वह अक्टूबर के शुरुआती दिनों की एक
खुशनुमा शाम थी। एक मुख्य समाचार चैनल के एंकर अरविंद केजरीवाल के नवीनतम शिकार की करतूतों की व्याख्या करते हुए गला फाड़-फाड़कर लालच पर दोष मढ़ रहे थे।
उसी दिन केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ से गलत तरीके से सस्ती जमीन लेने के आरोप लगाए थे। अगले ही
पल एंकर बताने लगे कि इस पूरी समस्या की जड़ क्रोनी कैपिटलिज्म यानी राजनेताओं की मिलीभगत से चलने वाले व्यावसायिक उपक्रम हैं। हमारे मीडिया में
शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब पूंजीवाद की व्याख्या के लिए लालच शब्द का इस्तेमाल न किया जाता हो। वे कहते हैं कि यदि समाजवाद में ईष्र्या पाप है
तो पूंजीवाद में लालच। पूंजीवाद को लालच की व्यवस्था तक कह दिया जाता है। यही कारण है कि यह भारत में आसानी से नहीं पनप पा रहा है। बहुत से
भारतीय पूंजीवाद में खोट ढूंढते नहीं थकते। वे इसे आधुनिक पंथनिरपेक्ष पश्चिम का उत्पाद बताते हैं,
जिसमें धार्मिक मूल्यों का अवमूल्यन हो गया। पूंजीवाद के खिलाफ हमारी धारणा शायद साम्यवाद के असफल होने के बाद तब बनी जब
लोगों में यह विश्वास बढ़ने लगा कि बाजार बेहतर समृद्धि लेकर आता है, लेकिन पूंजीवाद
अनैतिक व्यवस्था है। वे अब भी यही मानते हैं कि नैतिकता को धर्म आधारित ही होना चाहिए। पूंजीवाद को लालच बताना भूल है। हम बाजार
में स्वहित और स्वार्थ या लालच के बीच उलझ जाते हैं। पूंजीवाद के मूल में एक ही विचार है, साधारण और स्वहित केंद्रित ऐसे लोगों का लेन-देन, जो बाजार
में शांतिपूर्वक अपना हित तलाशते हैं। एडम स्मिथ ने इसे हमारी सस्ता खरीदने की मंशा और अपना हित देखते हुए बेचने की चाहत कहा है। यह ठीक वैसी ही भावना
है जैसे कोई सुबह-सुबह अपने बिस्तर से खुद ही उठता है या बारिश में अपना छाता लेकर निकलता है। इसमें स्वार्थ जैसा कुछ नहीं है। इंसान होना
स्व-केंद्रित होना है और यही बात बाजार पर लागू होती है। दूसरी तरफ लालच या स्वार्थ इस स्वहित की अति हो जाना है और इसमें अक्सर दूसरे के अधिकारों
पर अतिक्रमण कर लिया जाता है। यह हम सभी में है, लेकिन हम इसे दूसरों में आसानी से
देख लेते हैं। लालच से लूट को बढ़ावा मिल सकता है और दूसरे को चोट पहुंचाने की मानसिकता से हिंसा को, जो
महात्मा गांधी के बताए अहिंसा पथ के विरुद्ध है। लालच का दूसरा सकारात्मक पहलू भी है और जब इस पहलू को सही
दिशा दी जाती है तो यह जिंदगी बनाने वाला होता है। मानव अस्तित्व की समस्या यही है कि इंसान के भीतर मौजूद जो शक्तियां उसे आसानी से बुराई की ओर ले जा सकती हैं,
वही उसे मानव जाति की भलाई के लिए भी प्रेरित कर सकती हैं। बस उन्हें सही
दिशा देने की जरूरत होती है। जो लोग सोचते हैं कि पूंजीवाद को
साम्राज्यवादी पश्चिम ने हम पर थोपा है वे भी गलत हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रेडरिक हाइक ने बाजार को
सहज प्रवृत्ति का
बताया है। इंसान के लिए वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान स्वाभाविक है और इसी तरह हर समाज बाजार में व्यवहार के
मार्गदर्शन के लिए धन,
कानून, परंपरा और नैतिकता
विकसित करता है। ये इंसान के उद्यम के स्वाभाविक उत्पाद हैं। पश्चिम के साम्राज्यवादी या आधुनिक होने से पहले भारत के बाजार में प्रतियोगिता थी। यह पसंद
और नापसंद का विषय हो सकता है, लेकिन भारत ने एक
प्रकार के लोकतांत्रिक पूंजीवाद की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। भारत की मुक्त बाजार से मोहब्बत शुरू हुए और समाजवाद से
मोहभंग हुए दो दशक बीत चुके
हैं। साम्यवादी अल्पसंख्यकों के छोटे से धड़े के अलावा भारत में मुश्किल से ही कोई ऐसा होगा जो उत्पादन में
सरकार का स्वामित्व चाहता है, जहां प्रतियोगिता
की गैर मौजूदगी में नागरिक का चरित्र ज्यादा बिगड़ जाता है, जैसा कि हम
लाइसेंस राज के दिनों में देख चुके हैं। भारतीयों का मानना है कि पूंजीवाद प्रभावशाली तो है, मगर नैतिक नहीं है। हालांकि बाजार न तो नैतिक होता है और न अनैतिक। बाजार में
स्वहित इंसान को आम तौर पर
अच्छे व्यवहार की ओर ले जाता है। जो विक्रेता अपने ग्राहक को
ठगने की कोशिश करता है वह बाजार का बड़ा
हिस्सा खो देगा। खामियों वाले उत्पाद बेचने वाली कंपनी के ग्राहक टूट जाएंगे। जो कंपनी सबसे योग्य कर्मचारियों को आगे नहीं बढ़ाती वह अपने
प्रतिद्वंद्वियों से प्रतिभा के मामले में पिछड़ जाएगी। झूठ और ठगी किसी भी फर्म की छवि नष्ट कर देंगे। कर्जदाता और आपूर्तिकर्ता उसे अछूत बना
देंगे। इस प्रकार मुक्त बाजार नैतिक व्यवहार की ज्यादा प्रबल संभावनाएं बनाते हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब राज्य की संस्थाएं ईमानदारी से इसके पक्ष में करें। अब सवाल उठता है कि
यदि बाजार में
नैतिकता पहले से ही है तो उसमें इतने बुरे लोग क्यों हैं? इसका जवाब यही है कि
हर समाज में बुरे लोग होते हैं और इसीलिए हमें पुलिस और जजों जैसे प्रभावी नियंताओं की जरूरत होती है। हमें अपने
संस्थान इस तरह बनाने चाहिए कि
बुरे लोग पकड़े जा सकें और वे अच्छे लोगों का शोषण न करें। हमारी चिंता का दूसरा कारण है बाजार समर्थक होने को व्यापार
समर्थक मानने की भूल करना।
बाजार समर्थक होने का मतलब है प्रतियोगिता में भरोसा करना, जो कीमतें कम रखने
में मदद करता है और उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाता है। प्रतियोगिता का एक मतलब यह भी है कि कमजोर प्रबंधन के अभाव
में कई कारोबार प्रतियोगिता नहीं
कर पाते और दम तोड़ देते हैं। किंगफिशर एयरलाइंस और एयर इंडिया को इसी तरह दम तोड़ने के लिए छोड़ देना चाहिए और
उन्हें सरकारी पैकेज नहीं देना
चाहिए। इस तरह बाजार समर्थक होना नियम आधारित पूंजीवाद की ओर ले जाता है और व्यापार समर्थक होना क्रोनी कैपिटलिज्म की
ओर। कहने की जरूरत नहीं कि
यही अंतर हमारे सुधारकर्ताओं की सबसे बड़ी भूल थी। भारत में आज क्रोनी कैपिटलिज्म इसलिए है, क्योंकि बहुत से क्षेत्र सुधारों से दूर हैं। वे लोग भी गलत हैं, जो कहते हैं कि हम नैतिक अवमूल्यन के दौर में जीने को अभिशप्त हैं। हां यह मुक्त युग है, जिसमें भारतीय मध्यवर्ग की खुशियां बढ़ी हैं। यह भौतिकतावादी, उपभोक्तावादी और पूंजीवादी दौर है, लेकिन इन सभी को लालच से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। आज के युवा भगवान से ज्यादा अपने साथियों के काम से प्रेरित
होते हैं, जिनका मानना है कि भौतिकवाद में अन्याय की
अनदेखी होती है और नैतिकता तब थी जब उस पर धर्म का एकाधिपत्य था। वे आजादी के बाद से भारत में नैतिक उत्थान को देख ही नहीं रहे हैं। लिंग और जातिगत
समानता इसकी मिसाल हैं। इसलिए अगली बार जब केजरीवाल
किसी घोटाले का खुलासा करें या टीवी गड़बड़ी को लालच कहे तो इस जाल में न फंसना कि पूंजीवादी संस्कृति नैतिक
रूप से बीमार है और हमें धर्म या समाजवाद में निहित नैतिकता की
ओर लौट जाना चाहिए। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
1.
Dainik Jagran National Edition 19-11-2012 Page
-8 (Hkz”Vkpkj)

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