Friday, October 26, 2012

क्या आधार से रुकेगा भ्रष्टाचार!



प्रमोद भार्गव संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पिछले दिनों 21 करोड़वां आधार कार्ड उदयपुर जिले के दूदू कस्बे की कालीबाई को सौंप दिया। देश के नागरिकों के लिए अब विशेष और बहुउद्देशीय पहचान पत्र आधार बुनियादी जन सुविधाओं एवं उपभोक्ता को सब्सिडी का आधार भी बनता दिखाई दे रहा है। इसके जरिये राजस्थान में सरकारी अनुदान और योजनाओं का लाभ जनता को सीधे देने की सुखद शुरुआत कर दी गई। जाहिर है, यदि इस कार्ड से बिना किसी बाधा के नकद छूट सीधे उपभोक्ता के बैंक खाते में जमा होती है तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा और सार्वजानिक वितरण प्रणाली के दुरुस्त हो जाने की उम्मीद बढ़ेगी। इससे कांग्रेस और उसके सहयोगी घटक दलों का खिसकता जमीनी आधार भी मजबूत होगा। बशर्ते कार्ड में उपभोक्ता के वास्तविक ब्यौरे दर्ज हों, क्योंकि सभी गरीब परिवारों के उचित दस्तावेजों के अभाव में बैंक खाते नहीं खुल पा रहे हैं। ग्राम पंचायत के प्रमाणीकरण से उनके खाते खुल जाएं और आधार तकनीक से जुड़े जो सहायक उपकरण हैं, उनकी गुणवत्ता मानक हो। ये उपकरण मानक नहीं हुए तो आधार कर्नाटक की तरह परेशानी का सबब भी बन सकता है। आजादी के बाद से ही कई ऐसे कारगर उपाय होते चले आ रहे हैं, जिससे देश के प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रीय नागरिकता की पहचान दिलाई जा सके। मूल निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और अब आधार योजना के अंतर्गत एक बहुउद्देशीय विशिष्ट पहचान पत्र हर नगरिक को देने की देशव्यापी कवायद चल रही है। सोनिया गांधी ने 21 करोड़वां आधार कार्ड भेंट करते हुए दावा किया है, आधार विश्व की सबसे बड़ी परियोजना है, जो आम आदमी को उसकी पहचान देगी। उसका जीवन बदल जाएगा। उपभोक्ता को सरकारी मदद शत-प्रतिशत मिलने की गारंटी मिल जाएगी। इसी परिप्रेक्ष्य में खाद्य सामग्री, केरोसिन और रसोई गैस में मिलने वाली नकद सब्सिडी हकदार के सीधे बैंक खाते में डाल दी जाएगी। दूरगामी परिणाम की उम्मीद तय है कि इससे भ्रष्टाचार, हेराफेरी और धोखाधड़ी कम होगी। मनरेगा की मजदूरी, विद्यार्थियों के वजीफे, बुजुर्गो की पेंशन सीधे लाभार्थियों के खाते में जमा होगी। यदि यह संभव हो जाता है तो व्यक्ति अनिवार्य रूप से आधार कार्ड धारण करने को विवश होगा और इसकी स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। फिलहाल विपक्षी दल पिछले दो दशक से नकद सब्सिडी उपभोक्ता को देने की मांग करते चले आ रहे थे, उसकी शुरुआत संप्रग सरकार ने राजस्थान के दूदू कस्बे से कर दी है। कुछ दिनों में इसके दूरगामी परिणाम देखने में आएंगे। फिलहाल आधार को वजूद कायम करने में कई जटिलताएं पेश आ रही हैं। इन्हें दूर करने की जरूरत है। इसके अमल में आने के बाद मानवीय लालच के चलते जो गड़बडि़या सामने आई हैं, उनमें यदि सख्ती नहीं बरती गई तो महत्वाकांक्षी आधार योजना भी ढाक के तीन पात बनकर रह जाएगी। क्योंकि आधार कंप्यूटर आधारित ऐसी तकनीक है, जिसे संचालित करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञ, इंटरनेट तथा ऊर्जा की उपलब्धता जरूरी है। केवल व्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत करने की संख्या दे देने से काम चलने वाला नहीं है। महज आधार संख्या सुविधा और सशक्तीकरण का बड़ा उपाय या आधार नहीं बन सकता। यदि ऐसा संभव हुआ होता तो मतदाता पहचान पत्र मतदाता के सशक्तिकरण और चुनाव सुधार की दिशा में बड़ा कारण बनकर पेश आ गया होता। आधार को पेश करते हुए दावा तो यह भी किया गया था कि इससे नागरिक को ऐसी पहचान मिलेगी, जो भेदरहित होने के साथ उसे विराट आबादी के बीच अपनी अस्मिता का आभास कराती रहेगी। लेकिन जातीय, शैक्षिक और आर्थिक असमानता के भेद बरकरार हैं। दरअसल, आधार योजना जटिल तकनीकी पहचान पर केंद्रित है। इसलिए इसके मैदानी अमल में दिक्कतें भी सामने आने लगी हैं। असल में राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र में पहचान का मुख्य आधार फोटो होता है, जिसे देखकर आखों में कम रोशनी वाला व्यक्ति भी कह सकता है कि यह फलां व्यक्ति का फोटो है। उसकी तस्दीक के लिए भी कई लोग आगे आ जाते हैं, जबकि आधार में फोटो के अलावा उंगलियों, अंगूठे के निशान और आंखों की पुतलियों के डिजिटल कैमरों से लिए गए महीन पहचान वाले चित्र हैं, जिनकी पहचान तकनीकी विशेषज्ञ भी बामुश्किल कर पाते हैं। ऐसे में सरकारी व सहकारी उचित मूल्य की दुकानों पर राशन, गैस व केरोसिन बेचने वाला मामूली दुकानदार कैसे करेगा? आधार के जरिये केवल सब्सिडी की ही सुविधा दी जानी थी तो इसके लिए तो फिलहाल आधार की भी जरूरत नहीं है। यह काम उपभोक्ता का बैंक में खाता खुलवाकर ई-भुगतान के जरिये किया जाता तो और भी आसान होता। मनरेगा के मजदूरों की मजदूरी का शत-प्रतिशत भुगतान बैंक खाते के मार्फत होने लगा है। मनरेगा में काम करने वाले अधिकांश वही लोग हैं, जो गरीबी रेखा के नीचे जीपनयापन करने वाले हंै और जो सब्सिडी के पात्र हैं। ऐसे में आधार का औचित्य केवल सब्सिडी के लिए उचित सिद्ध नहीं होता। कुछ जटिलताएं भी कर्नाटक में ऐसे दो मामले सामने आ चुके है, जो आधार की जटिलता सामने लाते हैं। कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि मौसूर के अशोकपुरम् में राशन की एक दुकान को गुस्साए लोगों ने आग लगा दी और दुकानदार की पिटाई भी की। दरअसल, दुकानदार कोई तकनीकी विशेषज्ञ नहीं था, इसलिए उसे ग्राहक के उंगलियों के निशान और आंखों की पुतलियों के निशान मिलाने में समय लग रहा था। चार-पांच घंटे लंबी लाइन में लगे रहने के बाद लोगों के धैर्य ने जबाव दे दिया और भीड़, हुड़दंग, मारपीट व लूटपाट का हिस्सा बन गई। बाद में पुलिसिया कारवाई में लाचार व वंचितों के खिलाफ लूट व सरकारी काम में बाधा डालने के मामले पंजीकृत कर इस समस्या की इतिश्री कर दी गई। अब तो जानकारियां ये भी मिल रही हैं कि इस योजना के मैदानी अमल में जिन कंप्यूटराइज्ड सहायक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जरूरत पड़ती है, उनकी खरीद में अधिकारी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार बरत रहे हैं। बेंगलूर के एक अखबार के मुताबिक एक सरकारी अधिकारी ने उंगलियों के निशान लेने वाली 65 हजार घटिया मशीनें खरीद लीं। केंद्रीयकृत आधार योजना में खरीदी गई इन मशीनों की कीमत 450 करोड़ रुपये है। इस अधिकारी की शिकायत कर्नाटक के लोकायुक्त को की गई है। जाहिर है, योजना गरीब को इमदाद से कहीं ज्यादा भ्रष्टाचार का सबब बनती दिखाई दे रही है। तय है आशंकाएं बेबुनियाद नहीं हैं। इसलिए जो शिकायतें आ रहीं हैं, उन्हें दूर करने की जरूरत है। इसलिए जरूरी है कि जिस उपभोक्ता को राशन और ईधन की सुविधा दी जा रही है, उसकी पहचान केवल फोटो आधारित हो। आंखों की पुतलियों और अंगूठे से उसकी पहचान इस बाबत न हो। यदि पहचान के आधार जटिल होंगे और गरीब की पहचान मुश्किल होगी तो इससे जनता में संदेश जाएगा कि गरीबों के हक को नकारा जा रहा है। दरअसल, आधार के रूप में भारत में अमल में लाई गई इस योजना की शुरुआत अमेरिका में आतंकवादियों पर नकेल कसने के लिए हुई थी। 2001 में हुए आतंकी हमले के बाद खुफिया एजेंसियों को छूट दी गई थी कि वे इसके माध्यम से संदिग्ध लोगों की निगरानी करें। वह भी केवल ऐसी 20 फीसद आबादी पर, जो प्रवासी है और जिनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं। लेकिन हमारे यहां इस योजना को संपूर्ण आबादी पर लागू किया जा रहा है। इससे यह संदेश भी जाता है कि देश का वह गरीब संदिग्ध है, जिसे रोटी के लाले पड़े हैं। खासतौर से इस योजना को कश्मीर और असम तथा पूर्वोत्तर के उन सीमांत जिलों की पूरी आबादी के लिए लागू करने की जरूरत थी, जहां घुसपैठिए आतंकी गतिविधियों को तो अंजाम दे ही रहे हैं, जनसांख्यकीय घनत्व भी बिगाड़ रहे हैं। इसलिए पी चिदंबरम जब देश के गृहमंत्री थे, तब इस आधार योजना के वे प्रबल विरोधी थे और उन्होंने इसे खतरनाक आतंकवादियों को भारतीय पहचान मिल जाने का आधार बताया था। लेकिन वित्तमंत्री बनते ही उनका सुर बदल गया है। राजस्थान में उन्होंने हिंदी में भाषण देते हुए आधार का गुणगान किया। जाहिर है, आधार की परिकल्पना निर्विवाद नहीं है। केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ तो हो सकता है कि इसे सिरे से खारिज कर दिया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Dainik jagran National Edition 26-10-2012  भ्रष्टाचार! pej -9

Thursday, October 25, 2012

अंधकार भरे माहौल में कांग्रेस



क्रांतिकारियों की ख्याति बहुत कम समय के लिए होती है। उनका संघर्ष और त्याग जितने लंबे समय का होता है, उतनी ही जल्दी वे भुला दिए जाते हैं। ब्रिटिश शासन को खत्म कराने वाले महात्मा गांधी को बहुत हद तक इसलिए याद किया जाता है, क्योंकि भारतीय रुपयों पर उनका फोटो छपा होता है। ऐसा ही पाकिस्तान और बांग्लादेश के संस्थापकों मोहम्मद अली जिन्ना और शेख मुजीबुर रहमान के मामले में भी हैं। ये दोनों भी अपने-अपने देश की मुद्राओं में ही चमकते रहते हैं। जयप्रकाश नारायण को ऐसा कोई सम्मान हासिल नहीं है। हालांकि उन्होंने निरंकुश प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जंजीरों से भारत को मुक्त कराने के लिए 1977 की क्रांति को अंजाम दिया, लेकिन पटना जाने पर मैंने पाया कि अपने राज्य बिहार में भी वह उपेक्षा के पात्र बने हैं। जन्मदिन पर फोटो छापने की बात तो दूर किसी स्थानीय अखबार में उनका कोई उल्लेख तक नहीं था। बिहार में जेपी के एक अग्रणी अनुयायी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार है, लेकिन सरकार ने जन्मदिन का कोई ख्याल नहीं रखा। देश के लिए नहीं, तो राज्य के लिए भी उनकी सेवाओं को याद करने के लिए सरकारी कार्यक्रम नहीं आयोजित किया गया। पटना हवाई अड्डे का नाम जयप्रकाश नारायण के नाम पर रखा गया है, लेकिन वहां अभी भी उनका नाम गलत स्पेलिंग के साथ दर्ज है। अंग्रेजी में कुछ इस तरह लिखा है कि लोग जय की जगह इसे जइ पढ़ेंगे। कदमकुंआ के संकरे इलाके में स्थित उनका आवास उजाड़ पड़ा था। कोई भीड़ नहीं थी। हमारे जैसे कुछ लोग उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण के लिए वहां खड़े थे। मुझे सबसे अधिक दुख इस बात को लेकर हुआ कि इस भवन के एक हिस्से को कुछ बिल्डर अपने कब्जे में लेने की कोशिश में जुटे हुए हैं जबकि यह आवास संग्रहालय में तब्दील किया जा चुका है, यहां जेपी की किताबें और बेडरूम उसी तरह हैं जैसा वह इस्तेमाल करते थे। लोकतंत्र के पटरी से उतर जाने के बाद जेपी अकेले दम उसे फिर से पटरी पर लाए थे। उन्होंने 1977 के चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को धूल चटा दी थी। जेपी ने कर दिखाया था कि अगर आम आदमी तानाशाही के खिलाफ पूरी प्रतिबद्धता के साथ खड़ा हो जाए तो किस तरह वह बोलने, लिखने और स्वतंत्रतापूर्वक रहने की आजादी को वापस पा सकता है। इंदिरा गांधी ने संविधान को निलंबित कर दिया था। जेपी ने उसे फिर से बहाल करवाया और अखबारों को उनकी स्वतंत्रता वापस दिलाई। यह अलग बात है कि लोगों को दूसरी आजादी दिलाने के बावजूद जेपी अपने जीवनकाल में ही असफल हो गए। वह बीमार पड़ गए और केंद्र में सत्ता पर काबिज लोगों पर नजर नहीं रख सके। इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन और जनता सरकार की निकम्मी सरकार के बीच कोई अंतर नहीं था। मैंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से कहा था कि मंत्रियों के साथ संवाद नहीं रहने को लेकर जेपी दुखी हैं। इस पर उन्होंने रूखे अंदाज में जवाब दिया था, मैं तो गांधी जी से भी मिलने नहीं गया था। गांधी से बड़े नहीं हैं जेपी। जेपी के गांव से दिल्ली वापस आया तो, राजनीति में आई गिरावट को देखा। मनमोहन सरकार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा का बचाव करने में जुटी हुई थी। उन्होंने कंपनी रजिस्ट्रार के पास जो बैलेंसशीट जमा की है, वह उस रियल इस्टेट कंपनी के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती, जिससे उन्होंने जमीन खरीदी है। बताया जाता है कि इस तरह उन्होंने 700 करोड़ की हेराफेरी की है। इस पूरे प्रकरण में अशोक खेमका बधाई के पात्र हैं! उन्होंने गैरकानूनी पाए जाने पर भूमि आवंटन को रद कर दिया। इस बहादुर अधिकारी का तबादला कर दिया गया है। बीस साल की नौकरी में यह उनका चालीसवां तबादला है। इस तरह के मामले उजागर होने से अंधकार भरे माहौल में आशा का संचार होता है। मुझे आश्चर्य होता है कि नेहरू-गांधी परिवार भ्रष्टाचार से किसलिए जुड़ गया। जवाहर लाल नेहरू पर कोई अंगुली नहीं उठी थी, जबकि वह 17 वर्षो तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। यहां तक कि उनके किसी मंत्री पर भी भ्रष्टाचार का आरोप विरले ही लगा। ऐसा नहीं था कि उनके जैसे लोगों का समय सिर्फ त्याग के लिए ही याद करने लायक है। उस समय भी घोटाले होते थे, लेकिन बहुत ही कम। हकीकत यह है कि उनका तरीका साफ-सुथरा था और उन लोगों ने कभी लीपापोती की कोशिश नहीं की। नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के सत्ता में आने पर सब गड़बड़ हो गया। ढेर सारे पार्टी फंड की बंदरबांट और पब्लिक सेक्टर कंपनियों में भ्रष्ट सौदों का दौर शुरू हुआ। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की प्रतिष्ठा तार-तार हो गई और उनके बेटे संजय गांधी ने उन्हें अपने बच्चे का बचाव करने वाली मां के रूप में मशहूर कर दिया था। संजय को किस तरह मारुति कार बनाने का लाइसेंस मिला, किस तरह उन्हें गुड़गांव के निकट कारखाना लगाने को जमीन मिली और किस तरह असुरक्षित कर्ज मिला-इन सबकी याद रॉबर्ट वाड्रा के करोड़ों के भवन निर्माण उद्यम को देखकर ताजा हो जाती है। नेहरू-गांधी राजवंश का अंग बनने वाले पहले दामाद हैं वाड्रा। नेहरू के दामाद फिरोज गांधी भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ किया करते थे। वह प्रधानमंत्री के आवास पर रहते तक नहीं थे। अलग बंगले में रहते थे, जो उन्हें सांसद होने के नाते मिला था। यह शर्म की बात है कि उसी फिरोज गांधी के बेटे राजीव गांधी का नाम बोफोर्स सौदे को लेकर कलंकित हुआ। इसके कारण राजीव गांधी को 1989 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। राजवंश के भ्रष्टाचार का रूप-रंग बदल गया है। राजवंश का कोई सदस्य सरकार में नहीं है, लेकिन वाड्रा ने बवाल खड़ा कर दिया है। कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य वाड्रा के बचाव में जुट गए हैं। फिर भी राजवंश की प्रतिष्ठा तो धूमिल हो चुकी है। जेपी ने अपने आंदोलन को जिस तरह मूल्यों से जोड़ने की कोशिश की थी, उससे कितना इतर है यह सब! आंदोलन मूल्यों को पुनर्जीवित करने के लिए था। अन्याय को लेकर गुस्से में खौलते देश के सामने आज फिर से वही चुनौती है। भ्रष्टाचार तो इसका अंग मात्र है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Dainik Jagran National Edition 25-10-2012 भ्रष्टाचार pej-8

मौत बांटने वाली लूट






मौत बांटने वाली लूट महाराष्ट्र में पवारों, गडकरियों, कांग्रेस और शिवसेना के बीच मौसेरे भाई वाले रिश्तों पर क्या चिढ़ना, भ्रष्टाचार का दलीय कोआपरेटिव तो मराठी राजनीति का स्थायी भाव है, गुस्सा तो सियासत की निर्ममता पर आना चाहिए जिसने भारत के इतिहास के सबसे नृशंस भ्रष्टाचार को अंजाम दिया है। मत भूलिए कि अब हम राजनीतिक भ्रष्टाचार के एक जानलेवा नमूने से मुखातिब हैं। महाराष्ट्र को दुनिया भारत में सबसे अधिक किसान आत्महत्या वाले राज्य के तौर पर जानती है। सिंचाई के पैसे, बांध की जमीनों और कीमती पानी की लूट का इन आत्महत्याओं से सीधा रिश्ता है। महाराष्ट्र का सिंचाई घोटाला दरअसल देश की सबसे बड़ी खेतिहर त्रासदी की पटकथा है। महाराष्ट्र देश का इकलौता राज्य है जहां पिछले कई दशकों में सिंचाई पर किसी भी राज्य से ज्यादा खर्च हुआ है। राज्य की पिछली डेवलपमेंट रिपोर्ट बताती है कि नौवीं योजना तक महाराष्ट्र में सिंचाई पर खर्च पूरे देश में कुल सिंचाई खर्च का 18 फीसदी था। आगे की योजनाओं में यह और तेजी से बढ़ा। खेतों को पानी देने पर खर्च के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े खेतिहर राज्य यकीनन महाराष्ट्र के सामने पानी भरते हैं। महाराष्ट्र में राजनेताओं के लिए सिंचाई सबसे मलाईदार विभाग इसलिए है, क्योंकि यह चार विशालकाय सरकारी सिंचाई निगमों से लैस है, जिनके पास अकूत बजट है। पिछली पंचवर्षीय योजना तक देश में जो 695 बांध परियोजनाएं चल रही थीं उनमें 43 फीसदी महाराष्ट्र में थीं। अब तक देश में बने कुल बांधों में आधे महाराष्ट्र के खाते में जाते हैं। सिंचाई पर इतना पैसा खर्च करने वाले राज्य में तो खेती को देश में सबसे खुशहाल होना चाहिए था, लेकिन महाराष्ट्र खेती की ग्लोबल ट्रेजडी बन गया। सिंचाई पर यह सरकारी खर्च दरअसल लूट थी। खर्च कागजों पर हुआ इसलिए सिंचाई क्षमता (बड़ी और मझोली परियोजनाएं) तैयार करने और उसका इस्तेमाल करने में महाराष्ट्र राष्ट्रीय औसत से भी बहुत पीछे रह गया। राज्य के ताजे आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले एक दशक में 70,000 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी राज्य में सिंचाई क्षमता 0.1 फीसदी बढ़ी है। महाराष्ट्र की सिंचाई लूट की कथा सिर्फ इतने तक सीमित नहीं है। मराठी नेता न केवल बांधों और सिंचाई परियोजनाओं का पैसा खा गए, बल्कि सरकार ने पानी के इस्तेमाल की नीति ही बदल दी। 2003 से 2011 तक महाराष्ट्र की पानी नीति में सिंचाई की जगह औद्योगिक इस्तेमाल को वरीयता पर रखा गया। नतीजतन पूरे विदर्भ में कीमती पानी की लूट शुरू हुई। इस दौरान जो बांध या जलाशय बने उनका पानी नेताओं की चहेती बिजली कंपनियां ले उड़ीं। यह आकलन अचरज में डालता है कि बारहवीं योजना में देश में जो एक लाख मेगावाट की क्षमता नई बिजली क्षमता जुडे़गी उसमें करीब 50000 मेगावाट अकेले महाराष्ट्र से आएगी। महाराष्ट्र में कोयले पर आधारित 71 बिजली संयंत्र लग रहे हैं, जिनमें 33 को मंजूरी मिल चुकी है और 38 सरकार की मेज पर हैं। इनमें अधिकांश संयंत्र विदर्भ के ग्यारह जिलों में लग रहे हैं जिन्हें 2,050 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी देने को सरकार की मंजूरी मिल चुकी है। ग्रीनपीस का आकलन है कि इनसे करीब 4,09, 800 हेक्टेअर भूमि की सिंचाई हो सकती थी। महाराष्ट्र की जल नीति 2011 में दोबारा बदली तब तक पानी की लूट सर के ऊपर निकल चुकी थी। राहुल गांधी की सियासत में अब विदर्भ फिट नहीं होता, लेकिन वहां विपत्ति तो जारी है। सिंचाई के पैसे और पानी की इस लूट का सबसे बड़ा शिकार भी विदर्भ ही हुआ है जहां से किसानों की आत्महत्या की खबरें कभी बंद नहीं होतीं। इस साल अब तक 536 आत्महत्याएं दर्ज हुई हैं और 2002 से अब तक 8200 किसान मौत को गले लगा चुके हैं। 35000 करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले में शामिल परियोजनाओं में अकेले 32 तो विदर्भ की हैं। सूखा प्रभावित इस इलाके में लंबित करीब 38 सिंचाई परियेजनाओं की लागत 300 फीसदी बढ़ा दी गई और विदर्भ सिंचाई विकास निगम ने इस बढ़ी हुई लागत को अगस्त 2009 में तीन माह के दौरान मंजूर करा लिया। नई सिंचाई परियोजनाएं पिछड़ीं और उनमें लूट हुई, जबकि दूसरी तरफ विदर्भ में 2003 से लेकर 2011 तक विदर्भ के छह प्रमुख जलाशयों से इतना पानी बिजली संयंत्रों को दिया गया जिससे 80,000 हेक्टेअर जमीन की सिंचाई हो सकती है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो बताता है कि 1995 से 2011 तक महाराष्ट्र में करीब 53818 किसानों ने आत्महत्या की है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र के बजट आंकडे़ प्रमाण हैं कि राज्य में सिंचाई पर सबसे ज्यादा खर्च इन्हीं पिछले पंद्रह सालों में हुआ है। इसी दौरान महाराष्ट्र में पानी के इस्तेमाल की नीति बदली और सूखे से मरते विदर्भ का पानी नेताओं की खासमखास कंपनियों के बिजलीघरों को दे दिया गया। किसानों की मौतों और राजनीतिक भ्रष्टाचार का ऐसा त्रासद अंतरसंबंध दुनिया में मुश्किल से मिलेगा। सत्ता में रहकर कारोबारी साम्राज्य बनाना भारत के लिए नया नहीं है। विदर्भ से बेल्लारी तक फैले सियासत के बिजनेस मॉडल अर्से से भारत का दुर्भाग्य बने हुए हैं और प्राकतिक संसाधनों की लूट में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। भ्रष्टाचार के खेल में दलगत जुगलबंदी भी अनोखी नहीं है। मगर महाराष्ट्र का सिंचाई घोटाला तो संवेदनहीनता का चरम है। यह रोजमर्रा का राजनीतिक भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि एक दर्दनाक लूट है। यहां लालची और भ्रष्ट सियासत की कीमत हजारों किसानों ने जिंदगी देकर चुकाई है। पानी की आस में तबाह खेती ने किसानों को कर्ज के जाल में फंसा दिया, जिससे बचने के लिए किसानों को मौत की शरण ही सहज जान पड़ी। 50,000 किसानों की मौत का आंकड़ा सामने रखने पर सिंचाई की यह लूट दरअसल एक नृशंस अपराध बन जाती है। नेताओं का लालच अब हत्यारा हो चला है। (लेखक दैनिक जागरण के राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख

Dainik Jagaran National Edition 22-10-2012 भ्रष्टाचार Pej-8

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का झंडा अन्ना हजारे के हाथों




जब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का झंडा अन्ना हजारे के हाथों से अरविंद केजरीवाल के पास आया तो इसमें एक नया जोश देखने को मिला। पिछले कुछ हफ्तों में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खुलासे सामने आए। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई सफल होती है या नहीं, लेकिन यह अपने पीछे एक बड़ी उपलब्धि छोड़ रही है। इसने मध्य वर्ग को जगा दिया है और शशि कुमार की कहानी इसे साबित करती है। शशि कुमार से मेरी मुलाकात दस साल पहले हुई थी। 22 साल के इस नौजवान ने हाल ही में गुड़गांव में एक कॉल सेंटर में नौकरी शुरू की थी। वह बिहार के एक गांव से आया था और उसके दोस्त यह नहीं जानते थे कि शशि और उसके परिवार को कई बार भूखे पेट ही सोना पड़ता था। उसके पिता ने किसी तरह दरभंगा में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम ढूंढ लिया था और गांव से निकल आए थे, लेकिन उसमें गुजारा न होने पर मां ने भी एक छोटे से स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। उनका बेटा हर सुबह मां की उंगली थामे स्कूल जाता। वह उसी स्कूल में अपनी मां की नजरों के सामने पला-बढ़ा। अपने बेटे को बिहार की इस अपमानजनक जिंदगी से बाहर निकालने के लिए उन्होंने उसे रातों में जग-जगकर पढ़ाया और उसे एक स्थानीय कॉलेज में दाखिला दिला दिया। कॉलेज खत्म होने पर उन्होंने उसे दिल्ली का रेलवे टिकट दिया। दस साल बाद शशि कुमार एक सफल नौजवान बन गया। एक भद्र और मेहनती नौजवान, जो मैनेजर की हैसियत तक पहुंच गया। उसने अपनी कंपनी के कर्मचारियों को अमेरिकी ग्राहकों से आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजी बोलना सिखाया। वह एक निजी बैंक से लोन पर लिए दो बेडरूम वाले फ्लैट में रहने लगा। उसने एक कार भी रख ली और अपनी बेटी को एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगा। जीवन की संभावनाओं ने उसकी जिंदगी बदल दी। वह भारतीय समाज के सबसे तेजी से बढ़ते नए मध्य वर्ग का एक उत्पाद है। क्या उसके पिता कभी ग्रामीण बिहार में ऐसी जिंदगी के बारे में सोच भी सकते थे? वह अब भी अपने मालिक के हाथों दबे कुचले जा रहे होते। पिता की मौत के बाद उसकी मां गुड़गांव में साथ ही रहने लगी। उसकी मां ने कहा, मैं नहीं जानती कि उसने यह सब कैसे किया। मैंने तो पाई-पाई जोड़कर उसे दिल्ली का रेलवे टिकट खरीद कर दिया था। बाकी सब उसने खुद किया। शशि कुमार की कहानी 1991 के उस दौर में ले जाती है जब भारत ने आर्थिक उदारवाद के लिए अपने रास्ते खोले थे और दूरसंचार क्षेत्र में आर्थिक सुधारों ने ही किसी अमेरिकी कंपनी के लिए यह संभव किया कि वह अपना काम भारत से आउटसोर्स कर सके। सूचना तकनीक के इंजीनियरों ने दिखाया कि वे तब उसकी आधी कीमत में सॉफ्टवेयर बना सकते हैं जब अमेरिका सोता है। अमेरिकी कंपनियों ने सुबह देखा कि आइटी सॉल्यूशन उनका इंतजार कर रहे हैं। धीरे-धीरे आउटसोर्सिग का धंधा अकाउंटेंट से लेकर वकीलों, वैज्ञानिकों और विज्ञापन पेशेवरों तक फैल गया और महानगरों में लाखों युवाओं को नौकरियां मिलीं। पिछले साल गुड़गांव के रास्ते पर एक मेट्रो स्टेशन पर मैं शशि कुमार से फिर मिला। वह अपने दोस्तों के साथ था। वे सभी मध्यवर्गीय थे, जो बाजार तो रोजाना जाकर उसमें अपनी भागीदारी करते हैं, लेकिन चुनाव में मतदान कर शायद ही किसी ने भागीदारी की हो, जैसे चुनाव गांव-देहात की चीज हों। ट्रेन आई और हम उसमें चढ़ गए। एक नौजवान ने मेरे लिए सीट छोड़ दी। मैं यह सोचकर खुश हुआ कि अब भी बुजुर्गो के लिए लोगों के दिलों में जगह बची है। शशि ने कहा, मुझे राजनीति से नफरत है। यह मुझे बिहार की याद दिला देती है। उसके एक दोस्त ने कहा, लेकिन अन्नाजी ने अपने धर्म केंद्रित नेतृत्व से हमें जगा दिया। राजनीतिक क्रांति के लिए नैतिक क्रांति जरूरी है। मैं उतरने के लिए खड़ा हुआ, लेकिन हमने आने वाले शनिवार को सिंधिया हाउस के पास वाले कॉफी कैफे डे पर मिलने की योजना बनाई। अन्ना ने राजनीति को भी जगा दिया। याद नहीं आता कि कभी इतने सारे नेता जेल गए हों। इसका थोड़ा सा श्रेय तो अन्ना को जाता ही है, जिन्होंने सरकार पर लोकपाल लाने का दबाव डाला। हाल के दिनों में इस आंदोलन के साथ भी कुछ अप्रिय हुआ, लेकिन अब तक मध्य वर्ग जाग चुका था। भारत में यह मध्य वर्ग आबादी का एक तिहाई या चौथाई है। यह स्कूटर पर चलने वाला मध्य वर्ग है, न कि कार में, यह और बात है कि यह बनना वैसा ही चाहता है। यानी देश की बड़ी आबादी बेहतरी चाहती है। इतिहास में पहली बार मध्य वर्ग सम्मानजनक जीवन का सपना देख रहा है। भारत का यह उभरता मध्य वर्ग दुनिया के तेजी से उभरते मध्य वर्ग का ही हिस्सा है। अपेक्षाएं पूरी न हो पाने से उपजे असंतोष के आधार पर ही यह मध्य वर्ग फल-फूल रहा है। दक्षिण कोरिया और ताइवान में इसी मध्य वर्ग ने तानाशाही सरकारें गिराईं। चीन में हजारों लोग बेहतर सार्वजनिक सेवाओं की मांग कर रहे हैं। दूसरे उभरते हुए देशों में अच्छे स्कूल, साफ पानी और अच्छे अस्पतालों की मांग हो रही है, लेकिन यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आर्थिक संकट के चलते मध्य वर्ग का स्तर गिरा है। इसमें कोई दोराय नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मध्य वर्ग का आक्रोश वैश्विक है। जल्दी ही शशि कुमार और उसके दोस्त आ गए। मैंने उन्हें कैप्यूकिनो जैसी चीजें ऑर्डर करते सुना। मुझे यह देख हैरानी हुई कि मध्य वर्ग में आने के बाद कैसे उसकी आदतें बदल जाती हैं। इनमें से कई ने कुछ साल पहले तक कॉफी देखी भी न होगी। ये 1991 के बाद बड़े हुए हैं, जिन्होंने कभी बिना घूस के फोन या गैस का कनेक्शन नहीं लिया। यह भी भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी अधीरता को दिखाता है। इस हफ्ते वे उतने गर्ममिजाज नहीं दिख रहे थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन सही नहीं चल रहा था। उनमें से किसी एक ने कहा कि मैंने प्रतिज्ञा ली है कि मैं किसी को घूस नहीं दूंगा। उसने कहा कि यदि हर कोई ऐसे ही सोचने लगे तो इससे धर्म क्रांति आएगी और राजनीतिक बदलाव खुद आ जाएगा। शशि ने मुझसे पूछा कि हमें क्या करना चाहिए। वे मेरी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखने लगे। मुझे यह नैतिक भार पसंद नहीं आया। मैंने कहा, तुम्हें राजनीति से जुड़ना चाहिए। शशि ने कहा, लेकिन हमारी नौकरियां और परिवार हैं। मैंने कहा, अपने पड़ोस में हर हफ्ते एक घंटा काम करो। उसे भ्रष्टाचार मुक्त बनाओ और तुम्हें तुम्हारा राजनीतिक धर्म मिल जाएगा। हमारे बीच एक चुप्पी पसर गई। मैंने पूछा, तो अब अगली बार तुम लोग मतदान करोगे? उनमें से एक ने हां में सिर हिलाया। मुझे लगा कि दुनियाभर में अन्याय हो रहा है, लेकिन शशि और उसके दोस्तों जैसे युवा इस पूर्वाग्रह को तोड़ते हैं कि मध्य वर्ग सिर्फ अपने बारे में सोचता है। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)


Dainik Jagaran National Edition 22-10-2012 भ्रष्टाचार Pej-8