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संवाद
रणविजय सिंह
राजनीतिक दलों के नेताओं में
एक अघोषित सहमति-सी हो गई थी कि नेताओं के परिवारों की सं
पत्तियों पर अंगुली नहीं उठाई जाएगी। लेकिन अब अरविंद और उनके साथियों ने
इस समझौते को तोड़ने का काम किया है। इसलिए राजनीतिक भूचाल आना लाजमी था यूपीए
सरकार और कांग्रेस वाड्राडीएलएफ प्रकरण पर कुछ भी कहें, पर केजरीवाल
और उनके साथियों ने गांधी परिवार को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
इससे पीछा छुड़ा पाना अब कांग्रेस नेतृत्व और यूपीए सरकार के लिए आसान नहीं
होगा। कांग्रेस की आम छवि भ्रष्टाचार को उजागर होने से रोकने और भ्रष्टाचारियों
के बचाने की हो गई है
पूर्वाचल में एक प्रचलित मुहावरा
है- ‘जबरा
मारै रोवन न देय’।
यह उक्ति कांग्रेस और यूपीए सरकार पर
खूब जमती है। नित नए उजागर हो रहे भ्रष्टाचार के मामलों से
वे हलकान हैं। भ्रष्टाचार
के बचाव में उतरना अब उनकी आदत में शुमार हो गया है। पिछले सप्ताह सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद
केजरीवाल-प्रशांत भूषण के यूपीए अध्यक्ष
सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ की मेहरबानी
से अकूत संपत्ति
बनाने के सनसनीखेज खुलासे से तूफान आ गया है। सरकार के मंत्री और संगठन
के बड़े नेता वाड्रा के बचाव में उतर पड़े हैं। केजरीवाल की नीयत पर सवाल
खड़ा किया जा रहा है। सभी यह साबित करने में लग गए हैं कि वाड्रा-डीएलएफ लेनदेन में कुछ गलत
नहीं हुआ। किंतु इस मामले में मंत्रियों
की सक्रियता ने आम जनता के शक को और गहरा कर दिया है। क्या
सत्ता संपन्न लोगों
को लूट की खुली छूट है? क्या
50 लाख
की पूंजी से तीन साल में 300 करोड़ की संपत्ति बनाई जा सकती है? इस डील पर सरकार की सफाई जनता के गले उतर
नहीं रही है। घोटालों पर पर्दा डालने की सरकार की शैली काफी पुरानी है। टूजी
घोटाला, कॉमनवेल्थ
तथा कोलगेट जैसे बड़े घोटालों पर वह ऐसा ही करती रही है। किंतु वाड्रा-डीएलएफ डील में
उसका अतिरेक देखने लायक था। मामला
गांधी परिवार के दामाद से जुड़ा था, इसलिए वफादारी दिखाने का भरपूर मौका था।
मंत्रियों में होड़-सी लग गई। कानून मंत्री ने सोनिया गांधी के लिए ‘जान देने’ का बयान देने में तनिक गुरेज नहीं
किया, तो
वित्तमंत्री ने किसी तरह की जांच कराने से इनकार कर दिया। आम कांग्रेसी भी
केजरीवाल-प्रशांत भूषण के पुतले फूंकने में लग गए। सवाल यह है कि क्या
केजरीवाल ने वाड्रा पर आरोप लगाकर गुनाह किया है?
यह जलजला क्यों?
यह देखकर मुझे आश्र्चय नहीं हो रहा है बल्कि बोफोर्स घोटाले की याद
ताजा हो उठी है। उस समय राजीव गांधी
पर बोफोर्स तोपों में दलाली का आरोप उन्हीं की सरकार में
मंत्री रहे वीपी सिंह
ने लगाया था। उस समय भी ऐसा ही हंगामा हुआ था। उनके खिलाफ दहिया ट्रस्ट
का मामला उठा था। वीपी सिंह को उत्तर प्रदेश विधानसभा में उपस्थित होकर
सफाई देनी पड़ी थी। यह 1989 में
चुनावी मुद्दा बना और जनता ने
कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इस बार
सोनिया गांधी के दामाद, प्रियंका के पति और राहुल गांधी के
बहनोई वाड्रा पर संपत्ति बनाने
का आरोप लगाने का साहस इंडिया अगेंस्ट करप्शन के लोगों ने
किया है। कांग्रेस
और सरकार इस मामले को भले सिरे से नकार दें,
किंतु यह उनके गले की
फांस बन गई है। जनता इसे आसानी से भुला नहीं पाएगी। क्योंकि
यह मामला गांधी
परिवार से जुड़ा है इसलिए चुनावों में इसकी गूंज को कांग्रेस रोक नहीं
सकेगी? कांग्रेस
को लगता है कि यदि वाड्रा का बचाव नहीं हुआ तो सोनिया गांधी सीधे निशाने पर आ जाएंगी।
पार्टी इसी से डरी हुई है और वह केजरीवाल
के खुलासे को षड्यंत्र की संज्ञा दे रही है, हालांकि उसकी आक्रामकता उल्टे उसके
ही गले पड़ती जा रही है। कांग्रेस का पुराना राजनीतिक इतिहास भले हो, पर उस पर नेहरू-गांधी परिवार का ही
राज चलता है। जैसे राजा वफादारी का ईनाम
देते थे, वैसी ही रीति-नीति यहां भी विद्यमान है। इसीलिए आपातकाल के
दौरान कांग्रेस
अध्यक्ष रहे देवकांत बरुआ ने ‘इंदिरा इज इंडिया,
इंडिया इज
इंदिरा’ का नारा देकर अपनी वफादारी का परिचय दिया था। इंदिरा गांधी
की मौत के
बाद आनन-फानन में राजीव गांधी को प्रधानमंत्री की शपथ दिलाकर तत्कालीन राष्ट्रपति
ने अपनी वफादारी का इजहार किया था। सोनिया गांधी के विदेशी मूल के
कारण प्रधानमंत्री बनने का विरोध होने पर उनके पक्ष में दीवार बनकर खड़े होने
वाले कांग्रेसियों को मिला राजनीति लाभ किसी से छुपा नहीं है। वर्ष 2004 में सोनिया गांधी
द्वारा प्रधानमंत्री पद ठुकराये जाने पर हुआ यशोगान अभी लोगों के मानस पटल पर है। सुशील
कुमार शिंदे को गृहमंत्री और नेता सदन
की कुर्सी का तोहफा वफादारी का पुरस्कार ही तो है, इसलिए कानून मंत्री सलमान
खुर्शीद का सोनिया के लिए जान देने वाला बयान वफादारी जताने की श्रृंखला
की एक कड़ी मात्र है। वाड्रा को लेकर कांग्रेसियों का क्रंदन भी इसी
वफादारी का हिस्सा है। हमें नहीं भूलना चाहिए कोलगेट घोटाले में प्रधानमंत्री
पर अंगुली उठी थी। मानसून सत्र में भाजपा ने सदन तक चलने नहीं दिया
था। उस समय भी सरकार के मंत्रियों और संगठन की आक्रामकता इतनी नहीं दिखी
थी, जितनी
वाड्रा-डीएलएफ डील के उजागर होने के बाद देखने को मिली है। वाड्रा-डीएलएफ लेनदेन कोई नया नहीं
है। वर्ष 2011 में
भी यह सुर्खियां बन चुका है। इस रियल एस्टेट कंपनी के प्रति हरियाणा सरकार की
दरियादिली के किस्से
अदालत तक पहुंच चुके हैं। जिन किसानों की भूमि अधिग्रहीत हुई, उनका करुण क्रंदन विपक्षी पार्टियों तक को
तब सुनाई नहीं दिया। क्योंकि राजनीतिक
दलों के नेताओं में एक अघोषित सहमति-सी हो गई थी कि नेताओं
के परिवारों की संपत्तियों
पर अंगुली नहीं उठाई जाएगी। लेकिन अब अरविंद और उनके साथियों ने
इस समझौते को तोड़ने का काम किया है। इसलिए राजनीतिक भूचाल आना लाजमी था।
आज प्रमुख विपक्षी दल भाजपा और वामपंथी दल सामाजिक कार्यकर्ताओं को मिल रहे
जनसमर्थन को देखते हुए वाड्रा के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। यह सच है कि कांग्रेस
भले आज केजरीवाल के निशाने पर हो किंतु अन्य दलों के नेता भी कम बेचैन
नहीं हैं। उन्हें यह भय सताने लगा है कि कहीं अगला निशाना वह न हों। क्योंकि
केजरीवाल ने 16 अक्टूबर
को एक अन्य बड़े नेता के भ्रष्टाचार को
उजागर करने का ऐलान किया है। उन्होंने ऐसा कर यह बता दिया है
कि पक्ष हो अथवा
विपक्ष, भ्रष्टाचार
के मामले में सभी हमाम में नंगे हैं। इस सच को समझने के लिए एनसीपी की बृहस्पतिवार
को हुई राष्ट्रीय कार्यसमिति का जिक्र
करना चाहूंगा। इस बैठक में सोनिया गांधी के दामाद वाड्रा ही
छाये रहे। पूरी पार्टी
उनके बचाव में उतर आई। ऐसा नहीं कि शरद पवार का सोनिया गांधी से कोई
विशेष लगाव है। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि कहीं आगे चलकर उनके परिवार पर
भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो कांग्रेस साथ खड़ी दिखे। क्योंकि पवार के दामाद
और सुप्रिया सुले के पति सदानंद सुले का नाम भी लवासा घोटाले में उछल चुका
है। उनके रिश्ते टूजी घोटाले में फंसी डीबी रियल्टी से भी बताए जाते हैं।
इसी तरह 72 हजार
करोड़ के महाराष्ट्र सिंचाई घोटाले में पवार के भतीजे अजित पवार का कुछ दिनों पूर्व इस्तीफा
हो चुका है। दिलचस्प बात यह है कि
यूपीए सरकार के इस कार्यकाल में जो भी घोटाले उजागर हुए हैं, उसमें कैग और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका
है। इसीलिए कांग्रेसी कैग को कोसते रहे
हैं। न्यायालय की सक्रियता के चलते भ्रष्टाचार में लिप्त
नेताओं को जेल जाना
पड़ा है, तो
कॉरपोरेट घरानों, नेताओं
और नौकरशाही की सांठ-गांठ से
सरकारी-गैर सरकारी संपत्ति की लूट का विरूपित चेहरा सामना
आया है। मंत्रियों
और सांसदों ने खुद को और अपने परिवारीजनों को लाभ पहुंचाने के लिए
नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई हैं,
जिससे जनता का भरोसा नेताओं से उठता जा रहा है। कांग्रेस की आम छवि
भ्रष्टाचार को उजागर होने से रोकने और
भ्रष्टाचारियों के बचाने की बन गई है। ऐसे में पूरी यूपीए
सरकार और कांग्रेस
वाड्रा-डीएलएफ प्रकरण पर कुछ भी कहें,
पर केजरीवाल और उनके
साथियों ने गांधी परिवार को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
इस मामले से पीछा
छुड़ा पाना अब कांग्रेस नेतृत्व और यूपीए सरकार के लिए आसान नहीं होगा।
जनता इतनी सचेत हो चुकी है कि उसे चोरी और फिर सीनाजोरी अब बर्दाश्त नहीं।
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Rashtirya Sahara National Edition 13-10-2012 Hkz”Vkpkj
Pej -10

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