लेखक विदेशी बैंकों में जमा कराए गए काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था की तह में जा रही हैं...
भ्रष्टाचार और काले धन की समस्या आज एक ऐसी बुराई का रूप ले चुकी है जिसे खत्म करना राष्ट्रहित में न केवल आवश्यक है, बल्कि हमारी प्रगति के लिए भी जरूरी है। हमारी अर्थव्यवस्था के समानांतर या कहें उससे भी अधिक काले धन की अर्थव्यवस्था है। इसका परिणाम यह हुआ है कि देश का जितना विकास होना चाहिए वह नहीं हो पाया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक विदेशों में सैकड़ों लाख डॉलर धन अवैध रूप से जमा हैं। विदेशों में जमा काले धन की रकम ठीक-ठीक कितनी है, इस बारे में कोई सटीक जानकारी शायद ही किसी को हो, लेकिन दुनिया के कई वरिष्ठ अर्थशास्ति्रयों द्वारा पूरी दुनिया में जमा काले धन के बारे में एक अध्ययन किया गया, जिसके आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की गई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है दुनिया के विभिन्न देशों में भारतीय नागरिकों के कुल 462 बिलियन अमेरिकी डॉलर जमा हैं। यह वह धन है जिस पर भारत सरकार को न तो किसी तरह का टैक्स मिलता है और न ही इसका इस्तेमाल भारत के विकास के लिए हो पा रहा है। सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता के अभाव और जनता के प्रति जवाबदेही कम होने के कारण दशकों से देश का धन लूटा जाता रहा है। जनता से लूटा गया यह धन विदेशी बैंकों में जमा करा दिया जाता है ताकि सरकार को इस पर किसी तरह का टैक्स न देना पड़े। विदेशों में गैर कानूनी तरीके से जमा हो रहे धन को वापस लाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के कारण भी यह समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इससे गरीबी और असमानता बढ़ रही है, सार्वजनिक संस्थाओं का अवमूल्यन हो रहा है और देश में निजी निवेश का माहौल कमजोर हुआ है। इससे जनता में देश के राजनेताओं और राजनीतिक दलों के प्रति अविश्वास बढ़ा है। इसका पता 2009 में ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण से भी चलता है। इसमें शामिल होने वाले 58 प्रतिशत भारतीयों ने राजनेताओं को व्यक्तिगत रूप से सबसे भ्रष्ट माना है। विदेशों से वापस मिलने वाले काले धन का एक हिस्सा सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों अथवा इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता वाले क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस काले धन में से 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि देश के 40 लाख बच्चों के लिए रोग प्रतिरक्षा कार्यक्रमों में खर्च की जा सकती है अथवा 250,000 घरों के लिए पानी के कनेक्शन के लिए मुहैया कराया जा सकता है। इस तरह यदि वापस लाए जाने वाले पैसे का सही खर्च होता है तो इससे मिलने वाला लाभ न केवल हमारी अपेक्षाओं से कहीं अधिक होगा, बल्कि विदेशों में जमा संपत्ति की वास्तविक क्षतिपूर्ति भी हो सकेगी। यह सब तभी संभव होगा जब देश से बाहर भेजे गए अवैध धन को पहले वापस लाया जाता है। इस काम के लिए सबसे जरूरी है हमारे राजनेताओं में राजनीतिक इच्छाशक्ति। इसके बाद हमें देश की आंतरिक प्रक्रिया में बदलाव के तहत आधारभूत प्रशासनिक सुधार पर ध्यान देना होगा। इस काम में अधिक दक्षता और क्षमता हासिल करने के लिए हमें विधायी सुधारों की दिशा में पहल करनी होगी और भ्रष्ट व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा चलाना होगा फिर वे चाहे कितने भी पहुंच वाले अथवा शक्तिशाली क्यों न हों। सरकार को बिना किसी दुविधा के यह संकेत देना होगा कि वह किसी भी तरह की अवैध संपत्ति को जब्त करने के प्रति पूरी तरह गंभीर है। यह अलग बात है कि हमारे देश में इस पर ध्यान देना शायद ही कोई जरूरी समझता है। हमने काले धन को विदेशों से वापस लाने के लिए कई चोटी के राजनेताओं से इस मुद्दे को अपने चुनाव घोषणापत्र में शामिल करने की बात कही, लेकिन इसके लिए कोई भी तैयार नहीं दिखा। यहां तक कि हमने यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन की अभी तक पुष्टि नहीं की है, जबकि दुनिया के कई देशों ने अपने यहां इसकी पुष्टि कर दी है। यदि संसद द्वारा इसकी पुष्टि कर दी जाती है तो चोरी गई संपदा की प्राप्ति के लिए एकीकृत कानूनी ढांचे का निर्माण करना होगा जिसके लिए हमें कई तरह के कानूनी और विधायी बदलाव करने होंगे। यहां ध्यान दिए जाने योग्य बात यह है कि यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन पहली ऐसी अंतरराष्ट्रीय संधि है जो सरकारों के स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार की रोकथाम करती है। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र मानता है कि इस तरह के भ्रष्टाचार के कारण गरीब देशों का विकास प्रभावित होता है। यूनसीएसी में कुल 71 अनुच्छेदों के अलावा दूसरे कई प्रावधान किए गए हैं। इस संधि का अनुच्छेद 52 देशों को यह अधिकार देता है कि वे विदेशों में उनके देश के नागरिकों द्वारा खुलवाए गए खातों की जांच कर सकें और ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए जरूरी कदम उठा सकें। इसके तहत सरकारों को यह भी अधिकार दिया गया है कि वे इन खातों को चलाने वालों अथवा इनसे लाभान्वित होने वाले व्यक्तियों, परिवारों अथवा निकट सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकें। इस तरह का विधान बनाने के पीछे मूल उद्देश्य यही है कि राजनीतिक लोगों का भी खुलासा हो सके। दरअसल, इस कानून को बनाने का मूल उद्देश्य यह है कि एक ऐसा कानूनी ढांचा बने जिसमें ऐसी संपदाओं को वापस लाने की व्यवस्था हो। इसी तरह अनुच्छेद 23 और 26 में अवैध धन के हस्तांतरण को रोकने संबंधी व्यवस्था की गई है। उदाहरण के तौर पर इसमें रिश्वत के मामलों में भी सहयोग का उपबंध किया गया है। अनुच्छेद 40 में यह सुनिश्चित किया गया है कि विभिन्न देश अपने बैंक गोपनीयता के कानूनों को घरेलू आपराधिक जांच के तहत बाधक नहीं बनने देंगे। सिविल सोसाइटी के सदस्यों के विचार में विदेशों में जमा काले धन को यदि राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया जाता है तो इस पर स्वत: ही रोक लग जाएगी, लेकिन यदि ऐसा होता है तो तमाम खाताधारक अपनी संपत्ति दूसरों के नाम कर देंगे, दान दे देंगे अथवा किसी और काम में लगा देंगे। बेहतर उपाय यह है कि सरकार यह कहे कि जो लोग अपना काला धन खुद घोषित करेंगे उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी और उनके कुल धन का आधा हिस्सा टैक्स के रूप में काट लिया जाएगा और बाकी को बांड के रूप में रखा जाएगा, जिसका ब्याज इन लोगों को ही मिलेगा। इससे काला धन रखने वाले लोग आगे आने को प्रेरित होंगे। सिविल सोसाइटी द्वारा सरकार पर दबाव डाले जाने के बावजूद यूएनसीएसी की पुष्टि नहीं की गई। यह तब है जब मानव विकास सूचकांक में हमारा दर्जा काफी नीचे है और सहस्राब्दि विकास लक्ष्य को हासिल करने में हम पीछे हैं। देश की जनता भ्रष्टाचार के आगे खुद को पूरी तरह असहाय पाती है, लेकिन सवाल वही है कि क्या राजनेता अंतत: कोई कदम उठाएंगे? (लेखिका ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल में कार्यकारी निदेशक हैं)

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