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नजरिया
उपेंद्र राय
महिलाओं का सही मायने में
सशक्तिकरण ही हमें खाप पंचायतों और इनके जैसे दूसरे सं गठनों
के आतंक से छु टकारा दिला सकता है । इसमें समय लग सकता है, ले किन दकियानूसी
को करारा जवाब देने का यही सही तरीका है। फिलहाल के लिए हम सबकी जिम्मेदारी
यह है कि न केवल खाप पंचायतों का बल्कि उनका समर्थ न करने वालों का
भी बहिष्कार हो
हरियाणा के खाप पंचायत का बयान आया है
कि बलात्कार
की घटनाओं को रोकने के लिए यह जरूरी है कि लड़कियों की शादी पंद्रह
साल से पहले ही करा दी जाए। इतना ही काफी नहीं था तो एक बड़े नेता का
बयान आया कि लड़कियों की इज्जत बचानी है तो उनकी जल्दी शादी करानी ही होगी।
और इस सबके बाद एक और बयान आया है,
और इस बार भी एक जिम्मेदार नेता का,
कि बलात्कार के 90
परसेंट मामले महिलाओं की सहमति से होते हैं। इन बयानों
को सुनने के बाद मेरे मन में एक ही खयाल आता है- क्या हम उसी सभ्य समाज
में जी रहे हैं जिसकी परिकल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी? या तो हमारे पूर्वजों की परिकल्पना में कोई कमी रह
गई या हम हर दिन अपने पूर्वजों के
साथ दगा कर रहे हैं। संविधान बनाने वालों ने महिलाओं को समाज
में बराबरी का दर्जा
दिया, उनको
वोट देने का अधिकार दिया, उनको
ब्याहने की न्यूनतम सीमा
तय की। क्या यह सब वैसे ही हो गया? इनके पीछे कोई वजह रही होगी। इन कदमों से
वे पूरे समाज को एक संदेश देना चाहते थे। जिस सभ्य समाज को बनाने की परिकल्पना
हमारे महात्माओं ने की थी, संविधान ने उसे ही कोडिफाई करके मूर्त रूप देने की कोशिश की। अफसोस की बात
है कि संविधान बनने के 62 साल
बाद भी समाज
के तथाकथित ठेकेदार इस तरह का घिनौना फरमान जारी करते हैं। इस तरह का बिना
सिर-पैर का तर्क देकर वे न केवल संविधान का अपमान करते हैं बल्कि समाज को
गुमराह भी कर रहे हैं। इस तरह की बातें आखिर उठती क्यों हैं? दरअसल संविधान के निर्माताओं ने देश में
राजनेताओं को बड़ी भूमिका दी थी। उन्हें
देश के तमाम संसाधनों को कस्टोडियन तो बनाया ही गया, साथ ही उनको समाज को आगे
ले जाने की जिम्मेदारी भी दी गई। मकसद यह था कि हर पांच साल पर चुनाव होंगे
तो नेता लोग कभी भी अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं पाएंगे। समाज को आगे
ले जाने का मतलब यह था कि इसकी विकृतियों को सुधारना। लेकिन राजनीति में
ज्यों-ज्यों प्रतिस्पर्धा बढ़ी, त्यों-त्यों वोट हथियाने के लिए वे सारे हथकंडे अपनाए जाने लगे जो किसी
भी सभ्य समाज के साथ मजाक से कम नहीं
था। राजनीतिक हथकंडे में नेताओं के साथ खड़े हैं समाज के वे
तथाकथित ठेकेदार
जिन्हें सामाजिक विकृतियों में अपना फायदा दिखता है। सामाजिक विकृतियों
में फलने-फूलने वाले ऐसे ठेकेदारों की पूरी मंडली है खाप पंचायत। यहां
दकियानूसी बिकती है, घटिया
सोच को पनाह मिलती है, बुराइयों
पर पर्दा डाला
जाता है। इस दुराचार के मठ में अत्याचार बिकता है। और इनकी दबंगई को नेताओं
का संरक्षण मिलता है क्योंकि ये चुनाव में वोट भी लाते हैं। अब यह सवाल
उठता है कि इन मठाधीशों की तरफ से महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ इस तरह
के तुगलकी फरमान क्यों बार-बार आते रहते हैं?
इसके लिए यह जानना जरूरी है कि संविधान में महिलाओं के
सशक्तीकरण की बात क्यों की गई। सबसे बड़ी बात यह कि देश की आधी आबादी अगर लाचार हो
तो समाज पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो
सकता है। इतनी ही जरूरी यह बात भी है कि सशक्त महिला सभ्य
समाज की नींव होती
हैं। हम सबकी पहली पाठशाला हमारा परिवार होता है और वहां की शिक्षक मां
होती है। मां के दिए हुए संस्कार हमारे साथ पूरी जिंदगी रहते हैं। और जिस
समाज में मां जितना सशक्त होगी, वह समाज उतना ही स्वस्थ और प्रगतिशील होगा। लेकिन चूंकि भारतीय समाज पुरुष
प्रधान समाज है इसलिए समाज की
मान-मर्यादा,
नियम-कायदे पुरुषों के नजरिए से रची और गढ़ी गई हैं। प्रगतिशील
समाज खाप पंचायत जैसे संगठनों के लिए कैंसर है,
जो उसे धीरे-धीरे
खत्म कर देगा। ऐसे में खाप पंचायत यह कैसे बर्दाश्त कर सकती
है कि समाज में
मां का सम्मान हो। मां को कमजोर करने के मकसद से इस तरह की संस्था महिलाओं
को कंट्रोल करना चाहती है। कंट्रोल करने के कौन से तरीके हो सकते हैं-
लड़कियों की जल्दी शादी करा दो, उनके कॉलेज जाने पर बैन लगा दो, उन्हें अकेले बाजार जाने से मना कर दो, उनके लिए ड्रेस कोड तय कर दो, उनके मोबाइल फोन के उपयोग पर बैन लगा दो, उनकी शादी को रेगुलेट करो, अपने मन से हुई शादी में हर संभव अडंगा लगाओ। इन
हथकंडों का एक ही मकसद होता है-
महिलाओं को कंट्रोल किया जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो एक
तरह से महिला देह
पर पुरुषों का अधिकार है। महिला अपने फैसले खुद नहीं ले सकती। और अगर कोई
महिला अपने फैसले खुद लेने लगे तो पुरुषों का आधिपत्य डगमगाने लगता है और
बौखलाहट में इस तरह के वाहियात फरमान जारी होने लगते हैं। इंडिपेंडेंट महिला
दकियानूसी समाज के लिए बड़ा खतरा होती है। इतिहास गवाह है कि जिस समाज
में इंडिपेंडेंट महिलाओं की कद्र होती है वहां भ्रष्टाचार कम होता है, अपराधों की संख्या में कमी होती है, आर्थिक तरक्की को बल मिलता है, जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार कभी भी
बेकाबू नहीं होती है, बलात्कार
जैसे घिनौने
मामले लुप्त हो जाते हैं और स्वस्थ मानसिकता वाला समाज बनता है। और खाप
पंचायत जैसी संस्था का इस तरह के समाज में वजूद ही नहीं हो सकता है। इसीलिए
हमें यह समझना होगा कि खाप पंचायतों का इस तरह का तुगलकी फरमान उनकी अस्तित्व
की लड़ाई है। अब सवाल उठता है कि इन तालिबान फरमानों से समाज को छुटकारा
कैसे मिले। महिलाओं का सही मायने में सशक्तिकरण ही हमें खाप पंचायतों
और इनके जैसे दूसरे संगठनों के आतंक से छुटकारा दिला सकता है। इसमें
समय लग सकता है, लेकिन
दकियानूसी को करारा जवाब देने का यही सही
तरीका है। फिलहाल के लिए हम सबकी जिम्मेदारी यह है कि न केवल
खाप पंचायतों का
बल्कि उनका समर्थन करने वालों का भी बहिष्कार हो। इस तरह के लोग संविधान के
मूल पर हमला कर रहे हैं और उन्हें यह कड़ा संदेश देना जरूरी है कि उनकी बेवकूफी
अब देश बर्दाश्त नहीं करेगा। हम उनके अस्तित्व को नकार देंगे तो हो
सकता है कि बदलते समय और समाज के हिसाब से वे खुद को भी बदलें। इसके साथ ही
हमें कानून व्यवस्था के रखवालों पर भी दबाव बनाना होगा कि संविधान की भावना
की धज्जी उड़ाने वाले बचने न पाएं। हम अगर ऐसा नहीं करते हैं तो अपने समाज
को असभ्य लोगों के चंगुल में ढकेलने के लिए हम भी जिम्मेदार होंगे। फैसला
हम सबको करना है।
(लेखक
सहारा न्यूज नेटवर्क के एडिटर एवं न्यूज डायरेक्टर हैं)
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Rashtirya Sahara National Edition 14-10-2012 PeJ -10 Hkz”Vkpkj)

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