अपने मंत्रिमंडल को कथित तौर पर युवा
और ऊर्जावान बनाने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नए मंत्रिमंडल से राष्ट्र निर्माण में जुट जाने की अपील की है। महंगाई और भ्रष्टाचार
के कारण जनता का विश्वास सरकार पर घटा है। उसे दोबारा हासिल करने का मंत्र देते हुए उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्रनिर्माण के काम में आरोप भी लगते हैं
तो उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। इसका क्या अर्थ लगाया जाए? इस सरकार पर घोटालों के आरोप विपक्ष ने नहीं लगाए। मीडिया ने भी नहीं लगाए। ये आरोप संवैधानिक निकाय-नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी
कैग ने लगाए हैं और जांच में वे सही पाए जा रहे हैं। जब सरकार का मुखिया ही एक संवैधानिक निकाय की अनदेखी करने की सलाह दे रहा हो तो स्वाभाविक तौर पर
सरकार की कार्यशैली पर हर देशभक्त को चिंता होगी। कॉमनवेल्थ घोटाले में महीनों कारावास भुगत कर बाहर आए कलमाड़ी और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के ए राजा और कनीमोरी को हाल ही में संसद की विभिन्न स्थायी समितियों का सदस्य
बनाया गया। अब मंत्रिमंडल के फेरबदल में आइपीएल घोटाले के कारण जिस मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा था उसे मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री बना
दिया गया और विकलांगों का धन गबन करने के आरोपी केंद्रीय मंत्री को पदोन्नत कर विदेश मंत्री बना दिया गया। एक ओर डॉ. सिंह के मंत्रिमंडल में ऐसे
कर्मवीर शामिल हैं वहीं पेट्रोलियम मंत्री एस. जयपाल रेड्डी जैसे ईमानदार व्यक्ति को महत्वपूर्ण मंत्रालय से वंचित किया गया। क्यों? प्रधानमंत्री ने बढ़ते राजकोषीय घाटे पर चिंता व्यक्त की है।
एक अर्थशास्त्री
होने के नाते सुस्त आर्थिक विकास दर और राजकोषीय घाटे को लेकर प्रधानमंत्री की चिंता स्वाभाविक है,
किंतु प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति आई क्यों और उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
पिछले आठ साल से केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार का राज है। 2004-05 के आर्थिक सर्वेक्षण में लिखा था, 2004-05 की अवधि में
भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन आशातीत रहा। 2003-04 में आर्थिक विकास की दर 8.5 प्रतिशत रही,
जो 1975-76 व 1988-89
के अपवाद को छोड़कर अब तक की सर्वाधिक है। उसी सर्वेक्षण में 2003-04 के दौरान कृषि क्षेत्र में विकास दर 9.6 प्रतिशत,
सर्विस सेक्टर में 9.1 प्रतिशत और उद्योग
में 6.6 प्रतिशत विकास दर की स्वीकृति है। यह
उपलब्धि भाजपानीत राजग
सरकार की थी। विरासत में मिली समृद्ध अर्थव्यवस्था को पिछले आठ सालों में किसने खोखला किया? हाल ही में आर्थिक विकास दर को बढ़ावा देने के लिए जब
प्रधानमंत्री को कड़े कदम उठाने पड़े तो स्वाभाविक तौर पर उनकी आलोचना भी हुई। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यदि ये फैसले नहीं किए जाते
तो देश में 1991 जैसे हालात हो जाते। इस बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार है? सन 1991 में भारत की माली
हालत इतनी खराब हो गई
थी कि उसे अपनी अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को पूरा करने के लिए अपना स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा था। उस दौरान मनमोहन
सिंह पीवी नरसिंह राव के
काल में वित्तमंत्री थे। उन्होंने ही उदारीकरण की नीतियां अपना कर अर्थव्यवस्था को समाजवादी जकड़न से मुक्ति दिलाई थी,
किंतु पिछले आठ सालों में प्रधानमंत्री के अंदर का अर्थशास्त्री खामोश क्यों रहा?
लोकलुभावन नीतियों के लिए वह राजकोष क्यों लुटाते रहे?
क्यों शीर्ष स्तर पर मची लूट को वह सहते रहे? विडंबना यह है कि सरकार आर्थिक विकास के लिए आम आदमी को ही निचोड़ने की योजनाएं बना रही है। सब्सिडी वाले सिलेंडरों
की संख्या सीमित करने से रसोई गैस के सिलेंडर करीब 900 रुपये में उपलब्ध
होंगे। इसमें भी अभी 26 रुपये वृद्धि करने का निर्णय लिया गया, जिसे हिमाचल और गुजरात के चुनावों के कारण टाल दिया गया है। दिल्ली में बिजली की दरों में भारी वृद्धि
को लेकर जनता आक्रोश में है।
लोगों को राहत देने की जगह दिल्ली की कांग्रेसी सरकार की सलाह यह है कि जो बिजली बिल का भुगतान नहीं कर सकते उन्हें
बिजली कनेक्शन कटवा लेना चाहिए।
यह कैसी मानसिकता है? कोयला घोटाले के लिए सरकार का तर्क है कि बिजली का उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ती
दरों पर कोयला आवंटित किया गया। फिर बिजली के दाम क्यों बढ़े? जनवरी, 2011 में देश में बिजली उत्पादन कुल
क्षमता से 30,000 मेगावाट कम था, क्योंकि कोयले की
कमी के कारण बिजली प्लांट अपनी क्षमता से कम बिजली उत्पादन कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने स्थिति सुधारने का भरोसा
दिलाया, किंतु अक्टूबर, 2012 तक और बुरा हाल
हो गया। पावर प्लांट अपनी क्षमता से 65,000 मेगावाट कम बिजली उत्पादन की स्थिति में आ गए, क्योंकि बिजली उत्पादन के लिए कोल इंडिया लिमिटेड ने जहां ज्यादा कोयला खनन की जरूरत नहीं समझी,
वहीं जिन निजी कंपनियों को कोल ब्लॉक आवंटित हुए उन्होंने कोयला बेचकर मोटी कमाई की। सरकार देश के खुदरा व्यापारियों की
कीमत पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए द्वार खोल चुकी है, किंतु इस बात की
चिंता किसी को नहीं कि भारतीय उद्यमियों के पास 9 लाख करोड़ की
नकदी होने के बावजूद वे भारत में निवेश करने को क्यों तैयार नहीं हैं? आज महंगाई दर करीब आठ प्रतिशत है। औद्योगिक और कृषि विकास दर तीन प्रतिशत से कम और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.5
प्रतिशत है। राजकोषीय घाटा 5.5 प्रतिशत रहने का अंदेशा है, जो बजटीय अनुमान 4.6
प्रतिशत से काफी अधिक है। गरीबी आंकने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त समितियों के आंकड़े
भ्रामक हैं। योजना आयोग शहरी
क्षेत्र में 32.5 और ग्रामीण क्षेत्रों में 26.5
रुपये खर्च करने वाले को गरीब नहीं मानता। उसके अनुसार 40.74 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। वहीं अर्जुन सेनगुप्ता
समिति का मानना है कि देश की कुल
आबादी का 38 प्रतिशत भाग गरीब है। इस सरकार के आठ
साल के राज में कमरतोड़
महंगाई के कारण गरीबी और कुपोषण में और वृद्धि हुई है। एक ओर तो भ्रष्टाचार के कारण मुट्ठीभर लोग अल्पकाल में ही अरबपति
बन रहे हैं तो दूसरी ओर
नीतिगत अपंगता के कारण अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है, जिसका खामियाजा आम आदमी भुगतने को अभिशप्त है। कांग्रेस प्रधानमंत्री को काम करने की आजादी देकर आर्थिक विकास लाने
और युवराज राहुल गांधी की ताजपोशी की तैयारी भले करे, किंतु बिहार और
उत्तर प्रदेश के चुनाव में विफल रहने वाले कांग्रेसी युवराज से कोई आशा करने की जगह लोगों में इस सरकार की सरदारी पर ही विश्वास खत्म हो चुका है।
(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)
Dainik Jagran National Edition -6-11-2012 भ्रष्टाचार Page -9

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