भारत के संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि सरकार भ्रष्टाचार को प्रश्रय नहीं देगी, उसके मंत्री और अफसर भ्रष्टाचार नहीं करेंगे और भ्रष्ट व्यक्तियों को दंडित किया जाएगा। लेकिन आजादी के साल, 1947, में ही भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम बन चुका था। इस आधार पर कह सकते हैं कि देश को आजादी और भ्रष्टाचार दोनों साथ-साथ मिले। आजादी में भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचार में आजादी इतनी ज्यादा थी कि इस अधिनियम को बार-बार संशोधित करना पड़ा। अंतिम संशोधन 1988 में हुआ। यानी भ्रष्टाचार आगे-आगे बढ़ता गया और कानून बनाने वाले उसका पीछा करते रहे। 1947 से आज तक स्थिति यह है कि भ्रष्टाचार भी है और उसके खिलाफ कानून भी है। दोनों का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व भारतीय लोकतंत्र की एक रेखांकित करने योग्य विशेषता है। यह मामला कु छकु छ अपराधी और पुलिस तथा आय कर की चोरी करने वालों और आय कर अधिकारियों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसा है। केंद्र में जितनी भी सरकारें आई, यहां हम राज्य सरकारों की बात नहीं कर रहे हैं, उनमें से एक ने भी यह दावा नहीं किया कि हम भ्रष्टाचार को जहां तक संभव है, प्रोत्साहित करेंगे। एक सरकार ऐसी आई थी, जिसकी पृष्ठभूमि ही उच्च पदों पर भ्रष्टाचार के विरु द्ध अभियान थी। उन दिनों नारा लगता था-वीपी, तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। बाद में एक और सरकार आई, जिसने भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का आश्वासन दिया था। उत्तर प्रदेश में तो उसने भय, भूख और भ्रष्टाचार तीनों से छुटकारा दिलाने का वादा किया था। लेकिन भ्रष्टाचार था कि न केवल अपनी जगह पर अडिग रहा बल्कि उसकी भूख लगातार प्रचंड होती गई। स्वतंत्र भारत में यह पहली बार है जब एक केंद्रीय मंत्री रह चुका व्यक्ति तिहाड़ जेल की शोभा बढ़ा रहा है। अब उन्हीं के आसपास सुरेश कलमाडी नाम के कांग्रेसी सांसद का भी प्रवास होगा जिनका नाम कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के दौरान हुई असाधारण लूटमार के साथ नत्थी है। लेकिन इन दोनों पर कार्रवाई करने में कई महीने लग गए। अपने आदमियों को जेल भेजना बहुत मुश्किल होता है। कहते हैं, देर आयद दुरु स्त आयद। लेकिन यह कहावत सभी मामलों में लागू नहीं होती। कई बार ऐसा भी होता है कि न्याय मिलने में देर होने का मतलब न्याय देने से इनकार करना है। सर्वतोमुखी भ्रष्टाचार से पीड़ित जनता को न्याय मिलने में काफी देर हुई। जब अन्ना हजारे ने जंतर मंतर पर अपना यज्ञ शुरू किया, तब भारत सरकार के हाथ-पांव फू लने लगे और उसके लिए यह प्रदर्शित करना अनिवार्य हो गया कि वह भी भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए उत्सुक है। इस दांवपेच की वजह से ही लोगों में यह भावना पैदा हुई है कि इन दो प्रमुख व्यक्तियों को बलि का बकरा बनाकर सरकार अपना असली चेहरा छिपाना चाहती है। ये गिरफ्तारियां दिखाने के दांत हैं, खाने के दांत सात परदों में ढंके हुए हैं। उन दांतों को तोड़ने में किसी की दिलचस्पी नहीं है, न सत्ता पक्ष की, न विपक्ष की। आखिर ये भ्रष्टाचारी कु छ वर्षो में नहीं पनपे हैं। ये तब भी थे और इतने ही बुलंद थे, जब केंद्र में विपक्षी दलों की सरकार थी। भाजपा आज कांग्रेस के दाग दिखा रही है। कांग्रेस आक्षेप लगा रही है कि पहले अपने दाग तो गिन लो। लेकिन केंद्र में इन्हीं दोनों दलों का शासन नहीं रहा है। 1977 में पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद विपक्षी दलों के कई नेता प्रधानमंत्री कहलाए। लेकिन किसी के भी शासन काल में दो-चार बड़े लोग भी भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार नहीं हुए। जबकि यह अदना सिपाहियों, मामूली किरानियों, आय कर और बिक्री कर के छोटे अधिकारियों, लघु उद्योगपतियों और कम पूंजी के दुकानदारों तथा राजनीतिक दलों के साधारण कार्यकर्ताओं के स्तर पर लगातार बढ़ रहा है? अगर ऐसा है, तो इस भ्रष्टाचार को कुचलना बहुत आसान है। शीर्ष पदों पर ईमानदारी हो, तो उनके नीचे भ्रष्टाचार के पौधे पनप ही नहीं सकते। छोटे अधिकारियों और मामूली कर्मचारियों की शिखा बड़े अधिकारियों की मुट्ठी में बंधी होती है। बड़े अधिकारियों की शिखा मंत्रियों के हाथ में और मंत्रियों की शिखा प्रधानमंत्री के हाथ में होती है। जैसे ईश्वर न चाहे तो पत्ता भी नहीं हिल सकता, वैसे ही ऊपर की सत्ता न चाहे, तो नीचे की सत्ताएं बेईमानी की कमाई अपनी फू ली हुई जेबों में नहीं डाल सकतीं। दोनों का साथ चोलीदा मन का है। यही वजह है कि 1947 में ही भ्रष्टाचार निरोधक कानून बनने के बाद से आज तक कोई भी बड़ी मछली इस कठोर कानून के जाल में नहीं फंस सकी। उनके लिए इस जाल में बड़े-बड़े छेद बना दिए गए थे। फंसती थीं तो छोटी मछलियां क्योंकि सरकार के लिए यह दिखाना जरूरी था कि इस अधिनियम के तहत गिरफ्तारियां हो रही हैं और भ्रष्ट लोगों को दंडित किया जा रहा है। ये वे मूर्ख या लापरवाह व्यक्ति थे जो भ्रष्टाचार के खेल के नियमों से अपरिचित थे या जिन्होंने गैरकानूनी तरीकों से इतना अधिक संचय कर लिया था कि वह सबकी आंखों में खटकने लगा था। तो फिर बड़े भ्रष्टाचारियों को कौन खोज निकालता है? बहादुरी का यह काम मीडिया ने किया है, यद्यपि उसमें भी नीरा राडिया के सहयोगी और साझीदार पत्रकार भरे पड़े हैं। हसन अली, ए. राजा और सुरेश कलमाडी के अपराधों को सरकार ने खुद नहीं खोज निकाला था। मीडिया ने ही उनके नाम प्लेट पर रख कर सरकार को दिए थे। भ्रष्टाचार से लड़ने में सरकार की दिलचस्पी पैदा हो गई है, यह हम उस दिन समझेंगे जब रोज कोई न कोई बड़ी मछली तिहाड़ जेल की ओर ले जाती हुई दिखाई देगी।
Sunday, May 1, 2011
दिखाने के दांत हैं ये गिरफ्तारियां
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