Monday, October 31, 2011

जवाबदेही से सफल होगी मनरेगा

साढ़े पांच साल पहले शुरू हुई नरेगा (अब मनरेगा) शुरू से ही गड़बडि़यों का शिकार रही है। पिछले दिनों ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने उत्तर प्रदेश में मनरेगा के भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए प्रदेश के सात जिलों में मनरेगा के तहत हुए भ्रष्टामचार की सीबीआइ जांच के लिए राज्य सरकार को पत्र लिखा तो मामले ने तूल पकड़ लिया। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए कड़ा ऐतराज जताया और कहा कि जयराम रमेश का पत्र राजनीति से प्रेरित है। राजनीतिक विवादों से परे हटकर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में यह योजना अधिकारियों और नेताओं की अवैध कमाई का जरिया बनी हुई हैं। हालांकि मनरेगा के तहत होने वाले कार्यो की जांच-परख के लिए बहुस्तुरीय उपाय किए गए हैं, जिनमें आंतरिक व बाह्य दोनों उपाय शामिल हैं। केंद्र सरकार ने मनरेगा पर अमल के लिए राज्यों को दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं, लेकिन अभी तक कई राज्यों ने न तो इन्हें लागू करने के लिए नियम बनाए हैं और न ही ब्लॉक स्तिर पर पेशेवर कर्मियों की नियुक्ति की। यही कारण है कि भ्रष्टाचार का खेल बदस्तूर जारी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मनरेगा योजना के तहत 2010-11 में 5.49 करोड़ परिवारों को रोजगार मुहैया कराए गए, वहीं 257.15 करोड़ श्रम दिवस सृजित किए गए। जबकि 2009-10 में यह अनुपात क्रमश: 5.26 और 283.59 करोड़ का रहा है। गांव के गरीब-मजदूरों के लिए यह योजना एक तरह से संजीवनी का काम कर रही है। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों को बराबर की मजदूरी मिलती है। योजना में प्रावधान है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को एक वित्त वर्ष के अंदर कम से कम 100 दिन के रोजगार के मौके मुहैया कराए जाएं, ताकि उनकी जीविका को सुरक्षित किया जा सके। जहां मनरेगा पर बेहतर तरीके से अमल हुआ, वहां इसके चलते पलायन और भुखमरी को रोकने में एक सीमा तक सफलता मिली। लेकिन संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि मनरेगा के तहत किसी भी राज्य में जरूरतमंदों को न तो सौ दिन का काम मिल पाया और न ही पूरी दिहाड़ी मिल सकी। रिपोर्ट के मुताबिक 2006-07 में 100 दिन के मुकाबले 43 दिन का रोजगार और 100 रुपये के मुकाबले 65 रुपये की औसतन दिहाड़ी मिल पाई। 2007-08 में 42 दिन और 75 रुपये का औसत रहा तो 2008-09 मे 48 दिन और 84 रुपये की दिहाड़ी का। जबकि 2009-10 में 54 दिन और 90 रुपये की दिहाड़ी मिली। समय से जॉब कार्ड न बनाना या पैसे लेकर बनाना, कम हाजिरी व कम भुगतान मनरेगा में भ्रष्टाजचार के प्रमुख रूप हैं। इसी का परिणाम है कि शुरू किए काम के पूरा होने का रिकॉर्ड 50 फीसदी से भी कम है। साढ़े पांच साल पहले जब यह योजना शुरू की गई थी, तभी कुछ अर्थशास्ति्रयों ने आगाह करते हुए कहा था कि यदि इसके अमल पर कड़ी निगरानी नहीं रखी गई तो इसका भी वही हश्र हो सकता है, जो काम के बदले अनाज योजना का हुआ था। गौरतलब है कि काम के बदले अनाज योजना को लेकर भ्रष्टाचार की इतनी शिकायतें सामने आई कि उसे बंद कर देना पड़ा। इस अनुभव को देखते हुए ही रोजगार गारंटी योजना पर नजर रखने के लिए विधिवत एक निगरानी समिति बनाई गई, लेकिन देश के प्रशासन तंत्र में हर स्तर पर पैठ बना चुके भ्रष्टाचार ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। कई राज्यों में मनरेगा से जुड़ी गड़बडि़यां और अनियमितताएं सामने आई हैं, उनसे साफ पता चलता है कि यह योजना न केवल गहरी खामियों की शिकार है, बल्कि इस पर निगरानी रखने वाला तंत्र भी निष्कि्रय है। विडंबना यह है कि यदि किसी सामाजिक कार्यकर्ता ने इस योजना के नाम पर किए जा रहे घोटालों का पर्दाफाश करने की कोशिश की तो उस पर जानलेवा हमले किए गए और कई मामलों में उसकी हत्या भी कर दी गई। मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए इसे और प्रभावी बनाने के लिए कई उपाय किए जा रहे हैं। जैसे, प्रबंध और प्रशासनिक मदद संरचना को सुदृढ़ बनाना, राज्य रोजगार गारंटी कोष का गठन आदि। अब तक का अनुभव रहा है कि जिन राज्यों में पंचायत स्तर तक कामकाज में सरकारी जवाबदेही तय की गई, वहां इसके काफी सकारात्मक नतीजे आए हैं। यदि मनरेगा का कार्यान्वयन सही ढंग से किया जाए तो सामाजिक सुरक्षा को एक नया आयाम मिल सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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