Wednesday, May 25, 2011

सरकार की जानकारी में हो रही काले धन की निकासी

56 हजार करोड़ रुपये! यह भारी भरकम धन टैक्स हैवेन देशों में भारत से हर साल जाने वाली राशि का ताजा और अधिकृत आंकड़ा है। अब यह बात प्रामाणिक और पुष्ट है कि बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा का करीब 20 फीसदी हिस्सा हर साल काली कमाई छिपाने वाले देशों यानी टैक्स हैवेन में जाता है। यह सनसनीखेज तथ्य रिजर्व बैंक के आंकड़ों से निकला है, जो आयकर विभाग पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की पड़ताल के जरिये सरकार तक पहुंचा है। इस रहस्योद्घाटन से टैक्स हैवेन का वह काला सच आधिकारिक रूप से सामने आ गया जिसका अंदेशा देश को पहले से था। इस पर कैग की मुहर लगने से यह भी जाहिर हो गया कि सब कुछ रिजर्व बैंक और आयकर विभाग की जानकारी में है। कैग की यह जांच काले धन के सबसे बड़े कारोबारी हसन अली का मामला खुलने के बाद की है यानी टैक्स हैवेन को पैसा लगातार जा रहा है। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि रिजर्व बैंक के पास इसकी पूरी जानकारी है कि टैक्स हैवेन को कब-कब कितना पैसा भेजा गया? हसन अली मामले पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को पता नहीं कितनी सच्चाई बताई है, लेकिन सरकारी फाइलों में यह दर्ज है कि सिर्फ 2007-08 में 56 हजार 676 करोड़ रुपये दुनिया के उन देशों में गए, जिनकी पारदर्शिता संदिग्ध है। यह 2007-08 में देश से बाहर गई कुल विदेशी मुद्रा के लगभग 20 फीसदी के बराबर है। ऐसे देशों की संख्या 25 है और इनमें कई स्थानों पर भारत की काली कमाई जमा होने का शक है। इस आंकड़े के आधार पर यह माना जा रहा है कि हाल के पांच वषरें में ही करीब तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि इन संदिग्ध वित्तीय केंद्रों में गई है। यह विस्फोटक तथ्य कैग की जिस पड़ताल के बाद सामने आया है वह अनिवासी भारतीयों पर कराधान से संबंधित है। रिपोर्ट के अनुसार, संदिग्ध देशों को जाने वाले पैसे की न तो भेजते समय कोई जांच की गई और न ही बाद में। इस ऑडिट में कैग ने रिजर्व बैंक के 2007-09 तक के वे आंकड़े खंगाले, जो देश से बाहर विदेशी मुद्रा भेजने से संबंधित थे। कैग ने पाया कि काफी बड़ी राशि रॉयलटी फीस और तकनीकी सेवाओं के नाम पर उन छोटे-छोटे देशों को भेजी गई जहां से तकनीक या किसी तरह की सेवाओं का आयात संभव नहीं है।


पंजाब-बिहार में खुली घोटालों की पोल

पंजाब सरकार द्वारा डीबीडब्लू -170 गेहूं बीज पर दी गई 27 करोड़ की सब्सिडी किसानों तक नहीं पहुंची। बीज वितरण एजेंसी और योजना से जुड़े अफसरों ने साठगांठ कर किसानों की फर्जी सूची तैयार कर सब्सिडी हजम कर ली। 2010-11 में हुए इस घोटाले में ऐसे कारनामे हुए हैं कि विधानसभा समिति की टीम ने दांतों तले अंगुलियां दबा ली। सब्सिडी हासिल करने के लिए अंगूठाछाप शख्स से अंग्रेजी में हस्ताक्षर करवा लिए गए। बीज विक्रय एजेंसी ने एक ऐसे व्यक्ति को बीज देना दिखा दिया गया जो खेती करता ही नहीं। विधानसभा समिति द्वारा बद्दोवाल गांव के दौरे और किसानों से बातचीत में इस गोरखधंधे का खुलासा हुआ। विस समिति के चेयरमैन विरसा सिंह वल्टोहा की अगुआई में टीम ने गत दिवस बचत भवन में विभिन्न जिलों के कृषि व सीड एजेंसी अधिकारियों के संग बैठक कर इस बारे में जानकारी हासिल की। इसके बाद बद्दोवाल और पमाल गांव में किसानों से बातचीत की, तो पता चला कि डीलर ने दोनों गांवों में सिर्फ दो लोगों को ही बीज दिया। वल्टोहा ने बताया कि सूची में तीन गांवों बद्दोवाल, गांव पमाल और गांव ललतों कलां शामिल हैं। इसके साथ अन्य गांवों में वितरित बीज मामले की भी समीक्षा जारी है। समिति ने इससे पहले बठिंडा तथा श्री मुक्तसर साहिब में पहुंच कर जांच की और वहां भी अनियमितताएं मिली हैं। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में हुए गेहूं बीज सब्सिडी घोटाले को विधानसभा के बजट सत्र में सुनील जाखड़ ने उठाया था। इस संदर्भ में कृषि मंत्री सुच्चा सिंह लंगाह सदन में संतोषजनक जबाव नहीं पेश कर पाए थे। विपक्ष के बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने दो सदस्यीय कमेटी गठित कर जांच के आदेश दिए। 2009-10 के लिए गेहूं बीज पर दी गई 54 करोड़ रुपये की सब्सिडी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य के विपक्षी दल 54 करोड़ सब्सिडी मामले की भी जांच करवाने के लिए बादल सरकार पर दबाव बना रहे है।


Sunday, May 22, 2011

2जी घोटाला: गड़े मुर्दे उखाड़ने में जुटी जेपीसी

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की बैठक में दूरसंचार मंत्रालय के एक प्रजेंटेशन में आधे से ज्यादा हिस्से में राजग कार्यकाल के दौरान हुए घाटे का ही लेखा-जोखा पेश किए जाने से न केवल गड़े मुर्दे उखाड़े जाने की आशंका बढ़ गई, बल्कि समिति में तनातनी भी पैदा हो गई। इस प्रस्तुति को देखकर राजग सदस्यों ने विरोध जताया और खासकर तब जब कानून के शिकंजे में आए पूर्व मंत्री ए. राजा पर सीएजी की सख्त रिपोर्ट का हवाला आनन-फानन में निपटा दिया गया। राजग सदस्यों के विरोध के बाद अब सीएजी की नवीनतम रिपोर्ट को भी जेपीसी दस्तावेज का हिस्सा बनाने का फैसला हुआ है। जबकि भाजपा नेता यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह ने समिति के सामने गवाही देने का भी प्रस्ताव दे दिया है। जेपीसी की अगली बैठक 30 मई को होगी जिसमें सीएजी से बात की जाएगी। गवाही 29 जून से होगी। गुरुवार को जेपीसी के दूसरे दिन की बैठक शुरू हुई तो दूरसंचार मंत्रालय के सचिव ने लगभग 80 पेज की प्रस्तुति दी। बताते हैं कि 1998-08 तक की इस रिपोर्ट में लगभग 50 पेज राजग कार्यकाल पर थे। ए.राजा की कहानी महज एक दो पन्नों तक सीमित थी। प्रजेंटेशन में सीएजी की हालिया रिपोर्ट का भी जिक्र नहीं किया गया। इस पर राजग सदस्य बिफर पड़े। बैठक के बाद समिति के अध्यक्ष पीसी चाको ने बताया कि उन्होंने सीएजी रिपोर्ट के सारांश को भी जेपीसी दस्तावेज का हिस्सा बनाने का निर्णय लिया है। उसी गहमागहमी में यशवंत सिंहा ने गवाही देने का भी प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा कि जसवंत सिंह भी गवाही देने के लिए तैयार हैं। बैठक में 10वीं पंचवर्षीय योजना और दूर संचार मंत्रालय पर भी चर्चा हुई। यह बताने की कोशिश हुई कि पूरी नीति दूर संचार के विस्तार की थी न कि राजस्व बढ़ाने की। माइग्रेशन पैकेज और उसके कारण हुए घाटे पर भी चर्चा हुई। यह तय हुआ कि जांच के पूरे काल में स्पेक्ट्रम के बाबत हुए कैबिनेट निर्णय समेत दूसरे संबंधी फैसलों के दस्तावेज मंगाए जाएं। यह जानने की भी कोशिश होगी कि रक्षा मंत्रालय को दिए गए स्पेक्ट्रम को जारी करने की कितनी जरूरत थी। बैठक में ट्राइ के अध्यक्ष जेएस शर्मा को बुलाया गया। सीबीआइ को सात जून को बुलाया गया है जबकि आठ जून को वित्त मंत्रालय के सचिव अपना प्रजेंटेशन देंगे। 29 जून से गवाही का काम शुरू होगा। राजग काल में सलाह देने वाले सोली सोराबजी को गवाही के लिए बुलाने की घोषणा पहले ही हो चुकी है। बाकियों के नाम अभी तय किए जा रहे हैं। यशवंत की गवाही के प्रस्ताव के बाबत पूछे गए सवाल को चाको ने फिलहाल टाल दिया। दूरसंचार से जुड़े मुद्दों पर गठित मंत्रियों के समूह का नेतृत्व करने वाले यशवंत ने टेलीकाम परिचालकों के लिए तयशुदा लाइसेंस शुल्क नीति के स्थान पर राजस्व हिस्सेदारी मॉडल अपनाए जाने से जुड़े विषय में स्वयं को गवाह के तौर पर उपस्थित होने की पेशकश की।


Tuesday, May 17, 2011

2 जी मामले में आयकर विभाग को फटकार

2जी स्पेक्ट्रम मामले की धीमी जांच पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने आयकर विभाग को आड़े हाथों लिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि मामला 2008 में संज्ञान में आया और विभाग ने वास्तविक जांच मार्च 2011 में शुरू की। अगर कोर्ट ने दखल नहीं दिया होता तो विभाग सोता रहता। जांच के दायरे में आई कंपनियों को बड़ी कहने पर एतराज जताते हुए न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी व एके गांगुली की पीठ ने कहा, इन्हें बड़ी कह कर इस शब्द का अपमान मत करिए। ये प्रथम दृष्टया कर चोरी कीआरोपी हैं। इससे पहले आयकर विभाग ने सील बंद लिफाफे में जांच रिपोर्ट पेश की। विभाग की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विवेक तंखा ने अब तक हुई जांच का ब्योरा दिया, लेकिन कोर्ट विभाग की जांच से संतुष्ट नहीं हुआ। पीठ ने राडिया टेप रिकार्डिग के आधार पर हुई जांच का ब्योरा मांगा। आयकर विभाग कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाया, पर तंखा ने यह जरूर कहा, प्रत्येक बातचीत लेनदेन में तब्दील नहीं हुई। वैसे भी आयकर विभाग आपराधिक कार्यवाही नहीं करता, वह सिर्फ टैक्स प्रावधानों के तहत कार्यवाही करता है। जब गैर सरकारी संगठन सीपीआइएल के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि यह जांच भी कोर्ट के स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश के बाद हुई है तो पीठ ने उनसे सहमति जताई।


Tuesday, May 3, 2011

कलैगनर टीवी को 200 करोड़ देने के बाद हुआ था करारनामा

सीबीआइ ने दावा किया है कि कलैगनर टीवी में 200 करोड़ रुपये के अवैध हस्तांतरण को ढकने के लिए 2जी घोटाले में प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बाद करार किया गया और पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के इस्तीफे के बाद धन को इसके मूल स्रोत को लौटा दिया गया। सीबीआइ ने डीबी रियलिटी के एक एकाउंटेंट तथा सिनेयुग फिल्म्स प्रा. लि. के निदेशक के बयानों के आधार पर यह दावा किया है। जिसके मुताबिक शाहिद बलवा की कंपनी से कलैगनर टीवी को 23 दिसंबर 2008 से 7 अगस्त 2009 के बीच धन का हस्तांतरण हुआ। चैनल में द्रमुक सांसद कनीमोरी की भी हिस्सेदारी है। सीबीआइ ने 21 अक्तूबर 2009 को घोटाले में दूरसंचार विभाग के अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी और कोष के लेनदेन के लिहाज से करारनामा 27 जनवरी 2010 को किया गया। सीबीआइ ने अपने दूसरे आरोपपत्र में कहा है कि स्वान टेलीकॉम तथा डायनामिक्स रियलिटी के प्रमोटर शाहिद बलवा व विनोद गोयनका ने घुमावदार रास्ते से 200 करोड़ रुपये चैनल को दिए। जब राजा ने इस्तीफा दिया और एजेंसी ने उनसे पूछताछ की तो धन उसी रास्ते से डीबी रियलिटी को लौटा दिया गया। सीबीआइ ने डीबी रियलिटी के एकाउंटेंट सतीश अग्रवाल और सिनेयुग फिल्म्स प्रा.लि. के निदेशक मोहम्मद मोरानी के बयानों के हवाले से यह बात कही है। इन दोनों को इस बात की पुष्टि के लिए गवाह बनाया गया था कि स्वान टेलीकॉम ने 2जी लाइसेंस पाने के लिहाज से रिश्वत के तौर पर यह धन दिया। अग्रवाल ने सीबीआइ को बताया कि डायनामिक्स रियलिटी ने 23 दिसंबर 2008 से 11 अगस्त 2009 के बीच आसिफ बलवा की कुसेगांव फ्रूट्स तथा वेजिटेबिल्स प्रा. लि. को 209 करोड़ रुपये का कर्ज दिया था जिसके लिए कोई करार नहीं किया गया। अग्रवाल ने कहा कि 206 करोड़ रुपये की राशि 23 दिसंबर 2008 से जुलाई 2009 के बीच कुसेगांव फ्रूट्स के खाते से (करीम मोरानी के) सिनेयुग फिल्म्स प्रा. लि. के खाते में स्थानांतरित कर दी गई। मोरानी ने सीबीआइ को दिए अपने बयान में 206 करोड़ रुपये प्राप्त करने की पुष्टि की थी। मोरानी ने अपने बयान में कहा कि सिनेयुग फिल्म्स ने 23 दिसंबर 2008 से 7 अगस्त 2009 की अवधि के दौरान कलैगनर टीवी प्रा.लि. को 200 करोड़ रुपये का कर्ज दिया था। दोनों गवाहों ने कहा था कि डायनामिक्स से कुसेगांव और कुसेगांव से सिनेयुग के बीच इन लेनदेन के लिए कोई करार नहीं किया गया और 2जी घोटाले के मामले में सीबीआइ द्वारा 21 अक्तूबर 2009 को प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बाद ही लेनदेन प्रदर्शित करने के लिहाज से अनुबंध किया गया। हालांकि सिनेयुग फिल्म्स और कलैगनर टीवी के बीच 19 दिसंबर 2008 की तारीख में ग्राहकी शुल्क और हिस्सेदारी को लेकर सहमति हुई थी। राजा ने 14 नवंबर 2010 को इस्तीफा दिया था और सीबीआइ ने दिसंबर 2010 में उनसे पूछताछ की।

Sunday, May 1, 2011

दिखाने के दांत हैं ये गिरफ्तारियां

भारत के संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि सरकार भ्रष्टाचार को प्रश्रय नहीं देगी, उसके मंत्री और अफसर भ्रष्टाचार नहीं करेंगे और भ्रष्ट व्यक्तियों को दंडित किया जाएगा। लेकिन आजादी के साल, 1947, में ही भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम बन चुका था। इस आधार पर कह सकते हैं कि देश को आजादी और भ्रष्टाचार दोनों साथ-साथ मिले। आजादी में भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचार में आजादी इतनी ज्यादा थी कि इस अधिनियम को बार-बार संशोधित करना पड़ा। अंतिम संशोधन 1988 में हुआ। यानी भ्रष्टाचार आगे-आगे बढ़ता गया और कानून बनाने वाले उसका पीछा करते रहे। 1947 से आज तक स्थिति यह है कि भ्रष्टाचार भी है और उसके खिलाफ कानून भी है। दोनों का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व भारतीय लोकतंत्र की एक रेखांकित करने योग्य विशेषता है। यह मामला कु छकु छ अपराधी और पुलिस तथा आय कर की चोरी करने वालों और आय कर अधिकारियों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसा है। केंद्र में जितनी भी सरकारें आई, यहां हम राज्य सरकारों की बात नहीं कर रहे हैं, उनमें से एक ने भी यह दावा नहीं किया कि हम भ्रष्टाचार को जहां तक संभव है, प्रोत्साहित करेंगे। एक सरकार ऐसी आई थी, जिसकी पृष्ठभूमि ही उच्च पदों पर भ्रष्टाचार के विरु द्ध अभियान थी। उन दिनों नारा लगता था-वीपी, तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। बाद में एक और सरकार आई, जिसने भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का आश्वासन दिया था। उत्तर प्रदेश में तो उसने भय, भूख और भ्रष्टाचार तीनों से छुटकारा दिलाने का वादा किया था। लेकिन भ्रष्टाचार था कि न केवल अपनी जगह पर अडिग रहा बल्कि उसकी भूख लगातार प्रचंड होती गई। स्वतंत्र भारत में यह पहली बार है जब एक केंद्रीय मंत्री रह चुका व्यक्ति तिहाड़ जेल की शोभा बढ़ा रहा है। अब उन्हीं के आसपास सुरेश कलमाडी नाम के कांग्रेसी सांसद का भी प्रवास होगा जिनका नाम कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के दौरान हुई असाधारण लूटमार के साथ नत्थी है। लेकिन इन दोनों पर कार्रवाई करने में कई महीने लग गए। अपने आदमियों को जेल भेजना बहुत मुश्किल होता है। कहते हैं, देर आयद दुरु स्त आयद। लेकिन यह कहावत सभी मामलों में लागू नहीं होती। कई बार ऐसा भी होता है कि न्याय मिलने में देर होने का मतलब न्याय देने से इनकार करना है। सर्वतोमुखी भ्रष्टाचार से पीड़ित जनता को न्याय मिलने में काफी देर हुई। जब अन्ना हजारे ने जंतर मंतर पर अपना यज्ञ शुरू किया, तब भारत सरकार के हाथ-पांव फू लने लगे और उसके लिए यह प्रदर्शित करना अनिवार्य हो गया कि वह भी भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए उत्सुक है। इस दांवपेच की वजह से ही लोगों में यह भावना पैदा हुई है कि इन दो प्रमुख व्यक्तियों को बलि का बकरा बनाकर सरकार अपना असली चेहरा छिपाना चाहती है। ये गिरफ्तारियां दिखाने के दांत हैं, खाने के दांत सात परदों में ढंके हुए हैं। उन दांतों को तोड़ने में किसी की दिलचस्पी नहीं है, न सत्ता पक्ष की, न विपक्ष की। आखिर ये भ्रष्टाचारी कु छ वर्षो में नहीं पनपे हैं। ये तब भी थे और इतने ही बुलंद थे, जब केंद्र में विपक्षी दलों की सरकार थी। भाजपा आज कांग्रेस के दाग दिखा रही है। कांग्रेस आक्षेप लगा रही है कि पहले अपने दाग तो गिन लो। लेकिन केंद्र में इन्हीं दोनों दलों का शासन नहीं रहा है। 1977 में पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद विपक्षी दलों के कई नेता प्रधानमंत्री कहलाए। लेकिन किसी के भी शासन काल में दो-चार बड़े लोग भी भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार नहीं हुए। जबकि यह अदना सिपाहियों, मामूली किरानियों, आय कर और बिक्री कर के छोटे अधिकारियों, लघु उद्योगपतियों और कम पूंजी के दुकानदारों तथा राजनीतिक दलों के साधारण कार्यकर्ताओं के स्तर पर लगातार बढ़ रहा है? अगर ऐसा है, तो इस भ्रष्टाचार को कुचलना बहुत आसान है। शीर्ष पदों पर ईमानदारी हो, तो उनके नीचे भ्रष्टाचार के पौधे पनप ही नहीं सकते। छोटे अधिकारियों और मामूली कर्मचारियों की शिखा बड़े अधिकारियों की मुट्ठी में बंधी होती है। बड़े अधिकारियों की शिखा मंत्रियों के हाथ में और मंत्रियों की शिखा प्रधानमंत्री के हाथ में होती है। जैसे ईश्वर न चाहे तो पत्ता भी नहीं हिल सकता, वैसे ही ऊपर की सत्ता न चाहे, तो नीचे की सत्ताएं बेईमानी की कमाई अपनी फू ली हुई जेबों में नहीं डाल सकतीं। दोनों का साथ चोलीदा मन का है। यही वजह है कि 1947 में ही भ्रष्टाचार निरोधक कानून बनने के बाद से आज तक कोई भी बड़ी मछली इस कठोर कानून के जाल में नहीं फंस सकी। उनके लिए इस जाल में बड़े-बड़े छेद बना दिए गए थे। फंसती थीं तो छोटी मछलियां क्योंकि सरकार के लिए यह दिखाना जरूरी था कि इस अधिनियम के तहत गिरफ्तारियां हो रही हैं और भ्रष्ट लोगों को दंडित किया जा रहा है। ये वे मूर्ख या लापरवाह व्यक्ति थे जो भ्रष्टाचार के खेल के नियमों से अपरिचित थे या जिन्होंने गैरकानूनी तरीकों से इतना अधिक संचय कर लिया था कि वह सबकी आंखों में खटकने लगा था। तो फिर बड़े भ्रष्टाचारियों को कौन खोज निकालता है? बहादुरी का यह काम मीडिया ने किया है, यद्यपि उसमें भी नीरा राडिया के सहयोगी और साझीदार पत्रकार भरे पड़े हैं। हसन अली, ए. राजा और सुरेश कलमाडी के अपराधों को सरकार ने खुद नहीं खोज निकाला था। मीडिया ने ही उनके नाम प्लेट पर रख कर सरकार को दिए थे। भ्रष्टाचार से लड़ने में सरकार की दिलचस्पी पैदा हो गई है, यह हम उस दिन समझेंगे जब रोज कोई न कोई बड़ी मछली तिहाड़ जेल की ओर ले जाती हुई दिखाई देगी।


कलमाड़ी ने ठेके से पहले ही कर ली थी साठगांठ

राष्ट्रमंडल खेलों में अनुचित लाभ पाने वाली स्विस टाइमिंग कंपनी 2008 के पुणे यूथ गेम्स से कलमाड़ी के साथ थी। यूथ गेम्स में एकल टेंडर के जरिये स्विस टाइम को चुन लिया गया था। यह साझेदारी राष्ट्रमंडल खेलों तक आई। स्विस टाइम के प्रतिनिधि उस दौरान भी आयोजन समिति की तैयारी बैठकों में भी शामिल थे जब ठेका देने की प्रक्रिया शुरु नहीं हुई थी। स्विस टाइमिंग और टीम कलमाडी के रिश्तों की गहराई का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि यह कंपनी राष्ट्रमंडल खेलों की ठेका प्रक्रिया शुरू होने के पहले से आयोजन समिति के अधिकारियों के संपर्क में थी। कंपनी को टीएसआर का ठेका मार्च 2010 में मिला था, लेकिन उससे पहले स्टेडियमों में टाइम स्कोरिंग प्लानिंग को लेकर 25 जुलाई से पहली अगस्त 2009 के दौरान हुई आयोजन समिति की हर बैठक में स्विस टाइमिंग के भारत स्थित प्रतिनिधि क्लोडे फैव्रे मौजूद रहे। क्लोडे एक तरह से आयोजन समिति के तकनीकी सलाहकार का काम कर रहे थे। शुंगलू समिति ने अपनी रिपोर्ट में भी इस तथ्यों का जिक्र किया है। स्विस टाइमिंग को जब पुणे में हुए यूथ गेम्स में ठेका मिला था तब ठेके की निविदा में उसके सामने कोई कंपनी नहीं थी। यह अकेली कंपनी थी जिसने निविदा दाखिल की और अनुबंध पाया। शुंगलू समिति ने इस कंपनी और टीम कलमाडी की सांठगांठ की नई परतें भी खोली हैं। इस कंपनी ने अपनी निविदा को लेकर जो वित्तीय प्रस्ताव आयोजन समिति के समक्ष पेश किए उसके कई हिस्से शुंगलू समिति को मिले ही नहीं। आयोजन समिति इन पन्नों के गायब होने का कोई स्पष्ट जवाब भी नहीं दे सकी। उल्लेखनीय है कि हाल ही में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिए सरकार से मिले धन में घोटाला करने के आरोप में कांग्रेसी सांसद सुरेश कलमाड़ी और उनके दो साथियों को गिरफ्तार किया था।