थान इस तरह बनाने चाहिए कि बुरे लोग पकड़े जा सकें और वे अच्छे लोगों का शोषण न करें। हमारी चिंता का दूसरा कारण है बाजार समर्थक होने को व्यापार समर्थक मानने की भूल करना। बाजार समर्थक होने का मतलब है प्रतियोगिता में भरोसा करना, जो कीमतें कम रखने में मदद करता है और उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाता है। प्रतियोगिता का एक मतलब यह भी है कि कमजोर प्रबंधन के अभाव में कई कारोबार प्रतियोगिता नहीं कर पाते और दम तोड़ देते हैं। किंगफिशर एयरलाइंस और एयर इंडिया को इसी तरह दम तोड़ने के लिए छोड़ देना चाहिए और उन्हें सरकारी पैकेज नहीं देना चाहिए। इस तरह बाजार समर्थक होना नियम आधारित पूंजीवाद की ओर ले जाता है और व्यापार समर्थक होना क्रोनी कैपिटलिज्म की ओर। कहने की जरूरत नहीं कि यही अंतर हमारे सुधारकर्ताओं की सबसे बड़ी भूल थी। भारत में आज क्रोनी कैपिटलिज्म इसलिए है, क्योंकि बहुत से क्षेत्र सुधारों से दूर हैं। वे लोग भी गलत हैं, जो कहते हैं कि हम नैतिक अवमूल्यन के दौर में जीने को अभिशप्त हैं। हां यह मुक्त युग है, जिसमें भारतीय मध्यवर्ग की खुशियां बढ़ी हैं। यह भौतिकतावादी, उपभोक्तावादी और पूंजीवादी दौर है, लेकिन इन सभी को लालच से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। आज के युवा भगवान से ज्यादा अपने साथियों के काम से प्रेरित होते हैं, जिनका मानना है कि भौतिकवाद में अन्याय की अनदेखी होती है और नैतिकता तब थी जब उस पर धर्म का एकाधिपत्य था। वे आजादी के बाद से भारत में नैतिक उत्थान को देख ही नहीं रहे हैं। लिंग और जातिगत समानता इसकी मिसाल हैं। इसलिए अगली बार जब केजरीवाल किसी घोटाले का खुलासा करें या टीवी गड़बड़ी को लालच कहे तो इस जाल में न फंसना कि पूंजीवादी संस्कृति नैतिक रूप से बीमार है और हमें धर्म या समाजवाद में निहित नैतिकता की ओर लौट जाना चाहिए। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)

1.       Dainik Jagran National Edition 19-11-2012 Page -8 (Hkz”Vkpkj)