Saturday, December 8, 2012

पिछले एक साल में भ्रष्टाचार बढ़ा



नई दिल्ली (एजेंसी)। भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ भले ही आंदोलन चल रहे हैं, लेकिन आम आदमी को इससे राहत नहीं है। एक अध्ययन में कहा गया है कि बड़े शहरों में झुग्गियों में रहने वाले 60 फीसद से अधिक लोगों का मानना है कि पिछले एक साल में भ्रष्टाचार में इजाफा हुआ है। ‘सीएमएस इंडिया करप्शन स्टडी 2012’ ने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार पिछले बारह महीनों बढ़ा है जबकि इस दौरान देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आंदोलन हुए। ‘सेंटर फार मीडिया स्टडीज’ द्वारा यह अध्ययन अहमदाबाद, बेंगलुरू, भुवनेर, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, गोवा, कोलकाता और मुंबई की झुग्गियों में किया गया। इसमें कहा गया कि इन सभी शहरों में झुग्गियों में रहने वालों ने कहा कि पुलिस सेवा में विशेष रूप से भ्रष्टाचार बढ़ा है। शुक्रवार को जारी अध्ययन में कहा गया कि 2012 में नौ बड़े शहरों में झुग्गियों में रहने वाले पचास फीसद से अधिक लोगों का मानना है कि पिछले 12 महीनों में सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार में इजाफा हुआ है जबकि करीब 29 फीसद की राय है कि सावर्जनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार लगातार बना हुआ है। करीब 88 फीसद लोगों ने कहा कि उन्हें पिछले एक साल में पुलिस सेवा में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा। अध्ययन ने कई रूचिकर बातों पर भी प्रकाश डाला जिसमें पुलिस को ‘अक्सर दी जाने वाली राशि’ शामिल थी। यह राशि पांच सौ रुपए थी और दिल्ली में एक झुग्गीवासी द्वारा पुलिस को आवासीय प्लाट के लिए सात हजार रुपए दिए गए। कोलकाता में एक झुग्गीवासी ने मासिक राशन के लिए पांच रुपए दिए। इस सव्रेक्षण के अनुसार, अहमदाबाद में सव्रेक्षण में शामिल लोगों में से 23 फीसद को ही इस साल भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा जबकि 2008 में यह आंकड़ा 41 फीसद था। हालांकि अन्य शहरों में इस आंकड़े में बढोत्तरी दर्ज की गई और मुंबई में 96 फीसद झुग्गीवासियों का कहना है कि वह भ्रष्टाचार के शिकार हैं। 2008 में यह केवल 17 फीसद था। यह अध्ययन ऐसे समय आया है जब सामाजिक संगठन मजबूत लोकपाल विधेयक की मांग कर रहे हैं। अध्ययन में कहा गया कि वर्ष 2008 के बाद से शहरी भारत में भ्रष्टाचार की घटनाएं 34 फीसद से 67 फीसद बढ़ी हैं। जितने लोगों से रित देने के लिए कहा गया, उनमें से 84 फीसद ने सेवाएं लेने के लिए रित दी। इसमें कहा गया कि लोगों ने मासिक राशन, राशन कार्ड, नया बिजली कनेक्शन, जल आपूर्ति, कूड़ा करकट हटाने, अस्पतालों में ओपीडी कार्ड बनाने, प्राथमिकी दर्ज कराने या पुलिस रिकार्ड से आरोपी का नाम हटाने के लिए रित दी। झुग्गीवालों ने कहा, पुलिस सेवा में विशेष रूप से बढ़ा है भ्रष्टाचार, जबकि इस दौरान देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आंदोलन हुए अध्ययन
1.       Rashtirya sahara National edition 8-12-2012 Page -2 Hkz”Vkpkj)

Friday, November 30, 2012

कैग ने फिर सरकार को लपेटा



ठ्ठ जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने केंद्र की जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम) में मकानों व बुनियादी ढांचे के निर्माण की सुस्त चाल पर सरकार को लपेटा है। संसद में गुरुवार को पेश अपनी रिपोर्ट में कैग ने कहा है कि योजना के तहत 115 करोड़ रुपये की राशि को शहरी नवीनीकरण के बजाय अन्य कार्यो में खर्च कर दिया गया। जबकि मिशन के तहत मंजूर 2815 परियोजनाओं में महज 253 निर्धारित समय 31 मार्च, 2011 तक पूरी हुई हैं। कैग के मुताबिक, सरकार के मंत्रालय इस तरह की विशालकाय योजना को चलाने और निगरानी करने में सक्षम नहीं हैं। लिहाजा केंद्र को राज्य सरकारों के साथ मिलकर योजना की खामियों की पहचान कर उन्हें दूर करने के लिए दो वर्ष में इंतजाम करने चाहिए। कैग की 103 पेज की रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 से 2011 के दरम्यान 1517 आवास तथा 1298 बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। लेकिन आवास योजनाओं में सिर्फ 22 योजनाएं मार्च 2011 के तय समय पर पूरी हुईं। जबकि 1298 शहरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में केवल 231 को समय पर पूरा किया जा सका। मिशन के तहत आठ मामलों में धन को दूसरे कार्यो में लगाया किया गया। ऐसा झारखंड, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में हुआ। यहां 115 करोड़ की राशि दूसरे कार्यो में लगाई गई। एक मामले में नगर निगम के कर्मचारियों को वेतन देने में धन का इस्तेमाल हुआ, जबकि बाकी कार्यो का मिशन से कोई संबंध ही नहीं था। मालूम हो कि जेएनएनयूआरएम को दिसंबर 2005 में शुरू किया गया था। इसके तहत कुल एक लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश से शहरों का कायाकल्प किए जाने का प्रस्ताव है। पहले निवेश में केंद्र व राज्यों सरकारों की हिस्सेदारी आधी-आधी थी, लेकिन बाद में वर्ष 2009 में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी बढ़ाकर 66,084.65 करोड़ रुपये कर दी गई। जेएनएनयूआरएम को वर्ष 2012 में पूरा करने का लक्ष्य है। इसके तहत 65 प्रमुख शहरों को कवर किया जाना है।
1.        Dainik Jagran National Edition 30-11-2012 Page -3 (Hkz”Vkpkj)

Monday, November 19, 2012

घपले-घोटालों के इस दौर में पूंजीवाद को अनैतिक मानने की गहराती धारणा




वह अक्टूबर के शुरुआती दिनों की एक खुशनुमा शाम थी। एक मुख्य समाचार चैनल के एंकर अरविंद केजरीवाल के नवीनतम शिकार की करतूतों की व्याख्या करते हुए गला फाड़-फाड़कर लालच पर दोष मढ़ रहे थे। उसी दिन केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ से गलत तरीके से सस्ती जमीन लेने के आरोप लगाए थे। अगले ही पल एंकर बताने लगे कि इस पूरी समस्या की जड़ क्रोनी कैपिटलिज्म यानी राजनेताओं की मिलीभगत से चलने वाले व्यावसायिक उपक्रम हैं। हमारे मीडिया में शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब पूंजीवाद की व्याख्या के लिए लालच शब्द का इस्तेमाल न किया जाता हो। वे कहते हैं कि यदि समाजवाद में ईष्र्या पाप है तो पूंजीवाद में लालच। पूंजीवाद को लालच की व्यवस्था तक कह दिया जाता है। यही कारण है कि यह भारत में आसानी से नहीं पनप पा रहा है। बहुत से भारतीय पूंजीवाद में खोट ढूंढते नहीं थकते। वे इसे आधुनिक पंथनिरपेक्ष पश्चिम का उत्पाद बताते हैं, जिसमें धार्मिक मूल्यों का अवमूल्यन हो गया। पूंजीवाद के खिलाफ हमारी धारणा शायद साम्यवाद के असफल होने के बाद तब बनी जब लोगों में यह विश्वास बढ़ने लगा कि बाजार बेहतर समृद्धि लेकर आता है, लेकिन पूंजीवाद अनैतिक व्यवस्था है। वे अब भी यही मानते हैं कि नैतिकता को धर्म आधारित ही होना चाहिए। पूंजीवाद को लालच बताना भूल है। हम बाजार में स्वहित और स्वार्थ या लालच के बीच उलझ जाते हैं। पूंजीवाद के मूल में एक ही विचार है, साधारण और स्वहित केंद्रित ऐसे लोगों का लेन-देन, जो बाजार में शांतिपूर्वक अपना हित तलाशते हैं। एडम स्मिथ ने इसे हमारी सस्ता खरीदने की मंशा और अपना हित देखते हुए बेचने की चाहत कहा है। यह ठीक वैसी ही भावना है जैसे कोई सुबह-सुबह अपने बिस्तर से खुद ही उठता है या बारिश में अपना छाता लेकर निकलता है। इसमें स्वार्थ जैसा कुछ नहीं है। इंसान होना स्व-केंद्रित होना है और यही बात बाजार पर लागू होती है। दूसरी तरफ लालच या स्वार्थ इस स्वहित की अति हो जाना है और इसमें अक्सर दूसरे के अधिकारों पर अतिक्रमण कर लिया जाता है। यह हम सभी में है, लेकिन हम इसे दूसरों में आसानी से देख लेते हैं। लालच से लूट को बढ़ावा मिल सकता है और दूसरे को चोट पहुंचाने की मानसिकता से हिंसा को, जो महात्मा गांधी के बताए अहिंसा पथ के विरुद्ध है। लालच का दूसरा सकारात्मक पहलू भी है और जब इस पहलू को सही दिशा दी जाती है तो यह जिंदगी बनाने वाला होता है। मानव अस्तित्व की समस्या यही है कि इंसान के भीतर मौजूद जो शक्तियां उसे आसानी से बुराई की ओर ले जा सकती हैं, वही उसे मानव जाति की भलाई के लिए भी प्रेरित कर सकती हैं। बस उन्हें सही दिशा देने की जरूरत होती है। जो लोग सोचते हैं कि पूंजीवाद को साम्राज्यवादी पश्चिम ने हम पर थोपा है वे भी गलत हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रेडरिक हाइक ने बाजार को सहज प्रवृत्ति का बताया है। इंसान के लिए वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान स्वाभाविक है और इसी तरह हर समाज बाजार में व्यवहार के मार्गदर्शन के लिए धन, कानून, परंपरा और नैतिकता विकसित करता है। ये इंसान के उद्यम के स्वाभाविक उत्पाद हैं। पश्चिम के साम्राज्यवादी या आधुनिक होने से पहले भारत के बाजार में प्रतियोगिता थी। यह पसंद और नापसंद का विषय हो सकता है, लेकिन भारत ने एक प्रकार के लोकतांत्रिक पूंजीवाद की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। भारत की मुक्त बाजार से मोहब्बत शुरू हुए और समाजवाद से मोहभंग हुए दो दशक बीत चुके हैं। साम्यवादी अल्पसंख्यकों के छोटे से धड़े के अलावा भारत में मुश्किल से ही कोई ऐसा होगा जो उत्पादन में सरकार का स्वामित्व चाहता है, जहां प्रतियोगिता की गैर मौजूदगी में नागरिक का चरित्र ज्यादा बिगड़ जाता है, जैसा कि हम लाइसेंस राज के दिनों में देख चुके हैं। भारतीयों का मानना है कि पूंजीवाद प्रभावशाली तो है, मगर नैतिक नहीं है। हालांकि बाजार न तो नैतिक होता है और न अनैतिक। बाजार में स्वहित इंसान को आम तौर पर अच्छे व्यवहार की ओर ले जाता है। जो विक्रेता अपने ग्राहक को ठगने की कोशिश करता है वह बाजार का बड़ा हिस्सा खो देगा। खामियों वाले उत्पाद बेचने वाली कंपनी के ग्राहक टूट जाएंगे। जो कंपनी सबसे योग्य कर्मचारियों को आगे नहीं बढ़ाती वह अपने प्रतिद्वंद्वियों से प्रतिभा के मामले में पिछड़ जाएगी। झूठ और ठगी किसी भी फर्म की छवि नष्ट कर देंगे। कर्जदाता और आपूर्तिकर्ता उसे अछूत बना देंगे। इस प्रकार मुक्त बाजार नैतिक व्यवहार की ज्यादा प्रबल संभावनाएं बनाते हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब राज्य की संस्थाएं ईमानदारी से इसके पक्ष में करें। अब सवाल उठता है कि यदि बाजार में नैतिकता पहले से ही है तो उसमें इतने बुरे लोग क्यों हैं? इसका जवाब यही है कि हर समाज में बुरे लोग होते हैं और इसीलिए हमें पुलिस और जजों जैसे प्रभावी नियंताओं की जरूरत होती है। हमें अपने संस्थान इस तरह बनाने चाहिए कि बुरे लोग पकड़े जा सकें और वे अच्छे लोगों का शोषण न करें। हमारी चिंता का दूसरा कारण है बाजार समर्थक होने को व्यापार समर्थक मानने की भूल करना। बाजार समर्थक होने का मतलब है प्रतियोगिता में भरोसा करना, जो कीमतें कम रखने में मदद करता है और उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाता है। प्रतियोगिता का एक मतलब यह भी है कि कमजोर प्रबंधन के अभाव में कई कारोबार प्रतियोगिता नहीं कर पाते और दम तोड़ देते हैं। किंगफिशर एयरलाइंस और एयर इंडिया को इसी तरह दम तोड़ने के लिए छोड़ देना चाहिए और उन्हें सरकारी पैकेज नहीं देना चाहिए। इस तरह बाजार समर्थक होना नियम आधारित पूंजीवाद की ओर ले जाता है और व्यापार समर्थक होना क्रोनी कैपिटलिज्म की ओर। कहने की जरूरत नहीं कि यही अंतर हमारे सुधारकर्ताओं की सबसे बड़ी भूल थी। भारत में आज क्रोनी कैपिटलिज्म इसलिए है, क्योंकि बहुत से क्षेत्र सुधारों से दूर हैं। वे लोग भी गलत हैं, जो कहते हैं कि हम नैतिक अवमूल्यन के दौर में जीने को अभिशप्त हैं। हां यह मुक्त युग है, जिसमें भारतीय मध्यवर्ग की खुशियां बढ़ी हैं। यह भौतिकतावादी, उपभोक्तावादी और पूंजीवादी दौर है, लेकिन इन सभी को लालच से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। आज के युवा भगवान से ज्यादा अपने साथियों के काम से प्रेरित होते हैं, जिनका मानना है कि भौतिकवाद में अन्याय की अनदेखी होती है और नैतिकता तब थी जब उस पर धर्म का एकाधिपत्य था। वे आजादी के बाद से भारत में नैतिक उत्थान को देख ही नहीं रहे हैं। लिंग और जातिगत समानता इसकी मिसाल हैं। इसलिए अगली बार जब केजरीवाल किसी घोटाले का खुलासा करें या टीवी गड़बड़ी को लालच कहे तो इस जाल में न फंसना कि पूंजीवादी संस्कृति नैतिक रूप से बीमार है और हमें धर्म या समाजवाद में निहित नैतिकता की ओर लौट जाना चाहिए। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)

1.       Dainik Jagran National Edition 19-11-2012 Page -8 (Hkz”Vkpkj)

Tuesday, November 6, 2012

सच से भागती केंद्रीय सत्ता





अपने मंत्रिमंडल को कथित तौर पर युवा और ऊर्जावान बनाने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नए मंत्रिमंडल से राष्ट्र निर्माण में जुट जाने की अपील की है। महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण जनता का विश्वास सरकार पर घटा है। उसे दोबारा हासिल करने का मंत्र देते हुए उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्रनिर्माण के काम में आरोप भी लगते हैं तो उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। इसका क्या अर्थ लगाया जाए? इस सरकार पर घोटालों के आरोप विपक्ष ने नहीं लगाए। मीडिया ने भी नहीं लगाए। ये आरोप संवैधानिक निकाय-नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग ने लगाए हैं और जांच में वे सही पाए जा रहे हैं। जब सरकार का मुखिया ही एक संवैधानिक निकाय की अनदेखी करने की सलाह दे रहा हो तो स्वाभाविक तौर पर सरकार की कार्यशैली पर हर देशभक्त को चिंता होगी। कॉमनवेल्थ घोटाले में महीनों कारावास भुगत कर बाहर आए कलमाड़ी और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के ए राजा और कनीमोरी को हाल ही में संसद की विभिन्न स्थायी समितियों का सदस्य बनाया गया। अब मंत्रिमंडल के फेरबदल में आइपीएल घोटाले के कारण जिस मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा था उसे मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री बना दिया गया और विकलांगों का धन गबन करने के आरोपी केंद्रीय मंत्री को पदोन्नत कर विदेश मंत्री बना दिया गया। एक ओर डॉ. सिंह के मंत्रिमंडल में ऐसे कर्मवीर शामिल हैं वहीं पेट्रोलियम मंत्री एस. जयपाल रेड्डी जैसे ईमानदार व्यक्ति को महत्वपूर्ण मंत्रालय से वंचित किया गया। क्यों? प्रधानमंत्री ने बढ़ते राजकोषीय घाटे पर चिंता व्यक्त की है। एक अर्थशास्त्री होने के नाते सुस्त आर्थिक विकास दर और राजकोषीय घाटे को लेकर प्रधानमंत्री की चिंता स्वाभाविक है, किंतु प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति आई क्यों और उसकी जिम्मेदारी किसकी है? पिछले आठ साल से केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार का राज है। 2004-05 के आर्थिक सर्वेक्षण में लिखा था, 2004-05 की अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन आशातीत रहा। 2003-04 में आर्थिक विकास की दर 8.5 प्रतिशत रही, जो 1975-76 1988-89 के अपवाद को छोड़कर अब तक की सर्वाधिक है। उसी सर्वेक्षण में 2003-04 के दौरान कृषि क्षेत्र में विकास दर 9.6 प्रतिशत, सर्विस सेक्टर में 9.1 प्रतिशत और उद्योग में 6.6 प्रतिशत विकास दर की स्वीकृति है। यह उपलब्धि भाजपानीत राजग सरकार की थी। विरासत में मिली समृद्ध अर्थव्यवस्था को पिछले आठ सालों में किसने खोखला किया? हाल ही में आर्थिक विकास दर को बढ़ावा देने के लिए जब प्रधानमंत्री को कड़े कदम उठाने पड़े तो स्वाभाविक तौर पर उनकी आलोचना भी हुई। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यदि ये फैसले नहीं किए जाते तो देश में 1991 जैसे हालात हो जाते। इस बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार है? सन 1991 में भारत की माली हालत इतनी खराब हो गई थी कि उसे अपनी अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को पूरा करने के लिए अपना स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा था। उस दौरान मनमोहन सिंह पीवी नरसिंह राव के काल में वित्तमंत्री थे। उन्होंने ही उदारीकरण की नीतियां अपना कर अर्थव्यवस्था को समाजवादी जकड़न से मुक्ति दिलाई थी, किंतु पिछले आठ सालों में प्रधानमंत्री के अंदर का अर्थशास्त्री खामोश क्यों रहा? लोकलुभावन नीतियों के लिए वह राजकोष क्यों लुटाते रहे? क्यों शीर्ष स्तर पर मची लूट को वह सहते रहे? विडंबना यह है कि सरकार आर्थिक विकास के लिए आम आदमी को ही निचोड़ने की योजनाएं बना रही है। सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या सीमित करने से रसोई गैस के सिलेंडर करीब 900 रुपये में उपलब्ध होंगे। इसमें भी अभी 26 रुपये वृद्धि करने का निर्णय लिया गया, जिसे हिमाचल और गुजरात के चुनावों के कारण टाल दिया गया है। दिल्ली में बिजली की दरों में भारी वृद्धि को लेकर जनता आक्रोश में है। लोगों को राहत देने की जगह दिल्ली की कांग्रेसी सरकार की सलाह यह है कि जो बिजली बिल का भुगतान नहीं कर सकते उन्हें बिजली कनेक्शन कटवा लेना चाहिए। यह कैसी मानसिकता है? कोयला घोटाले के लिए सरकार का तर्क है कि बिजली का उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ती दरों पर कोयला आवंटित किया गया। फिर बिजली के दाम क्यों बढ़े? जनवरी, 2011 में देश में बिजली उत्पादन कुल क्षमता से 30,000 मेगावाट कम था, क्योंकि कोयले की कमी के कारण बिजली प्लांट अपनी क्षमता से कम बिजली उत्पादन कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने स्थिति सुधारने का भरोसा दिलाया, किंतु अक्टूबर, 2012 तक और बुरा हाल हो गया। पावर प्लांट अपनी क्षमता से 65,000 मेगावाट कम बिजली उत्पादन की स्थिति में आ गए, क्योंकि बिजली उत्पादन के लिए कोल इंडिया लिमिटेड ने जहां ज्यादा कोयला खनन की जरूरत नहीं समझी, वहीं जिन निजी कंपनियों को कोल ब्लॉक आवंटित हुए उन्होंने कोयला बेचकर मोटी कमाई की। सरकार देश के खुदरा व्यापारियों की कीमत पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए द्वार खोल चुकी है, किंतु इस बात की चिंता किसी को नहीं कि भारतीय उद्यमियों के पास 9 लाख करोड़ की नकदी होने के बावजूद वे भारत में निवेश करने को क्यों तैयार नहीं हैं? आज महंगाई दर करीब आठ प्रतिशत है। औद्योगिक और कृषि विकास दर तीन प्रतिशत से कम और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत है। राजकोषीय घाटा 5.5 प्रतिशत रहने का अंदेशा है, जो बजटीय अनुमान 4.6 प्रतिशत से काफी अधिक है। गरीबी आंकने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त समितियों के आंकड़े भ्रामक हैं। योजना आयोग शहरी क्षेत्र में 32.5 और ग्रामीण क्षेत्रों में 26.5 रुपये खर्च करने वाले को गरीब नहीं मानता। उसके अनुसार 40.74 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। वहीं अर्जुन सेनगुप्ता समिति का मानना है कि देश की कुल आबादी का 38 प्रतिशत भाग गरीब है। इस सरकार के आठ साल के राज में कमरतोड़ महंगाई के कारण गरीबी और कुपोषण में और वृद्धि हुई है। एक ओर तो भ्रष्टाचार के कारण मुट्ठीभर लोग अल्पकाल में ही अरबपति बन रहे हैं तो दूसरी ओर नीतिगत अपंगता के कारण अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है, जिसका खामियाजा आम आदमी भुगतने को अभिशप्त है। कांग्रेस प्रधानमंत्री को काम करने की आजादी देकर आर्थिक विकास लाने और युवराज राहुल गांधी की ताजपोशी की तैयारी भले करे, किंतु बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनाव में विफल रहने वाले कांग्रेसी युवराज से कोई आशा करने की जगह लोगों में इस सरकार की सरदारी पर ही विश्वास खत्म हो चुका है। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)
Dainik Jagran National Edition -6-11-2012 भ्रष्टाचार  Page -9