रिजर्व बैंक के खातों से हर साल करीब 23 हजार करोड़ रुपये गुमनाम ढंग से विदेश चले जाते हैं और फिर भी इस रकम के जाने का मकसद रिजर्व बैंक के खातों में दर्ज नहीं है। यह तब है जब रिजर्व बैंक एक-एक डॉलर के लेन-देन का हिसाब रखता है। आमतौर पर विदेशी मुद्रा खाता साफ-सुथरा माना जाता है, लेकिन अनिवासी भारतीयों पर टैक्स को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की पड़ताल के बाद रिजर्व बैंक का विदेशी मुद्रा प्रबंधन गंभीर सवालों में घिर गया है। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि 2005 से 2007 के बीच करीब 46 हजार करोड़ रुपये रिजर्व बैंक के खातों से रहस्यमय ढंग से विदेश चले गए। इतनी बड़ी रकम किन आयातों या भुगतानों के बदले दी गई, इसका रिजर्व बैंक के पास कोई प्रमाण नहीं है। कैग ने लिखा है कि यह तथ्य साबित करता है कि अनजान और अप्रामाणिक वजहों से विदेशी मुद्रा देश से बाहर जा रही है। भारत में वाणिज्यिक आयात का हिसाब-किताब विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) रखता है जबकि आयात के बदले विदेशी मुद्रा देने की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक की है। इसके अलावा कुछ आयात रक्षा जरूरतों के लिए किए जाते हैं। आमतौर पर कुल (वाणिज्यिक व रक्षा) आयात मूल्य के बराबर ही विदेशी मुद्रा रिजर्व बैंक के खातों से जारी होनी चाहिए ताकि विदेशी मुद्रा का खाता बराबर रहे, लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि 2005-07 के बीच जो विदेशी मुद्रा रिजर्व बैंक से जारी हुई वह कुल आयात मूल्य से 46 हजार 736 करोड़ रुपये ज्यादा थी। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में भारत से धन का विदेश जाना बहुत तेजी से बढ़ा है। यह बढ़ोतरी सेवाओं और निजी हस्तांतरण यानी फंड ट्रांसफर के मद में सबसे ज्यादा है। 2001-02 में विभिन्न सेवाओं के आयात के बदले केवल 65 हजार 850 करोड़ रुपये विदेश गए, जो पिछले दशक के अंत में करीब चार गुना बढ़कर दो लाख 10 हजार करोड़ रुपये हो गए। निजी फंड भी पिछले दशक के अंत में तकरीबन छह गुना बढ़कर 9290 करोड़ रुपये पर पहुंच गए। इन्हीं भुगतानों और ट्रांसफर की ओट में काला धन विदेश भेजे जाने का शक है। यही वजह है कि अमीर देशों (जी-20) ने टैक्स हैवेन देशों के खिलाफ 2009 से मुहिम चला रखी है.

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