Monday, October 10, 2011

मनरेगा से उद्योग बेहाल

गांवों में करोड़ों हाथों को रोजगार मुहैया कराने वाली मनरेगा उद्योग जगत और कृषि क्षेत्र के निशाने पर आ गई है। सरकार की इस प्रमुख ग्रामीण रोजगार योजना के चलते उद्योग श्रमिकों की कमी और मजदूरी बढ़ने से बेहाल हैं। देश के प्रमुख उद्योग चैंबर फिक्की की सर्वे रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। खेती-बाड़ी पर पड़ रहे असर के कारण कृषि मंत्री शरद पवार पहले ही मनरेगा को खेती के मौसम में रोकने का सुझाव दे चुके हैं। फिक्की ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के उद्योग और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले असर का सर्वेक्षण किया है। सर्वे में पाया गया कि मनरेगा के चलते मजदूरी 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है। साथ ही मजदूरों की कमी के कारण उद्योगों को संभावित नुकसान भी दस फीसदी आंका गया है। इस योजना की वजह से कंपनियों के खर्च में खासी बढ़ोतरी हुई है। साथ ही उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। इस सर्वे रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि औद्योगिक यूनिटों में किए जाने वाले काम को मनरेगा के तहत शामिल किया जाए। यह उन क्षेत्रों के लिए खासतौर पर फायदेमंद रहेगा, जहां औद्योगिक गतिविधियां ज्यादा हैं। यह सिफारिश भी की गई है कि जब खेती-बाड़ी का काम जोरों पर हो तो इसे बंद कर देना चाहिए। सर्वे में 10 उद्योग संघों के अलावा चमड़ा, कपड़ा, हैंडीक्राफ्ट, रत्न-आभूषण और कंस्ट्रक्शन क्षेत्र तक फैली सौ से ज्यादा कंपनियों को शामिल किया गया। इससे पहले कृषि मंत्री ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर यह सुझाव दिया था कि जब खेती का काम जोरों पर हो तो मनरेगा की योजना निलंबित कर देनी चाहिए। हालांकि, इस योजना को चलाने वाली नोडल एजेंसी के तौर पर काम कर रहा ग्रामीण विकास मंत्रालय इन प्रस्तावों से कतई सहमत नहीं है। चालीस हजार करोड़ रुपये के सालाना बजट वाली मनरेगा के तहत ग्रामीण कामगारों को वर्ष में कम से कम 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराया जाता है। इसमें काम करने वाले बेरोजगारों को अलग-अलग राज्यों में रोजाना सौ से डेढ़ सौ रुपये तक मुहैया कराए जाते हैं।

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