तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदंबरम चाहते तो 2जी घोटाला करने वाली कंपनियों को इक्विटी बेचकर हजारों करोड़ (अरबों) की कमाई करने से रोक सकते थे। दरअसल 2जी लाइसेंस पाने वाली कंपनियों के इक्विटी बेचने पर चिदंबरम ने सहमति दी थी। 5 नवंबर 2008 को ए. राजा द्वारा लिखे गए नोट से यह तथ्य उजागर हुआ है। यह नोट सीबीआइ द्वारा सुब्रह्मण्यम स्वामी को सौंपी 400 पेजों की फाइल का हिस्सा है। नोट के सामने आने से चिदंबरम की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 2जी घोटाले में चिदंबरम की भूमिका को लेकर यह दूसरा बड़ा खुलासा है। इससे पहले वित्त मंत्रालय के उस नोट से बवाल मचा था जिसमें कहा गया था कि चिदंबरम चाहते तो वित्तमंत्री रहते घोटाले को रोक सकते थे। घोटाले के बाद भी चिदंबरम के पास इन कंपनियों को इक्विटी बेचकर हजारों करोड़ रुपये कमाने से रोकने का दूसरा मौका था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। 2जी स्पेक्ट्रम पाने के बाद ही स्वान और यूनिटेक ने विदेशी कंपनियों को 2008 की कीमत पर इक्विटी बेचकर हजारों करोड़ कमाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। संचार और वित्त मंत्रालय के कुछ अधिकारियों ने इसका विरोध भी किया था। 30 जनवरी 2008 को वित्त और संचार मंत्रालय की बैठक में भी यह मुद्दा उठा था। इसमें कंपनियों की खरीद-फरोख्त होने पर लाइसेंस रद करने जैसे उपायों पर भी चर्चा हुई थी, पर बैठक में इसे टाल दिया गया। दूरसंचार सचिव को भेजे गए ए. राजा के नोट के अनुसार प्रधानमंत्री के साथ बैठक के दौरान वित्तमंत्री (चिदंबरम) ने लाइसेंस पाने वाली कंपनियों में विदेशी निवेश को सही ठहराया था। राजा के अनुसार वित्तमंत्री का मानना था कि विदेशी कंपनियों को इक्विटी बेचने को लाइसेंस बेचने के समान नहीं माना जा सकता। लिहाजा कंपनियां चाहें तो अपनी इक्विटी विदेशी कंपनियों को बेच सकती हैं। इसी के बाद स्वान ने दुबई की एतिसलात और यूनिटेक ने नार्वे की टेलीनॉर को इक्विटी बेची थी। सीबीआइ की चार्जशीट में आरोप है कि स्वान और यूनिटेक के प्रमोटरों को लाइसेंस फीस वगैरह के सारे खर्चे काटने के बाद भी इक्विटी बेचने से क्रमश: 2818 करोड़ और 2342 करोड़ का फायदा हुआ।
Monday, November 21, 2011
चिदंबरम की सहमति से कंपनियों ने अरबों कमाए
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