Wednesday, June 29, 2011

केंद्र ने ढूंढ़ा भ्रष्टाचार पर वार का नायाब तरीका

लोकपाल विधेयक के प्रारूप पर टीम अन्ना के निशाने पर आई मनमोहन सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक नायाब तरीका ढूंढ लिया है। इसके तहत सरकार भ्रष्टाचार रोकने वाले विभागों के बाबुओं को बाकायदा इनाम देने की तैयारी में है। इनाम की राशि इन बाबुओं के मूल वेतन के पांच फीसदी से 40 फीसदी तक होगी। सीधे प्रधानमंत्री के मातहत आने वाले कैबिनेट सचिवालय के प्रदर्शन प्रबंधन विभाग ने भ्रष्टाचार रोकने के इस नायाब तरीके का प्रस्ताव किया है। दरअसल सरकार ने अपने विभागों का प्रदर्शन सुधारने और उन्हें ज्यादा उत्तरदायी बनाने के लिए प्रदर्शन प्रबंधन (परफारमेंस मैनेजमेंट) नाम का नया विभाग बनाया था। इस विभाग ने बेहतर प्रदर्शन करने वाले विभागों के कर्मचारियों और अधिकारियों को इनाम देने की योजना बनाई है। इसके तहत पूर्व निर्धारित सालाना लक्ष्य के 70 फीसदी से कम प्रदर्शन करने वाले विभागों के कर्मचारियों को कोई इनाम नहीं मिलेगा। वहीं 100 फीसदी लक्ष्य प्राप्त करने वाले विभागों के कर्मचारियों को पहले साल में मूल वेतन का 20 फीसदी, दूसरे साल में 30 फीसदी और तीसरे साल में 40 फीसदी तक ईनाम दिया जाएगा। इसी तरह 80 से 90 फीसदी प्रदर्शन करने वाले विभागों के लिए भी अलग-अलग इनाम रखे गए हैं, लेकिन ईनाम की इस रकम को पाने के लिए संबंधित विभागों को पहले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के उपाय करने होंगे। प्रत्येक विभाग को बाकायदा प्रबंधन प्रदर्शन विभाग को बताना होगा कि उसने अपने यहां भ्रष्टाचार रोकने के लिए क्या-क्या उपाय किए हैं और वे कितने सफल रहे हैं, लेकिन प्रदर्शन प्रबंधन विभाग उनके दावों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं कर लेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा किभ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों को मिलने वाली भ्रष्टाचार की शिकायतों को भी किसी भी विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के मापदंड का आधार बनाया जाएगा। पिछले दिनों प्रदर्शन प्रबंधन पर एक प्रस्तुतिकरण के दौरान प्रदर्शन प्रबंधन सचिव डॉ. प्रजापति त्रिवेदी ने साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार पर रोक लगाए बिना कोई भी विभाग केवल अपने प्रदर्शन के आधार पर ईनाम पाने का हकदार नहीं हो सकता है। साफ है भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में बने माहौल को देखते हुए सरकार अपने विभागों को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए नए और नायाब तरीके अपनाने पर मजबूर हो रही है।

9.28 करोड़ रुपये बरामद

प्रवर्तन निदेशालय ने सोमवार को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित हवाला कारोबारी पंकज कपूर के यहां से 9.28 करोड़ रुपये बरामद किए हैं। ईडी के इतिहास में नकदी की यह सबसे बड़ी बरामदगी बताई जा रही है। ईडी के सहायक निदेशक राजेश्वर सिंह ने कहा कि पंकज कपूर पिछले छह महीने के भीतर 1000 करोड़ रुपये से अधिक की रकम हवाला के मार्फत विदेश भेज चुका है। ईडी ने उसके खिलाफ फेमा कानून के उल्लंघन का मामला दर्ज कर लिया है। राजेश्वर सिंह के अनुसार हवाला का शातिर अपराधी पंकज कपूर बिना तराशे हुए हीरे के आयात और उन्हें तराश कर निर्यात के फर्जीवाड़े के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये हर साल विदेश भेज देता था। बिना तराशे हीरे की कीमत काफी कम दिखाई जाती थी और तराशने के बाद उनकी अनाप-शनाप कीमत दिखाई जाती थी। इस तरह रुपये विदेश भेज दिए जाते थे। उन्होंने कहा कि पंकज कपूर का हीरे का पूरा कारोबार फर्जी है और यह सिर्फ हवाला के लिए इस्तेमाल किया जाता था। हीरे के कारोबार की आड़ में वह बाकायदा बैंकों के माध्यम से विदेश में पैसे भेजता था। इस सिलसिले में कुछ बैंकों की भूमिका की जांच की जा रही है। ईडी अधिकारियों के अनुसार कुछ बैंक खातों में पंकज कपूर लगभग हर दिन 10 करोड़ रुपये से अधिक जमा करता था, लेकिन बैंकों ने न तो कभी इस पर कभी संदेह किया और न ही इसकी सूचना भारतीय रिजर्व बैंक को दी। संदेह है कि हवाला के इस कारोबार में इन बैंकों के कुछ अधिकारी भी कपूर के साथ संलिप्त हो सकते हैं। सोमवार को देर रात तक चले आपरेशन की जानकारी देते हुए राजेश्वर सिंह ने कहा कि पंकज कपूर के दुबई और इंग्लैंड के दो बैंक खातों का पता चला है और इनमें जमा रकम के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। कपूर के ठिकानों से मिले दस्तावेजों से उसके साथ लेन-देन करने वाली कुछ देशी-विदेशी कंपनियों का पता चला है। इन कंपनियों की जांच की जा रही है। इसके साथ ही ईडी यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि पंकज कपूर के माध्यम से कौन-कौन से लोग विदेश में पैसे भेज रहे थे।


बीएस लाली पर मनी लांड्रिंग का मामला दर्ज

प्रसार भारती के पूर्व सीईओ बी.एस. लाली पर अब मनी लांड्रिंग का फंदा भी कस गया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उनके खिलाफ मनी लांड्रिंग रोकने के कानून के तहत केस दर्ज कर लिया है। लाली पर ब्रिटेन की कंपनी एसआइएस को राष्ट्रमंडल खेलों के प्रसारण का ठेका देने में 135 करोड़ रुपये का घोटाला करने का आरोप है। इस मामले में सीबीआइ पहले से ही उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत एफआइआर दर्ज कर कार्रवाई कर रही है। सीबीआइ जहां इस घोटाले की आपराधिक साजिश की जांच कर रही है, वहीं ईडी की जिम्मेदारी घोटाले से की गई काली कमाई का पता लगाकर उसे जब्त करने की है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि घोटाले में शामिल लाली के साथ ही एसआइएस और जूम कम्यूनिकेशन के अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा। गौरतलब है कि राष्ट्रमंडल खेल घोटालों की जांच के लिए प्रधानमंत्री द्वारा गठित शुंगलू समिति ने इस घोटाले के लिए सीधे तौर पर लाली और दूरदर्शन की महानिदेशक अरुणा शर्मा को जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय की अनुमति नहीं मिलने से अरुणा शर्मा के खिलाफ कार्रवाई शुरू नहीं हो पाई। बीती एक फरवरी को शुंगलू समिति ने पूरे घोटाले को लाली, अरुणा शर्मा और एसआइएस/जूम कम्यूनिकेशन की साजिश करार दिया था। सारे दस्तावेजी सुबूतों के साथ शुंगलू समिति ने बताया था कि किस तहत लाली और शर्मा ने प्रसार भारती की स्वायत्तता का दुरुपयोग करते हुए 100 करोड़ रुपये से भी कम के काम को एसआइएस को 246 करोड़ में दे दिया। यहीं नहीं, जिस दिन दूरदर्शन ने एसआइएस को खेलों के प्रसारण के लिए 246 करोड़ रुपये का ठेका दिया, उसी दिन एसआइएस ने यह काम जूम कम्यूनिकेशन को 170 करोड़ में दे दिया। मजेदार बात यह है कि इस काम पर जूम कम्यूनिकेशन को मात्र 111 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े। इस तरह सरकारी खजाने को 135 करोड़ की चपत लगी।


भ्रष्टाचार का उदारीकरण

हमारे देश में शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा होगा जहां नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का बोलबाला न हो। आम आदमी को अपने जमीन-जायदाद संबंधी कागजात, जाति और निवास प्रमाणपत्र से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस जैसे मामूली दस्तावेजों के लिए भी कई दिन तक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं और फिर घूस देकर ही उन्हें हासिल कर पाता है। हमारे यहां 77 फीसदी रिश्वत काम वक्त पर कराने या कारोबारी नुकसान से बचने के लिए दी जाती है। रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जो भी उपाय किए गए वे नक्कारखाने में तूती ही साबित हुए। इसका कारण यह रहा कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए बनी संस्थाओं को पूरे अधिकार नहीं सौंपे गए और न ही राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया, फिर दोषियों को मिलने वाले संरक्षण और उन पर होने वाली कार्रवाई में देरी से भी कई मामले बीच में ही दम तोड़ देते हैं। अब तक का अनुभव यही रहा है कि जब-जब भ्रष्टाचार, काले धन का मामला जोर-शोर से उठता है तब सरकार जांच आयोग बिठा देती है जिससे मामला ठंडा पड़ जाता है, लेकिन पहले के जांच आयोगों की रिपोर्ट को लागू करने या विद्यमान कानूनों पर कार्रवाई करने के प्रति सरकार सोयी रहती है। उदाहरण के लिए बाबा रामदेव की भूख हड़ताल से पहले सरकार ने काले धन की जांच के लिए तीन समितियों और अलग से एक नया महानिदेशालय गठित कर दिया, लेकिन सरकार ने काले धन का पता लगाने के लिए गठित चार समितियों की सिफारिशों पर अमल के बारे में कुछ नहीं कहा। आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत में कहा गया कि उदार अर्थव्यवस्थां के तहत सरकारी नियम-कायदे उदार और पारदर्शी होंगे जिससे घोटालों और प्रशासनिक भ्रष्टाचार में कमी आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऊंचे पदों पर काबिज नौकरशाहों ने उदारीकरण के चलते निजी क्षेत्र के उद्यमों में ज्यादा भ्रष्टाचार की संभावनाएं खोज लीं और राजनेताओं को भी रास्ता दिखा दिया। भारतीय पूंजीपतियों के संगठन सीआइआइ ने एक बयान में कहा कि भ्रष्टाचार के कारण देश में पर्याप्त विदेशी पूंजी निवेश नहीं हो रहा है। भारत में भ्रष्टाचार का उदारीकरण व काले धन के कई माध्यम रहे हैं। मॉरीशस रूट से विदेशी कंपनियों द्वारा कर चोरी और पार्टिसिपेटरी नोट के जरिए हवाला मार्ग से भारत में काले धन का निवेश हो रहा है। उदारीकरण के दौर में हमारी संसदीय प्रणाली अब कोई विशेष मायने नहीं रखती, क्योंकि सरकार किस दिशा में चलेगी यह कॉरपोरेट समूह तय करने लगे हैं। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि नीरा राडिया जैसे बिचौलियों के जरिए बन रहे सत्ता-कॉरपोरेट व नौकरशाह के कॉकटेल को तोड़ने वाला कोई नहीं है। कॉकटेल के खेल को स्पेक्ट्रम घोटाले से समझा जा सकता है। स्वान टेलीकॉम को 1537 करोड़ रुपये में लाइसेंस मिला, लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसने 45 फीसदी शेयर 4200 करोड़ में संयुक्त अरब अमीरात की एक कंपनी को बेच दिए। इसी तरह यूनिटेक वायरलेस को स्पेक्ट्रम का लाइसेंस 1661 करोड़ में मिला और यूनिटेक ने नार्वे के टेलीनोर को 60 फीसदी शेयर 6120 करोड़ में बेचे। आज कॉरपोरेट लॉबीइंग हो रही है जो उदारीकरण की ही देन है। यह कहानी भारत की ही नहीं, बल्कि ब्राजील, रूस, चीन, मलेशिया जैसे देशों की भी है जिन्होंने पिछले दो-तीन दशकों में अपने बाजार खोले हैं। अमेरिका के रोचेस्टेर इंस्टीट्यूट ने भ्रष्टाचार और उदारीकरण के संबंधों का विश्लेषण करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि जिन देशों में लोकतंत्र पहले और आर्थिक उदारीकरण बाद में आया है वहां मुक्त बाजार ने भ्रष्टाचार को नए आयाम दिए हैं। उदारीकरण अनंत अवसर, नियंत्रणों से मुक्ति और पैसे की आंधी लेकर आता है जिसके सामने लोकतंत्रों के कमजोर नियमन प्राय: फेल जाते हैं। यह बात भारत पर पूरी तरह फिट बैठती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Thursday, June 16, 2011

बालश्रम से आ रहा 1.2 लाख करोड़ काला धन

विदेशों में जमा अकूत काला धन भारत वापस लाने के बहस के बीच बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था ने दावा किया है कि देश में हर साल बालश्रम से 1.2 लाख करोड़ रुपये का काला धन पैदा किया जाता है। बचपन बचाओ आंदोलन द्वारा तैयार रिपोर्ट कैपिटल करप्शन : चाइल्ड लेबर इन इंडिया के मुताबिक, बाल श्रमिकों की संख्या, उनकी आमदनी और नियोक्ताओं द्वारा वयस्क कामगारों की जगह बाल मजदूरों से काम कराकर कमाए गए अनुचित लाभ के आधार पर यह आंकड़ा सामने आया है। अध्ययन में कहा गया है कि अधिकतम लाभ कमाने का लालच बाल मजदूरी को बढ़ावा देता है क्योंकि बच्चे सस्ते में काम करने के तैयार हो जाते हैं। बालश्रम, भ्रष्टाचार और काले धन का प्रवाह एक-दूसरे के पूरक हैं, जिसमें सिर्फ नियोक्ताओं व दलालों को ही फायदा होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में लगभग 6 करोड़ बाल मजदूर हैं, जो एक साल में प्रतिदिन 15 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 200 दिन काम करते हैं। इस प्रकार एक साल में 18 हजार करोड़ रुपये बनते हैं। अगर इन सभी 6 करोड़ बाल श्रमिकों की जगह 115 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से वयस्क मजदूरों की नियुक्ति की जाती, तो यह रकम 1,38,000 करोड़ होती। अध्ययन में बताया गया है कि दोनों धनराशि में 1.20 लाख करोड़ का अंतर बनता है। नियोक्ता सरकार को कमाए गए धन के बारे में कोई जानकारी न देकर टैक्स चोरी करते हैं।

कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में गोरखधंधा

पायलटों के फर्जी लाइसेंस का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में गोरखधंधा का मामला सामने आया है। कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में पायलटों को पास कराने का नेटवर्क चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसको डायरेक्टर जनरल सिविल एविएशन के भी कुछ अधिकारियों का सहयोग मिलता है। यह नेटवर्क परीक्षार्थियों से छह से दस लाख रुपये लेता है। इस गोरखधंधे के लिए उपयोग किया गया प्रश्नपत्र दैनिक जागरण के हाथ लगा है। कामर्शियल पायलट लाइसेंस लेने के लिए डीजीसीए द्वारा आयोजित परीक्षा में पांच पेपर होते हैं। इनमें से एक पेपर टेक्नीकल सपोर्ट को छोड़कर अन्य चार के लिए ठेका लिया जाता है। परीक्षा में दिए गए प्रश्नपत्रों पर ही दिए गए वैकल्पिक उत्तर को चिन्हित कर जमा कराना होता है। इनको कोई बाहर नहीं ले जा सकता है, लेकिन ये प्रश्नपत्र बाहर भी आते हैं और इनके वैकल्पिक उत्तरों की सूची परीक्षा केंद्र में तय परीक्षार्थियों तक पहुंचा दी जाती है। यह गोरखधंधा वर्षो से जारी है। दैनिक जागरण के पास वर्ष 2007 में हुई परीक्षा के दो प्रश्नपत्र हैं। 26 अप्रैल, 2007 को साढ़े दस बजे शुरू हुए परीक्षा के दस मिनट बाद प्रश्नपत्र बाहर आ गया था। इस प्रश्नपत्र एवं उत्तर पुस्तिका को ओम कम्यूनिकेशन नाम के किसी टेलीफोन बूथ से फैक्स किया गया। दैनिक जागरण के पास फैक्स किए गए दो प्रश्नपत्र हैं। इनमें एक एविएशन मेटरलॉजी एवं दूसरा एयर रेगुलेशन का पेपर है। सूत्रों की माने तो यह तो एक बानगी है। कमर्शियल पायलट लाइसेंस के लिए होने वाली परीक्षा में वर्षो से बहुत बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। इस नेटवर्क के तार डीजीसीए तक से जुड़े हुए हैं। कैसे होता है गोरखधंधा कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में परीक्षा केंद्र की मिलीभगत से प्रश्नपत्र बंटते ही यह बाहर आ जाता है। प्रश्नपत्र के सभी पन्ने अलग-अलग कर एक वाहन में विशेषज्ञ इसे हल करने में लग जाते हैं। परीक्षा में प्रश्नपत्र चार से पांच सेट में तैयार किए जाते हैं। यह सेट चार अंकों में होता है। अंतिम के अंक बदले होते हैं। इस प्रश्नपत्र को हल कर उसके वैकल्पिक उत्तर बनाकर सेट का अंतिम अंक देते हुए परीक्षा केंद्र में परीक्षार्थी तक पहुंचा दिया जाता है। साथ में इसे अन्य केंद्रों के लिए भी फैक्स कर दिया जाता है। छात्र अपने उत्तर पुस्तिका पर अंतिम समय में प्रश्नपत्र वाले सेट के अंक डाल देते हैं। इसके कारण परीक्षा परिणाम में कोई एक सेट के परीक्षार्थी सबसे ज्यादा पास करते हैं। आठ से बीस लाख में सौदा पायलट लाइसेंस के लिए गिरोह द्वारा प्रति परीक्षार्थी आठ से बीस लाख रुपये लिए जाते हैं। कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में पांच पेपर होते हैं। गिरोह द्वारा अलग-अलग पेपर के लिए अलग-अलग रेट निर्धारित किया जाता है। सूत्रों के अनुसार गिरोह से कई मेट्रो शहर में सीपीएल परीक्षा की तैयारी कराने वाले कोचिंग सेंटर के भी तार जुड़े हैं। डीजीसीए का पक्ष डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन के प्रवक्ता पीके मोहंती का कहना है कि इस संबंध में उनके पास आजतक कोई जानकारी नहीं आई है। वह उड़ीसा में हंै। 20 जून को दिल्ली पहुंचने के बाद मामले की जानकारी लेंगे।

बालश्रम से आ रहा 1.2 लाख करोड़ काला धन

विदेशों में जमा अकूत काला धन भारत वापस लाने के बहस के बीच बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था ने दावा किया है कि देश में हर साल बालश्रम से 1.2 लाख करोड़ रुपये का काला धन पैदा किया जाता है। बचपन बचाओ आंदोलन द्वारा तैयार रिपोर्ट कैपिटल करप्शन : चाइल्ड लेबर इन इंडिया के मुताबिक, बाल श्रमिकों की संख्या, उनकी आमदनी और नियोक्ताओं द्वारा वयस्क कामगारों की जगह बाल मजदूरों से काम कराकर कमाए गए अनुचित लाभ के आधार पर यह आंकड़ा सामने आया है। अध्ययन में कहा गया है कि अधिकतम लाभ कमाने का लालच बाल मजदूरी को बढ़ावा देता है क्योंकि बच्चे सस्ते में काम करने के तैयार हो जाते हैं। बालश्रम, भ्रष्टाचार और काले धन का प्रवाह एक-दूसरे के पूरक हैं, जिसमें सिर्फ नियोक्ताओं व दलालों को ही फायदा होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में लगभग 6 करोड़ बाल मजदूर हैं, जो एक साल में प्रतिदिन 15 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 200 दिन काम करते हैं। इस प्रकार एक साल में 18 हजार करोड़ रुपये बनते हैं। अगर इन सभी 6 करोड़ बाल श्रमिकों की जगह 115 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से वयस्क मजदूरों की नियुक्ति की जाती, तो यह रकम 1,38,000 करोड़ होती। अध्ययन में बताया गया है कि दोनों धनराशि में 1.20 लाख करोड़ का अंतर बनता है। नियोक्ता सरकार को कमाए गए धन के बारे में कोई जानकारी न देकर टैक्स चोरी करते हैं।

कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में गोरखधंधा

पायलटों के फर्जी लाइसेंस का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में गोरखधंधा का मामला सामने आया है। कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में पायलटों को पास कराने का नेटवर्क चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसको डायरेक्टर जनरल सिविल एविएशन के भी कुछ अधिकारियों का सहयोग मिलता है। यह नेटवर्क परीक्षार्थियों से छह से दस लाख रुपये लेता है। इस गोरखधंधे के लिए उपयोग किया गया प्रश्नपत्र दैनिक जागरण के हाथ लगा है। कामर्शियल पायलट लाइसेंस लेने के लिए डीजीसीए द्वारा आयोजित परीक्षा में पांच पेपर होते हैं। इनमें से एक पेपर टेक्नीकल सपोर्ट को छोड़कर अन्य चार के लिए ठेका लिया जाता है। परीक्षा में दिए गए प्रश्नपत्रों पर ही दिए गए वैकल्पिक उत्तर को चिन्हित कर जमा कराना होता है। इनको कोई बाहर नहीं ले जा सकता है, लेकिन ये प्रश्नपत्र बाहर भी आते हैं और इनके वैकल्पिक उत्तरों की सूची परीक्षा केंद्र में तय परीक्षार्थियों तक पहुंचा दी जाती है। यह गोरखधंधा वर्षो से जारी है। दैनिक जागरण के पास वर्ष 2007 में हुई परीक्षा के दो प्रश्नपत्र हैं। 26 अप्रैल, 2007 को साढ़े दस बजे शुरू हुए परीक्षा के दस मिनट बाद प्रश्नपत्र बाहर आ गया था। इस प्रश्नपत्र एवं उत्तर पुस्तिका को ओम कम्यूनिकेशन नाम के किसी टेलीफोन बूथ से फैक्स किया गया। दैनिक जागरण के पास फैक्स किए गए दो प्रश्नपत्र हैं। इनमें एक एविएशन मेटरलॉजी एवं दूसरा एयर रेगुलेशन का पेपर है। सूत्रों की माने तो यह तो एक बानगी है। कमर्शियल पायलट लाइसेंस के लिए होने वाली परीक्षा में वर्षो से बहुत बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। इस नेटवर्क के तार डीजीसीए तक से जुड़े हुए हैं। कैसे होता है गोरखधंधा कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में परीक्षा केंद्र की मिलीभगत से प्रश्नपत्र बंटते ही यह बाहर आ जाता है। प्रश्नपत्र के सभी पन्ने अलग-अलग कर एक वाहन में विशेषज्ञ इसे हल करने में लग जाते हैं। परीक्षा में प्रश्नपत्र चार से पांच सेट में तैयार किए जाते हैं। यह सेट चार अंकों में होता है। अंतिम के अंक बदले होते हैं। इस प्रश्नपत्र को हल कर उसके वैकल्पिक उत्तर बनाकर सेट का अंतिम अंक देते हुए परीक्षा केंद्र में परीक्षार्थी तक पहुंचा दिया जाता है। साथ में इसे अन्य केंद्रों के लिए भी फैक्स कर दिया जाता है। छात्र अपने उत्तर पुस्तिका पर अंतिम समय में प्रश्नपत्र वाले सेट के अंक डाल देते हैं। इसके कारण परीक्षा परिणाम में कोई एक सेट के परीक्षार्थी सबसे ज्यादा पास करते हैं। आठ से बीस लाख में सौदा पायलट लाइसेंस के लिए गिरोह द्वारा प्रति परीक्षार्थी आठ से बीस लाख रुपये लिए जाते हैं। कामर्शियल पायलट लाइसेंस परीक्षा में पांच पेपर होते हैं। गिरोह द्वारा अलग-अलग पेपर के लिए अलग-अलग रेट निर्धारित किया जाता है। सूत्रों के अनुसार गिरोह से कई मेट्रो शहर में सीपीएल परीक्षा की तैयारी कराने वाले कोचिंग सेंटर के भी तार जुड़े हैं। डीजीसीए का पक्ष डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन के प्रवक्ता पीके मोहंती का कहना है कि इस संबंध में उनके पास आजतक कोई जानकारी नहीं आई है। वह उड़ीसा में हंै। 20 जून को दिल्ली पहुंचने के बाद मामले की जानकारी लेंगे।

Wednesday, June 15, 2011

भ्रष्ट तत्वों की मनमानी लूट

लेखक विदेशी बैंकों में जमा कराए गए काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था की तह में जा रही हैं...

भ्रष्टाचार और काले धन की समस्या आज एक ऐसी बुराई का रूप ले चुकी है जिसे खत्म करना राष्ट्रहित में न केवल आवश्यक है, बल्कि हमारी प्रगति के लिए भी जरूरी है। हमारी अर्थव्यवस्था के समानांतर या कहें उससे भी अधिक काले धन की अर्थव्यवस्था है। इसका परिणाम यह हुआ है कि देश का जितना विकास होना चाहिए वह नहीं हो पाया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक विदेशों में सैकड़ों लाख डॉलर धन अवैध रूप से जमा हैं। विदेशों में जमा काले धन की रकम ठीक-ठीक कितनी है, इस बारे में कोई सटीक जानकारी शायद ही किसी को हो, लेकिन दुनिया के कई वरिष्ठ अर्थशास्ति्रयों द्वारा पूरी दुनिया में जमा काले धन के बारे में एक अध्ययन किया गया, जिसके आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की गई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है दुनिया के विभिन्न देशों में भारतीय नागरिकों के कुल 462 बिलियन अमेरिकी डॉलर जमा हैं। यह वह धन है जिस पर भारत सरकार को न तो किसी तरह का टैक्स मिलता है और न ही इसका इस्तेमाल भारत के विकास के लिए हो पा रहा है। सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता के अभाव और जनता के प्रति जवाबदेही कम होने के कारण दशकों से देश का धन लूटा जाता रहा है। जनता से लूटा गया यह धन विदेशी बैंकों में जमा करा दिया जाता है ताकि सरकार को इस पर किसी तरह का टैक्स न देना पड़े। विदेशों में गैर कानूनी तरीके से जमा हो रहे धन को वापस लाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के कारण भी यह समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इससे गरीबी और असमानता बढ़ रही है, सार्वजनिक संस्थाओं का अवमूल्यन हो रहा है और देश में निजी निवेश का माहौल कमजोर हुआ है। इससे जनता में देश के राजनेताओं और राजनीतिक दलों के प्रति अविश्वास बढ़ा है। इसका पता 2009 में ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण से भी चलता है। इसमें शामिल होने वाले 58 प्रतिशत भारतीयों ने राजनेताओं को व्यक्तिगत रूप से सबसे भ्रष्ट माना है। विदेशों से वापस मिलने वाले काले धन का एक हिस्सा सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों अथवा इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता वाले क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस काले धन में से 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि देश के 40 लाख बच्चों के लिए रोग प्रतिरक्षा कार्यक्रमों में खर्च की जा सकती है अथवा 250,000 घरों के लिए पानी के कनेक्शन के लिए मुहैया कराया जा सकता है। इस तरह यदि वापस लाए जाने वाले पैसे का सही खर्च होता है तो इससे मिलने वाला लाभ न केवल हमारी अपेक्षाओं से कहीं अधिक होगा, बल्कि विदेशों में जमा संपत्ति की वास्तविक क्षतिपूर्ति भी हो सकेगी। यह सब तभी संभव होगा जब देश से बाहर भेजे गए अवैध धन को पहले वापस लाया जाता है। इस काम के लिए सबसे जरूरी है हमारे राजनेताओं में राजनीतिक इच्छाशक्ति। इसके बाद हमें देश की आंतरिक प्रक्रिया में बदलाव के तहत आधारभूत प्रशासनिक सुधार पर ध्यान देना होगा। इस काम में अधिक दक्षता और क्षमता हासिल करने के लिए हमें विधायी सुधारों की दिशा में पहल करनी होगी और भ्रष्ट व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा चलाना होगा फिर वे चाहे कितने भी पहुंच वाले अथवा शक्तिशाली क्यों न हों। सरकार को बिना किसी दुविधा के यह संकेत देना होगा कि वह किसी भी तरह की अवैध संपत्ति को जब्त करने के प्रति पूरी तरह गंभीर है। यह अलग बात है कि हमारे देश में इस पर ध्यान देना शायद ही कोई जरूरी समझता है। हमने काले धन को विदेशों से वापस लाने के लिए कई चोटी के राजनेताओं से इस मुद्दे को अपने चुनाव घोषणापत्र में शामिल करने की बात कही, लेकिन इसके लिए कोई भी तैयार नहीं दिखा। यहां तक कि हमने यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन की अभी तक पुष्टि नहीं की है, जबकि दुनिया के कई देशों ने अपने यहां इसकी पुष्टि कर दी है। यदि संसद द्वारा इसकी पुष्टि कर दी जाती है तो चोरी गई संपदा की प्राप्ति के लिए एकीकृत कानूनी ढांचे का निर्माण करना होगा जिसके लिए हमें कई तरह के कानूनी और विधायी बदलाव करने होंगे। यहां ध्यान दिए जाने योग्य बात यह है कि यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन पहली ऐसी अंतरराष्ट्रीय संधि है जो सरकारों के स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार की रोकथाम करती है। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र मानता है कि इस तरह के भ्रष्टाचार के कारण गरीब देशों का विकास प्रभावित होता है। यूनसीएसी में कुल 71 अनुच्छेदों के अलावा दूसरे कई प्रावधान किए गए हैं। इस संधि का अनुच्छेद 52 देशों को यह अधिकार देता है कि वे विदेशों में उनके देश के नागरिकों द्वारा खुलवाए गए खातों की जांच कर सकें और ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए जरूरी कदम उठा सकें। इसके तहत सरकारों को यह भी अधिकार दिया गया है कि वे इन खातों को चलाने वालों अथवा इनसे लाभान्वित होने वाले व्यक्तियों, परिवारों अथवा निकट सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकें। इस तरह का विधान बनाने के पीछे मूल उद्देश्य यही है कि राजनीतिक लोगों का भी खुलासा हो सके। दरअसल, इस कानून को बनाने का मूल उद्देश्य यह है कि एक ऐसा कानूनी ढांचा बने जिसमें ऐसी संपदाओं को वापस लाने की व्यवस्था हो। इसी तरह अनुच्छेद 23 और 26 में अवैध धन के हस्तांतरण को रोकने संबंधी व्यवस्था की गई है। उदाहरण के तौर पर इसमें रिश्वत के मामलों में भी सहयोग का उपबंध किया गया है। अनुच्छेद 40 में यह सुनिश्चित किया गया है कि विभिन्न देश अपने बैंक गोपनीयता के कानूनों को घरेलू आपराधिक जांच के तहत बाधक नहीं बनने देंगे। सिविल सोसाइटी के सदस्यों के विचार में विदेशों में जमा काले धन को यदि राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया जाता है तो इस पर स्वत: ही रोक लग जाएगी, लेकिन यदि ऐसा होता है तो तमाम खाताधारक अपनी संपत्ति दूसरों के नाम कर देंगे, दान दे देंगे अथवा किसी और काम में लगा देंगे। बेहतर उपाय यह है कि सरकार यह कहे कि जो लोग अपना काला धन खुद घोषित करेंगे उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी और उनके कुल धन का आधा हिस्सा टैक्स के रूप में काट लिया जाएगा और बाकी को बांड के रूप में रखा जाएगा, जिसका ब्याज इन लोगों को ही मिलेगा। इससे काला धन रखने वाले लोग आगे आने को प्रेरित होंगे। सिविल सोसाइटी द्वारा सरकार पर दबाव डाले जाने के बावजूद यूएनसीएसी की पुष्टि नहीं की गई। यह तब है जब मानव विकास सूचकांक में हमारा दर्जा काफी नीचे है और सहस्राब्दि विकास लक्ष्य को हासिल करने में हम पीछे हैं। देश की जनता भ्रष्टाचार के आगे खुद को पूरी तरह असहाय पाती है, लेकिन सवाल वही है कि क्या राजनेता अंतत: कोई कदम उठाएंगे? (लेखिका ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल में कार्यकारी निदेशक हैं)


एमटीएनएल अफसरों ने भी लूटा देश

राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान बही भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाने में एमटीएनएल अधिकारी भी पीछे नहीं रहे। खेलों के दौरान प्रसारण और आंकड़ों के सहज आदान-प्रदान के लिए नेटवर्क बनाने के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न कंपनी के अधिकारियों ने 380 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला कर दिया। सीबीआइ ने घोटाले के आरोपी अधिकारियों के साथ ही नोएडा स्थित एचसीएल इंफो सिस्टम के खिलाफ भी एफआइआर दर्ज कर ली है। इस सिलसिले में जांच एजेंसी ने बुधवार को आरोपी अधिकारियों और कंपनी के ठिकानों की तलाशी ली। सीबीआइ की प्रवक्ता धारिणी मिश्रा ने बताया कि राष्ट्रमंडल खेल के दौरान प्रसारण और आंकड़ों के आदन-प्रदान के लिए 31 करोड़ रुपये की लागत से आप्टिकल फाइबर बिछाने की योजना थी, लेकिन एमटीएनएल के तत्कालीन अधिकारियों ने एचसीएल इंफो सिस्टम के अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर आप्टिकल फाइबर की जगह आइपी/एमपीएलएस तकनीक पर आधारित ब्रोडकास्ट वीडियो नेटवर्क लगाने की योजना बना ली। बात यहीं तक होती तो गनीमत थी। सीबीआइ की मानें तो आइपी/एमपीएलएस तकनीक लगाने में भी 190 करोड़ रुपये से अधिक की लागत नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन एचसीएल इंफो सिस्टम को यह ठेका 570 करोड़ रुपये में देकर सरकारी खजाने को 380 करोड़ का चूना लगाया गया। इस घोटाले के लिए सीबीआइ ने एमटीएनएल के पूर्व प्रबंध निदेशक आरएसपी सिन्हा, पूर्व कार्यकारी निदेशक एसएम तलवार, महाप्रबंधक (कारपोरेट सेल्स) एनके जैन और उप महाप्रबंधक जितेंद्र गर्ग को जिम्मेदार ठहराया है। धारिणी मिश्रा ने जानकारी दी कि इन सभी आरोपियों के दिल्ली, नोएडा, जयपुर, और पटना स्थित ठिकानों पर छापा मारा गया। छापे के दौरान आरोपियों की करोड़ों की चल-अचल संपत्ति के दस्तावेजों के साथ ही कई दूसरे अहम दस्तावेज मिले हैं। देर शाम खबर लिखने तक छापे की कार्रवाई जारी थी।


Friday, June 10, 2011

कालिख का फंदा

ब्रह्म को काले धन की भांति अनुभव करो। अदृश्य, निराकार काला धन हमारे भीतर परम सत्ता की तरह धड़कता है।.. जिज्ञासु भक्त बाबा के वचनों से कृतार्थ हुआ और ब्रह्म को छोड़ काले धन के जुगाड़ में लग गया। क्योंकि इस कालिख को जानने लिए किसी तप की जरूरत नहीं है, यह तो सरकार है जो काला धन तलाशने के लिए समितियां छोड़ रही है। हमें खुद पर तरस आना चाहिए कि सरकार उस एलानिया सच पर आजादी के चौंसठ साल बाद, अब कसमसा रही है जो नागरिक, प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन के पोर-पोर में भिद कर हमारी लत बन चुका है। मत कोसिए लाइसेंस परमिट राज को, काले धन की असली ग्रोथ स्टोरी उस बदनाम दौर के बाद लिखी गई है। मत बिसूरिए बंद अर्थव्यवस्था को, उदार आबो हवा ने कालिख को पंख लगा सर्वव्यापी कर दिया है। मत रहिए इस गफलत में कि ग्रोथ और आय बढ़ना हर मुश्किल का हल है, विकास के साथ लूट भी बढ़ती है। भारत में काले धन की पैदावार के लिए तरक्की का मौसम ज्यादा माफिक बैठा है। कानून काला धन पैदा कराते हैं। बाजार इसे छिपाता है और न्याय का तंत्र इसे पोसता है। हम अब चिंदी चोर तरीकों से लेकर बेहद साफ सुथरे रास्तों तक से काला धन बनाने में महारथ रखते हैं। काला धन तो कब का अपराध, शर्म या समस्या की जगह सुविधा, स्वभाव, संस्कार और आवश्यकता बन चुका है। किल्लत की कालिख भारत की 99.5 फीसदी आबादी कोटा, लाइसेंस, परमिट नहीं चाहती। सांसद, विधायक, मंत्री, राजदूत बनने की उसे तमन्ना नहीं है। उसे तो सही कीमत व समय पर बुनियादी सुविधाएं और जीविका व बेहतरी के न्याय संगत मौके चाहिए और इनकी ही सबसे ज्यादा किल्लत है। भारत का अधिकांश भ्रष्टाचार किल्लत से उपजता है। उदारीकरण में सुविधाओं और सेवाओं की मांग बढ़ी, किल्लत नहीं घटी। रेलवे रिजर्वेशन से लेकर अनापत्ति प्रमाण पत्र तक, स्कूल दाखिले से लेकर, इलाज तक हर जगह मांग व आपूर्ति में भयानक अंतर है, जो कुछ लोगों के हाथ में देने और कुछ को उसे खरीदने की कुव्वत दे देता है। हमारी 76 फीसदी रिश्वतें 2.5 लाख रुपये और उससे कम (संदर्भ ब्राइब लाइन रिपोर्ट) की होती हैं। इसमें भी करीब 26 फीसदी रिश्वत 20 डॉलर यानी महज एक हजार रुपये की होती है। भारत में 51 फीसदी रिश्वत बस, सिर्फ काम को समय पर कराने के लिए दी जाती है। काले धन के पिरामिड का यह चौड़ा आधार सुविधाओं और व्यवस्थाओं की कमी से निकला है। वैसे आपूर्ति बढ़ने से भ्रष्टाचार रुकने की कुछ उजली गाथाएं भी हमारे पास हैं। फोन के लिए अब रिश्वत और सीमेंट, कार खरीदने के लिए नेता जी की पर्ची नहीं चाहिए आदि आदि। अगर बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति पारदर्शी और पर्याप्त हो जाए तो शायद काले धन की सबसे घटिया फैक्टि्रयां बंद हो जाएंगी, क्योंकि आम लोगों को 2जी लाइसेंस या कॉमनवेल्थ के ठेकों की जरूरत नहीं है। ताकत की कालिख भारत का उदारीकरण चालाकी से हुआ, नीतियां बदलीं, कानून नहीं। लाइसेंस परमिट राज प्रक्रियाओं व अधिकारों में छिप गया। भारत एक चुनिंदा जमात के विवेकाधीन अधिकारों का अभयारण्य है। सड़क के किनारे खड़े पुलिस वाले से लेकर सबसे बड़े नौकरशाह तक, सिस्टम को शिकंजा बनाने के अकूत अधिकारों से लैस हैं। सुविधाओं की किल्लत के सहारे उनकी यह ताकत मारक हो जाती है। नीतियों में पेंच और उनके सहारे तरफदारी व उपेक्षा की कला सिखाने के लिए हमारी नौकरशाही स्कूल खोल सकती है। अदना सी सेवा के लिए लोगों को नोचने के नियमों से भरा सरकारी तंत्र, मानो काला धन पैदा करने के कानूनी अधिकारों पर चलता है। 121 करोड़ लोगों के इस देश में बेहद सामान्य सुविधाएं और नागरिक अधिकार देने की ताकत केवल कुछ लाख लोगों के पास है। आंकडे़ (ब्राइब लाइन) गवाह हैं, भारत में कुल रिश्वतों में मोटी रिश्वतें (पांच लाख रुपये से ऊपर) केवल 14 फीसदी हैं। जो हर दफ्तर के महज एक दो फीसदी बड़े अफसरों को जाती है। हमारे यहां 91 फीसदी रिश्वत सरकारी बाबू लेते हैं और 77 फीसदी रिश्वत काम वक्त पर कराने या कारोबारी नुकसान से बचने के लिए दी जाती है। राजनेताओं व नीति निर्माताओं का बहुत छोटा समूह ताकत की इस कालिख का नियंता है, जो बहुत बड़ी कीमत पर, थोड़े से लोगों को कुछ स्पेक्ट्रम, कुछ खदानें, कुछ जमीनें, कुछ कंपनियां, कुछ ठेके दे देता है। काले धन के पिरामिड का शिखर यही है। हिफाजत की कालिख काले धन की भारतीय दुनिया जटिल है। छोटे लेन-देन के सहारे बना कालाधन मेहनती मध्यवर्ग के बीच एक काला उच्च वर्ग तैयार करता है, जो इस पैसे से दूसरों का हक मारकर सुविधाएं खरीदते हैं। अंतत: यह पूरी कालिख, राजनीति, उद्योग, नौकरशाही के शिखरों पर एकत्र हो जाती है, क्योंकि वहां इसकी सुरक्षा और निर्यात के रास्ते मौजूद हैं। आय से अधिक संपत्ति के मामले में किसी बडे़ नाम को सजा नहीं (सुखराम को छोड़कर, नकद बरामद होने के कारण) होती। काला धन के पीछे भ्रष्टाचार, जरायम, हकमारी की कई पतर्ें हैं, जबकि जांच तंत्र बोदा और भ्रष्टाचार रोकने के कानून सतही व बौने हैं। काले धन के निवेश के दर्जनों घोषित और प्रामाणिक ठिकानों, मसलन जमीन जायदाद, वित्तीय कारोबार और कंपनियों के मकड़जाल, को रोकने का कानूनी ढांचा हमारे पास नहीं है। काला धन न तो अब अपराध के तौर पर तलाशा जाता है और न ही शर्मिंदगी का बायस है। इसका उत्पादन स्वाभाविक और इस्तेमाल सुरक्षित है। कालिख के कलाकार पूरी ठसक के साथ बच निकलते हैं। सरकार जागी कहां है? समितियां तो सरकार की उबासियां हैं। हाकिमों को कब समझ में आएगा कि हम जांच समितियों के लिए नहीं, किल्लत दूर करने वाले सिस्टम, विवेकाधीन अधिकारों को सीमित करने वाली नीतियों और सजा दिलाने वाले कानूनों के लिए तरस रहे हैं। अर्थव्यवस्था के फैलते आकार के सामने वैध वित्तीय तंत्र छोटा पड़ गया है। काले धन की असंख्य अदृश्य पाइप लाइनें हमारे आसपास हैं, सिस्टम से भयभीत और किल्लत के मारों से लेकर बड़े-छोटे तक सब इनका इस्तेमाल करते हैं। वैसे तो हर अर्थव्यवस्था, एक छोटी मोटी समानांतर अर्थव्यवस्था को पचाने की कुव्वत रखती है, क्योंकि पैसे का प्रवाह ही इसकी हिफाजत है। मगर हम तो अपनी खपत से कई गुना ज्यादा काला धन बना रहे हैं और विदेशों में छिपा रहे हैं। हम स्याह पसंद कारोबारियों, प्रॉफिट सेंटरों जैसे सरकारी दफ्तरों, बेफिक्र नेताओं और मौलिक अधिकार खरीदते आम लोगों का मुल्क हो गए हैं। हम दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि सबसे तेज बढ़ती काली अर्थव्यवस्था भी हैं। यह हमारी उद्यमिता पर लगा सबसे बड़ा कलंक है। हमारी ग्रोथ स्टोरी दागदार है।