बोफोर्स कांड हमारे देश के लिए एक बदनुमा दाग है, लेकिन इस दाग को धोने की कभी कोई ईमानदार कोशिश नहीं हुई। देखा जाए तो बोफोर्स से बड़ा कांड तो उसे दबाने का है। राजीव गांधी सरकार की पूरी कोशिश रही कि इसमें धन किसने लिया है, उसका नाम कभी सामने न आने पाए। पूरी कवायद इस मामले को दबाने की ही रही है। इसीलिए यह मामला इतना संगीन था, लेकिन इस देश की कई पीढ़ी बोफोर्स के सही अपराधी का नाम नहीं जान पाएगी। यह भारतीय राजनीति का ऐसा दु:स्वप्न है, जिसे दोबारा देखना किसी हादसे से कम नहीं होगा। राजनेताओं की ढिलाई किस हद तक हो सकती है, यह इस मामले से जाना जा सकता है। सत्ता के दलाल अपना खेल खेल जाते हैं और प्रजातंत्र सिसकता रहता है। बोफोर्स कांड पहली बार 15 अप्रैल 1987 में सामने आया था। इस तरह से यह मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति के परिदृश्य में छा गया है। मानो इस घटना की सिल्वर जुबली हुई हो। इस बार इसका खुलासा स्वीडन के भूतपूर्व पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रोम के एक साक्षात्कार से हुआ है। अपने साक्षात्कार में लिंडस्ट्रोम ने बताया है कि इतालवी व्यापारी अट्टावियो क्वात्रोची की भूमिका पर पूरी तरह से पर्दा डालने के लिए उन पर भारत के बड़े नेताओं का दबाव था। उन्होंने दूसरी चौंकाने वाली बात यह कही कि इस मामले में राजीव गांधी के मित्र अमिताभ बच्चन के खिलाफ किसी भी तरह का सबूत न होने के बाद भी उन्हें फंसाने के लिए भी दबाव था। इस रहस्योद्घाटन से अमिताभ बच्चन को काफी राहत हुई है। उनके अनुसार दुख इस बात का है कि ऐसा उनके माता-पिता के रहते नहीं हो पाया। उन्हें निर्दोष साबित होने में 25 साल लग गए। यहां सवाल यह उठता है कि अमिताभ को फंसाने और क्वात्रोची को बचाने के लिए आखिर किस नेता ने दबाव बनाया था। इसका खुलासा क्यों नहीं हो पा रहा है? बोफोर्स कांड तो केवल 64 करोड़ रुपये का था। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के आगे तो यह राशि कुछ भी नहीं है। बोफोर्स कांड पिछले 25 सालों से देश की राजनीति में बार-बार सामने आता रहा है और हर बार गांधी परिवार को शर्मसार होना पड़ा है। इस कांड का मुख्य आरोपी कौन है, क्या भारतीय जनता कभी उसका नाम जान पाएगी? यह प्रश्न पिछले 25 सालों से देश को मथ रहा है। मामला दबाने की पूरी कोशिश हुई 15 अपै्रल 1987 को बोफोर्स कांड का धमाका स्वीडन रेडियो पर हुआ था। इस सौदे में 64 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी। तब राजीव गांधी सरकार हिल गई थी। इस रिश्वत को देने के लिए भारतीय राजनेताओं और दलालों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए इटली के व्यापारी क्वात्रोची का इस्तेमाल किया गया था। क्वात्रोची गांधी परिवार का काफी करीबी था। इस कांड में शक की सुई सदैव राजीव गांधी पर ही जाकर टिकती थी। इसीलिए इसकी लीपापोती करने के लिए एक बड़ा ऑपरेशन किया गया। ऐसा ऑपरेशन भारतीय राजनीति में इसके पहले कभी नहीं देखा गया था। यह ऑपरेशन बोफोर्स से भी बड़ा कांड था। इसमें सीबीआइ और आइबी का भी खूब इस्तेमाल किया गया। राजीव गांधी ने जिस तरह से बोफोर्स कांड पर पर्दा डालने के लिए जांच एजेंसियों का गलत इस्तेमाल किया था, ठीक उसी तरह वीपी सिंह सरकार ने इस मामले में राजीव गांधी की भूमिका को पर्दाफाश करने के लिए इन संस्थाओं का दुरुपयोग किया। वीपी सिंह के सचिव भूरे लाल के अनुसार दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आर्थिक व्यवहार की जांच के लिए यूरोप की एक निजी जांच एजेंसी की सेवाएं ली गई थीं। इस एजेंसी ने जो कुछ भी जानकारी हासिल की, उसे कुछ पत्रकारों को देकर राजीव गांधी की छवि को धूमिल करने पूरी कोशिश की गई। उस समय राजीवन गांधी विपक्ष के नेता थे। वीपी सिंह के तमाम प्रयासों के बाद भी बोफोर्स कांड का सच बाहर नहीं आ पाया। स्टेन ने ही दिए थे चित्रा को कागजात बोफोर्स के बारे में जो कुछ हम जानते हैं, उसमें एक अंग्रेजी अखबार की पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम की अहम भूमिका है। 1987 में जब यह कांड बाहर आया, तब वह जिनेवा में पदस्थ थीं। उस समय स्वीडन के पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रोम थे। उन्हीं ने चित्रा को बोफोर्स के गुप्त कागजात सौंपे थे। भारत में जब इस कांड ने तहलका मचाया, तब प्रजा के विरोध के चलते जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया। इसकी रिपोर्ट दो वर्ष बाद आई। आश्चर्य की बात यह है कि 1987 के अगस्त में यह मामला बाहर आया, लेकिन सीबीआइ ने 1989 तक इसकी एफआइआर नहीं लिखी थी। मतलब यही कि जब तक राजीव गांधी प्रधानमंत्री रहे, एफआइआर लिखी ही नहीं गई। वर्ष 1989 में जब लोकसभा के चुनाव हुए, तब कांगे्रस को बहुमत नहीं मिला। लिहाजा, वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। इसके बाद जनवरी 1990 में इस मामले की एफआइआर सीबीआइ ने लिखी। 1991 के मई माह में राजीव गांधी की हत्या हो गई। लोकसभा चुनाव हुए और नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने। तब बोफोर्स मामले की जांच सीबीआइ ने ढीली कर दी। आश्चर्य की बात यह है कि उस समय क्वात्रोची भारत में ही था। वह तो जुलाई 1993 में भारत से चला गया। सीबीआइ की वर्षो की मेहनत से यह सामने आया कि स्विस सरकार ने 1997 में अपने बैंक के गुप्त खातों की जानकारी दी, जिसमें बोफोर्स कांड की रिश्वत जमा होने की जानकारी दी गई। क्वात्रोची को क्लीनचिट क्यों सीबीआइ ने 1997 के अंत में बोफोर्स मामले में जो चार्जशीट फाइल की, उसमें राजीव गांधी के अलावा क्वात्रोची, बोफोर्स कंपनी के भूतपूर्व प्रमुख मार्टिन आर्डबो, बोफोर्स के भारत के एजेंट विन चड्ढा, तत्कालीन रक्षा सचिव एसके भटनागर आदि का नाम था। जब ये आरोप पत्र फाइल किए गए, तब क्वात्रोची मलेशिया में था। उसकी धर-पकड़ के लिए वर्ष 2000 में भारत सरकार ने मलेशिया सरकार को पत्र भी लिखा था। उस समय राजग सरकार थी और प्रधानमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी। किसी कारणवश बोफोर्स कांड की जांच धीमी पड़ गई और इसका लाभ क्वात्रोची ने भरपूर उठाया। मलेशिया सरकार ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया। 2001 में चड्ढा और भटनागर का निधन हो गया। वर्ष 2004 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि बोफोर्स कांड में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भूमिका के कोई सबूत नहीं मिले हैं। इस मामले का आरोपी क्वात्रोची ही था। इस पर सीबीआइ के अनुरोध के चलते क्वात्रोची की गिरफ्तारी के लिए इंटरपोल ने रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया था। इस नोटिस के अनुसार अर्जेटीना की पुलिस ने 2007 में क्वात्रोची की धर दबोचा था। उस समय उसे भारत लाकर उस पर मुकदमा चलाया जा सकता था, पर ऐसा नहीं हो पाया। भारत सरकार ने अर्जेटीना सरकार को जरूरी कागजात नहीं दिए, लिहाजा क्वात्रोची एक बार फिर छूट गया। मार्च 2011 में सीबीआइ ने क्वात्रोची को सारे आरोपों से मुक्त कर निर्दोष साबित कर दिया। आज की तारीख में भारत में क्वात्रोची के खिलाफ कोई मामला नहीं है। अब वह इज्जत के साथ भारत आ सकता है। इस मामले में अब तक के परिश्रम से यही बाहर आया है कि स्वीडिश कंपनी द्वारा 64 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी। पर यह रिश्वत किसे मिली, यह किसी को नहीं पता। स्वीडन के पुलिस प्रमुख के रहस्योद्घाटन से यही पता चलता है कि यह रिश्वत जिसे दी गई, उसकी पहचान छिपाने के लिए राजीव गांधी ने खूब मेहनत की थी। उसकी पहचान छिपाने के पीछे उनका इरादा क्या था, इसकी जानकारी शायद हमें कभी नहीं मिल पाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Monday, April 30, 2012
फिर बोतल से निकला बोफोर्स का जिन्न
खाद्यान्न घोटाले में यूपी को करोड़ों का चूना
खाद्यान्न घोटाले में दो अफसरों की भी संदिग्ध भूमिका है। इस घोटाले में सरकार को 7.56 करोड़ रुपये का चूना लगाया गया है। सरदार दलजीत सिंह ने घोटाले की रकम इन अफसरों तक भी पहंुचाई है। सीबीआइ ने बुधवार की सुबह जिला कारागार से दलजीत और गोदाम प्रभारी सुरेश धर दुबे को रिमांड पर लाने के बाद पूछताछ की तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। यह पूछताछ 28 अप्रैल तक चलेगी। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश खाद्य-आवश्यक वस्तु निगम के दो अधिकारियों का दलजीत को संरक्षण प्राप्त रहा है। उसको ठेका दिलाने से लेकर उसकी मदद करने में इन अधिकारियों की सक्रिय भूमिका रही। सीबीआइ अधिकारियों के बैंक खातों की संदर्भित वर्ष की जांच भी कर रही है। 2004-05 व 2005-06 में हुए खाद्यान्न घोटाले में दलजीत सिंह और उसके कॉकस ने सरकार को 7.56 करोड़ रुपये का चूना लगाया है। इस रकम की हेराफेरी में उसने कइयों को हिस्सेदारी दी है। दलजीत और उसके साथियों की करतूत के बारे में सीबीआइ का आरोप है वर्ष 2004-05 एवं 2005-06 में पीडीएस के लिए आरक्षित अनाज को उठाकर खाद्यान्न को परिवहन में प्रयुक्त फर्जी नंबरों के वाहन से खुले बाजार में ब्लैक में बेच दिया गया।
मंत्रालयों ने बिना अनुमति खर्च कर दिए 22 हजार करोड़
सरकार के कई मंत्रालय व विभाग संसद से मंजूर राशि से कहीं अधिक खर्च कर रहे हैं। नियमों का उल्लंघन कर 21703.12 करोड़ रुपये की राशि सरकारी खजाने से निकालने को लेकर भारत के नियंत्रक व महा लेखा परीक्षक(कैग) ने मंत्रालयों व विभागों को फटकार लगाई है। कैग का कहना है कि रेलवे व रक्षा मंत्रालय तथा डाक जैसे विभागों ने 2010-11 में इस बढ़े हुए खर्च के लिए संसद की मंजूरी ही नहीं ली। संसद में मंगलवार को पेश कैग की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अवधि में रेलवे, डाक विभाग और रक्षा समेत कुछ अन्य मंत्रालयों व विभागों ने संसद की मंजूरी बिना11,043 करोड़ खर्च कर डाले, जबकि संविधान की धारा 114 (3) साफ कहती है कि बिना संसद की मंजूरी लिए सरकारी खजाने से एक भी पैसा नहीं निकाला जा सकता। इस मामले में वित्त मंत्रालय का केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) भी पीछे नहीं है। विभाग ने 2010-11 में रिफंड पर ब्याज का भुगतान करने को खजाने से 10499 करोड़ रुपये लिए। विभाग ने ऐसा पहली बार नहीं किया है। गत पांच साल में वो ब्याज भुगतान के लिए 37365 करोड़ इसी तरह निकाल चुका है। कैग का कहना है कि सरकार ने कभी अपने बजट में ब्याज भुगतान का प्रावधान नहीं किया। हालांकि अपने जवाब में विभाग ने कहा है कि ब्याज का भुगतान वैधानिक जिम्मेदारी है लिहाजा संसद की अनुमति जरूरी नहीं है, लेकिन कैग ने सीबीडीटी की दलील ठुकरा दी है। कैग के अनुसार, नियमों के मुताबिक ब्याज का भुगतान खर्च मद में आता है और इसके लिए आवश्यक राशि नियम मुताबिक ही ली जा सकती है।
भ्रष्टाचार की शिकार विदेशी सहायता
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के माध्यम से भारत में अरबों डॉलर आता है जो न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेशित होता है, बल्कि उसके विकास की दिशा में सहायक होता है, लेकिन सामाजिक विकास के लिए जो विदेशी सहायता मिलती है उसके बारे में यह सच नहीं है। विदेशी सहायता या सामाजिक उत्थान के लिए दी गई विदेशी मदद जिस मकसद के लिए लिए दी जाती है शायद ही वह कभी अपने उस उद्देश्य को पूरा कर पाती हो। अधिकतर इस मद में मिली सहायता राशि का किसी दूसरी जगह इस्तेमाल कर लिया जाता है। बहुधा तो यह भ्रष्ट अधिकारियों के खाते में ही चली जाती है। विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, सहायता कार्यक्रम भ्रष्टाचार, खराब प्रशासन और अल्पभुगतान जैसी बुराइयों से घिरी हुई है। गरीबी उन्मूलन के लिए मिली विशाल धनराशि को राष्ट्रमंडल खेलों के लिए निर्माण कार्यो में झोंक दी गई जहां वह एक बार फिर फिर भ्रष्टाचार के चंगुल में फंस गई। ब्रिटेन स्थित एक स्वयंसेवी संगठन एक्शन एड ने सुनामी पीडि़तों के लिए आवास निर्माण के लिए सहायता के बारे में अनियमितताएं पाई और उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारत में सुनामी प्रभावित क्षेत्रों में कुल 98,447 घरों का निर्माण होना था पर घर बने लक्ष्य से महज 28 फीसदी। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जहां 9,174 घरों की मरम्मत की जरूरत थी वहां अब तक पुनर्निर्माण का काम केवल एक प्रतिशत ही हो सका है। बाढ़ की वजह से हर साल कितना नुकसान होता है इससे हर भारतीय वाकिफ है। आपदा का बेहतर उपयोग कैसे कर सकते हैं यह बात हमारे अधिकारियों से ज्यादा और कौन जान सकता है। वास्तव में प्रशासकों को तो आपदा का इंतजार रहता है कि कब आपदा आए और वे उसका भरपूर लाभ उठा सकें। शिक्षा और सर्वशिक्षा अभियन के बारे में तो यह शर्मिदगी ीमाओं को पार कर गई है। एक जांच रिपोर्ट में पाया गया कि शिक्षा और सर्व शिक्षा अभियान के लिए ब्रिटेन द्वारा दी गई लाखों पाउंड की सहायता राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई और गरीब बच्चों को इससे कोई लाभ पहुंच पाता उससे पहले ही यह गायब हो गई। अधिकारियों ने बड़ी बेशर्मी से 340 मिलियन पौंड के आसपास की धनराशि हड़प ली और विलासिता की ऐसी शानदार वस्तुएं खरीदने में इसको खर्च किया जिसका शिक्षा के साथ दूर तक का भी कोई रिश्ता न था। दान की राशि में घोटाले के बाद ब्रिटेन सरकार ने भारत को दी जाने वाली विदेशी सहायता राशि में कटौती का फैसला किया। मंथन ब्लॉग में प्रसून एस मजूमदार
रीता बहुगुणा का करीबी खाद्यान्न घोटाले में गिरफ्तार
Monday, April 16, 2012
और अब सड़क घोटाला
2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, खनन, हाउसिंग सोसाइटी के बाद अब सड़क घोटाले का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है। लेकिन इस घोटाले को उजागर करने का श्रेय किसी जनहित याचिका अथवा सीएजी की रिपोर्ट को न जाकर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट मिलता है। विश्व बैंक की इंस्टीट्यूशन यूनिट की रिपोर्ट के मुताबिक ठेकेदारों ने नेशनल हाइवे एथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआइ) के अधिकारियों और सलाहकारों को प्रभावित करने के लिए 1.15 करोड़ रुपये की रिश्वत दी। सिर्फ 9.88 लाख रुपये तो अधिकारियों को उपहार देने और होटलों की बुकिंग के लिए खर्च किए गए। ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर के तहत लखनऊ से मुजफ्फरपुर के बीच बन रहे राजमार्ग, जीटी रोड सुधार परियोजना और राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के तीसरे चरण में बड़े पैमाने पर गड़बडि़यां पाई गईं। विश्व बैंक की रिपोर्ट जारी होने के बाद सरकार ने मामले की जांच कराने का फैसला लिया। राजमागरें के निर्माण में गड़बडि़यां लंबे समय से सुनाई दे रही हैं। तब सरकार ने किसी प्रकार की जांच क्यों नहीं कराई। करीब दशक भर पहले एक ईमानदार इंजीनियर सत्येंद्र दुबे ने एनएचएआइ में भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक पत्र लिख था, जिसके बाद उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। देखा जाए तो सड़कें किसी भी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा और बुनियाद होती हैं। अमेरिका व यूरोपीय देशों के तीव्र विकास में तीव्रगामी राजमागरें की उल्लेखनीय भूमिका रही है। भारत में भी जिन राज्यों में सड़कों का व्यवस्थित नेटवर्क है, वे विकास की दौड़ में आगे हैं जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु। दूसरी ओर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा के आर्थिक पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह सड़कों की दयनीय स्थिति भी है। दरअसल, तीव्रगामी राजमार्ग उत्पादकों व उपभोक्ताओं के बीच, खेतों, कारखानों व बाजारों के बीच और लोगों व अवसरों के बीच संपर्क मुहैया कराते हैं। उद्योग संगठन एसोचैम की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि खराब सड़कों से देश की अर्थव्यवस्था को हर साल 30,000 करोड़ रुपये की चपत लगती है। राजग सरकार ने 1998 में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (एनएचडीपी) शुरू की, जिसे राजमागरें के सुधार, विस्तार आदि का काम सौंपा गया था। उस दौरान एक ऐसा समय था जब रोजाना 11 किलोमीटर सड़कों का निर्माण होने लगा था, लेकिन जैसे ही संप्रग सरकार आई एनएचडीपी पर मानो ब्रेक लग गया। 11 किलोमीटर की रफ्तार घटकर महज दो किलोमीटर पर आ गई। बाद में कमलनाथ ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री का पद संभालते ही जोर-शोर से घोषणा की थी कि अगले पांच वषरें में 35,000 किमी राजमागरें का निर्माण किया जाएगा अर्थात रोजाना 20 किलोमीटर। लेकिन भूमि अधिग्रहण संबंधी कठिनाइयों तथा धन की कमी के चलते निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं हो सका। अब मंत्रालय प्रतिदिन 20 किलोमीटर के लक्ष्ये को 2014 तक हासिल करने की बात कर रहा है। भले ही एनएचएआइ ने भारी-भरकम लक्ष्य निर्धारित किया हो, लेकिन संगठनात्मक कमजोरियों के चलते उसे हासिल करना कठिन होगा। गौरतलब है कि एनएचएआइ में पिछले डेढ़ साल से कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है। इसे हर साल पेट्रोलियम पर सेस के जरिए करीब पांच हजार करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। इसके बावजूद महत्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर पूरा नहीं हो पाया है। सड़क परिवहन मंत्रालय में नीतियों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। फिर सलाहकारों, इंजीनियरों और ठेकेदारों के भ्रष्ट गठजोड़ के कारण सड़कों की गुणवत्ता गिरती जा रही है और वे दो-तीन साल में ही गड्ढ़ों में तब्दील होती जा रही हैं। दूसरी ओर टोल टैक्स से होने वाली वसूली की दरों में लगातार इजाफा होता जा रहा है। इसमें भी एक बड़ा घोटाला छिपा हुआ है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) राजमार्ग निर्माण में धांधलियों पर रमेश दुबे की टिप्पणी
हिमाचल में हुआ रिफाइंड घोटाला
हिमाचल प्रदेश के गरीबों के लिए राज्य नागरिक आपूर्ति निगम ने 10 लाख लीटर अतिरिक्त रिफाइंड तेल किसे बेचा और कहां तड़का लगाया इसका कोई रिकार्ड नहीं है। निगम ने अगस्त 2011 के लिए दस लाख लीटर सोया रिफाइंड तेल की खरीद को 19 जनवरी, 2009 में दूसरी बार निविदा आमंत्रित की थी। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि बैकलॉग के तहत रिफाइंड तेल होने के बावजूद निगम ने 10 लाख लीटर तेल अधिक खरीदा गया। कैग ने राज्य नागरिक आपूर्ति निगम पर उंगली उठाते हुए कहा कि इससे सरकार को 29.80 लाख रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। छह जनवरी, 2009 को गुजरात की एक कंपनी अंबुजा एक्सपोर्ट समिति से रिफाइंड तेल की आपूर्ति के लिए एकल निविदा हुई और 15 लाख लीटर सोया रिफाइंड तेल की सिफारिश की गई। उस समय प्रदेश को मात्र 14.50 लाख लीटर तेल की ही आवश्यकता थी।
कागजों में लगे सवा दो सौ करोड़ के पौधे
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के उद्यान विभाग ने दो साल में शहर को हरा-भरा बनाने के नाम पर सवा दो सौ करोड़ रुपये खर्च कर दिए। इतनी बड़ी रकम महज दो लाख पौधे लगाने में खर्च हुई है। दो साल पहले तक 18 लाख पौधे लगाने में मात्र 80 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। दो साल में पौधे लगाने के नाम पर सवा दो सौ करोड़ रुपये कहां खर्च हुए? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक यह है कि प्राधिकरण की स्थापना से अब तक लगाए गए कुल 20 लाख पौधों में से नौ लाख पौधे गायब हैं। इसका खुलासा प्राधिकरण की सर्वे रिपोर्ट में हुआ है। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के उद्यान विभाग के दस्तावेज, दो साल में पौधारोपण के नाम पर हुए खेल की तरफ इशारा करते हैं। इनके मुताबिक बाजार में जिस पौधे की कीमत 250 से 300 रुपये है, उसे उद्यान विभाग ने दस हजार रुपये से लेकर 32 हजार रुपये तक में खरीदा है। एनएच-24 लिंक रोड पर पौधे की सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड लगाने पर वर्ष 2009 में 1,71,72,480 रुपये खर्च किए गए। इन्हीं जगहों पर फरवरी 2012 में 1800 ट्री गार्ड लगाकर उसका दोबारा भुगतान करा लिया गया। ग्रेटर नोएडा की पहचान उसके हरे-भरे पार्क, ग्रीन बेल्ट व चौड़ी सड़कों के लिए प्रदेश भर और देश भर में है। यह परिदृश्य तब था जब प्राधिकरण के उद्यान विभाग का बजट सात से आठ करोड़ रुपये वार्षिक हुआ करता था। उद्यान विभाग साल भर में पौधारोपण पर इतना रुपया भी खर्च नहीं कर पाता था। उद्यान विभाग के दस्तावेज बताते हैं कि 1991 से लेकर सितंबर 2010 तक पौधारोपण पर 80 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इस दौरान कुल 18 लाख पौधे लगाए गए थे। सितंबर 2010 से लेकर फरवरी 2012 तक उद्यान विभाग ने दो लाख पौधे लगाए, इन पर कुल सवा दो सौ करोड़ रुपये खर्च हुए। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होने के बाद प्राधिकरण में भी उलट फेर हुआ। उद्यान विभाग के नए अधिकारियों ने जब पौधरोपण की फाइल टटोली तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। सर्वे कराने पर पता चला कि फाइलों में लगे 20 लाख पौधों में से नौ लाख पौधों का जमीन पर कोई अस्तित्व नहीं है। नोएडा एक्सटेंशन से लेकर 130 मीटर रोड, नॉलेज पार्क व ओमीक्रान सेक्टर में पौधे लगाने का दावा कागजों में किया गया है। कागजों में ऐसे पौधे लगाने का उल्लेख है जो यहां की जलवायु के अनुकूल नहीं हैं। पौधे लगाने का जिम्मा ज्यादातर ऐसी फार्मो को दिया गया जिनके मालिक उद्यान विभाग में तैनात रहे कुछ अधिकारियों के सगे संबंधी हैं। नोएडा एक्सटेंशन में पुराने खजूर के पेड़ लगाकर प्रति पेड़ 32 हजार रुपये का भुगतान करा लिया गया, जबकि ग्रेटर नोएडा के ही सूरजपुर पक्षी विहार में इनकी भरमार है। अलेस्टोनिया के दस फीट ऊंचे एक वृक्ष के लिए छह हजार रुपये का भुगतान किया गया, जिसकी बाजार में कीमत महज 400 से 500 रुपये है। दस्तावेजों के मुताबिक नोएडा एक्सटेंशन में अलेस्टोनिया के 150 वृक्ष लगाए गए हैं, जबकि मौके पर एक भी वृक्ष नहीं है। नोएडा एक्सटेंशन में उद्यान विभाग ने डी पार्क के नाम से एक साल में पार्क विकसित किया। पार्क का बजट आठ करोड़ रुपये था, जिस पर उद्यान विभाग करीब छह करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। बावजूद डी पार्क में कुछ नहीं है। एक दशक पहले प्राधिकरण ने सिटी पार्क विकसित किया था, इस पर मात्र एक करोड़ रुपये अब तक खर्च हुए हैं। सिटी पार्क अभी तक ग्रेटर नोएडा की शान बना हुआ है।
यूपी में निजी कालेजों ने फर्जी प्रवेश दिखा कर हड़पे 700 करोड़
छात्रों की बेरुखी से उजड़ रहे प्रबंधन एवं तकनीकी संस्थानों ने फलने-फूलने के लिए भ्रष्टाचार की राह पकड़ ली है। संस्थानों पर केंद्र और राज्य सरकार के खजाने में सात अरब रुपये की सेंधमारी का आरोप लगा है। यह खेल शुल्क प्रतिपूर्ति और छात्रवृत्ति के नाम किया गया है। इसमें अनुसूचित जाति एवं जनजाति के विद्यार्थी प्रभावित हुए हैं। ज्यादातर कालेजों ने फर्जीवाड़ा कर धन भी प्राप्त कर लिया है। प्रदेश में गौतम बुद्ध प्राविधिक विश्वविद्यालय (जीबीटीयू) और महामाया प्राविधिक विश्वविद्यालय (एमटीयू) से संबद्ध इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेजों की संख्या करीब 800 है। इनमें प्रवेश के लिए इस बार एमटीयू ने राज्य प्रवेश परीक्षा कराई थी। काउंसिलिंग में 600 से अधिक कॉलेजों की सीटें नहीं भर सकीं, कुछ कालेजों का तो खाता तक नहीं खुला। इस प्रकार न तो फर्जी छात्र परीक्षा में शामिल हुए और न ही इनका रिजल्ट बना। कॉलेजों ने केवल कागजों पर इन खाली सीटों पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के विद्यार्थियों का प्रवेश दिखा दिया। इस श्रेणी के बीटेक छात्र को 4400 रुपये छात्रवृत्ति और 72,400 रुपये शुल्क प्रतिपूर्ति (कुल 76,800 रुपये) जबकि मैनेजमेंट के छात्र को 4400 रुपये छात्रवृत्ति और 78800 से एक लाख बीस हजार रुपये शुल्क प्रतिपूर्ति (कुल 83200 रु.) दी जाती है। बानगी के तौर पर उन्नाव स्थित एक कॉलेज ने 120 छात्र संख्या में 108 छात्र अनुसूचित जाति के दिखाकर छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति के एक करोड़ दस लाख रुपये का गबन कर लिया। मोहनलालगंज स्थित लखनऊ मॉडल इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट और लखनऊ मॉडल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट एक ही परिसर में चल रहा है। यहां एमबीए में 120 विद्यार्थियों का प्रवेश लिया गया है, इनमें 101 अनुसूचित जाति के हैं। परीक्षा में कुल 120 छात्रों में केवल 22 ही शामिल हुए जबकि बाकी का अता-पता नहीं है। इसी प्रकार बीटेक में 227 विद्यार्थियों का प्रवेश लिया गया। इनमें 109 एससी और 88 ओबीसी के छात्र हैं। परीक्षा में 67 विद्यार्थी शामिल नहीं हुए। इन छात्रों के दस्तावेज 10-10 हजार रुपये में खरीदे गए और केवल दस्तावेजों में प्रवेश दिखाया गया। कॉलेज ने सभी छात्रों की शुल्क प्रतिपूर्ति और छात्रवृत्ति के मद सवा करोड़ रुपये समाज कल्याण से मांगे। जागरण के जानकारी मांगने के बाद प्रबंधन ने समाज कल्याण विभाग में उपस्थित छात्रों के मद का धन देने की अर्जी लगा दी। कॉलेज के चेयरमैन अवधेश सिंह का कहना है कि कई कॉलेजों ने तो फर्जी प्रवेश करके पैसा ले लिया है। उन्होंने तो केवल परीक्षा में उपस्थित छात्रों को ही प्रतिपूर्ति शुल्क देने का प्रार्थना पत्र विभाग को दिया है। काकोरी प्रबंधन संस्थान के मैनेजिंग ट्रस्टी नवशाद ने बताया कि छात्र आए नहीं तो कॉलेज क्या कर सकता है, अगली बार से ध्यान देंगे। समाज कल्याण विभाग के निदेशक मिश्री लाल पासवान ने कहा कि कॉलेजों की ओर से विद्यार्थियों की सूची दी गई है उसमें इस बार एससी व एसटी छात्रों की संख्या अधिक है। कुछ कॉलेजों से इस बाबत अतिरिक्त जानकारी मांगी भी गई है। अगर गबन का मामला प्रकाश में आता है तो दोषी कालेजों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई जाएगी। गौतम बुद्ध प्राविधिक विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो.वीके सिंह ने कहा कि पूरा मामला खुला तो एनआरएचएम से बड़ा घोटाला निकलेगा। हर पहलू की पड़ताल करने के बाद ही कोई कदम उठाया जाएगा।
Monday, April 9, 2012
हिमाचल में भी धड़ल्ले से चल रहा अवैध खनन का कारोबार
प्रदेश में जाली एम फार्म के माध्यम से अवैध खनन का कारोबार खूब चल रहा है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग ) रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि पहाड़ी राज्य की नदियों एवं वन भूमि पर अवैध खनन का धंधा जारी है। प्रदेश में अवैध खनन कर रहे ठेकेदारों ने बिना एम फार्म के ही वाहन, पशु एवं परिवहन के अन्य साधनों से लघु खनिजों की सप्लाई की। बिना एम फार्म से इस तरह की अनुमति नहीं मिलती है। रिपोर्ट में कहा है कि सोलन, बिलासपुर, कांगडा, मंडी, शिमला, किन्नौर, ऊना व हमीरपुर में अवैध खनन पर रोक लगाने में भू-विज्ञान व सरकार नाकाम है। प्रदेश के आठ जिलों में कैग के करवाए सर्वेक्षण से पता चला है कि नदियों एवं नालों से अवैध रूप से खनिज संसाधनों का कारोबार 2006 से चला हुआ है। खनन अधिकारी बिलासपुर, शिमला व सोलन, लोनिवि मंडल बिलासपुर, सोलन व ठियोग के अधिशाषी अभियंताओं ने ने ठेकेदारों को फार्म एम दिए बिना रेत, पत्थर व बजरी की सप्लाई करने की अनुमति दी है। 2006 से 2010 के दौरान आठ जिलों से 160472.51 मीट्रिक टन अवैध खनिज संसाधनों का कारोबार हुआ। इससे सरकार को रायल्टी में 8.02 करोड़ की हानि हुई। यही नहीं खनन माफिया के खिलाफ कार्रवाई न करने पर सरकार को 23.03 करोड़ की कंपाउंड फीस नसीब नहीं हो सकी। कैग रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 2006 से अब तक 10 हजार 379 मामले अवैध खनन के पकड़ गए, जिनसे 164.23 लाख रुपये का जुर्माना उद्योग एवं खनन विभाग ने वसूला। हालांकि सरकार ने अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए लोनिवि, आइपीएच, वन विभाग एवं खंड विकास अधिकारियों को जिम्मा सौंपा है, बिलासपुर, मंडी व सोलन जिलों में ऐसा नहीं हुआ।
7 अरब की घूस देकर लगाई 1.76 लाख करोड़ की चपत
सरकारी खजाने को एक लाख 76 हजार करोड़ का चूना लगाने वाले 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले के लिए केवल 700 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी। साढ़े तीन साल की जांच के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) इस निष्कर्ष पर पहुंची है। इसमें से एजेंसियां अभी तक भारत में दी गई 200 करोड़ रुपये की रिश्वत की पहचान कर उसे जब्त करने में सफल हो पाई हैं। जबकि विदेश में दी गई 500 करोड़ रुपये की रिश्वत की तलाश अब भी जारी है। स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में दी गई रिश्वत का विवरण पेश करते हुए जांच से जुड़े सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि स्पेक्ट्रम आवंटन में मनमाफिक गड़बडि़यों के लिए शाहिद बलवा की कंपनी डीबी रियलिटी ने 200 करोड़ रुपये की रिश्वत दी थी। यह तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि के परिवार की कंपनी कलैंगनार टीवी में असुरक्षित निवेश के रूप में दी गई थी। डीबी रियलिटी ने यह रकम करीम मोरानी के सिनेयुग के मार्फत दी थी। सारे सबूत मिलने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने यह रकम जब्त कर ली है। इसके साथ ही 2जी स्पेक्ट्रम पाने वाली यूनिटेक ने भी 240 करोड़ रुपये की रिश्वत दी थी। यह रिश्वत मॉरीशस की कंपनी प्यूरिटी इमर्जिग में निवेश की रूप में यूनिटेक ओवरसीज लिमिटेड के मार्फत दी गई थी। अभी तक प्यूरिटी इमर्जिग के मालिक का पता नहीं चला है और इसका पता लगाने के लिए सीबीआइ संजय चंद्रा से नए सिरे से पूछताछ कर रही है। साथ-साथ मॉरिशस और आइल ऑफ मैन को लेटर रेगोटरी भी भेज दिया है। सीबीआइ के अनुसार, स्वान टेलीकॉम में रिलायंस टेलीकॉम के 9.1 फीसदी हिस्से को रिश्वत के रूप में मॉरीशस की कंपनी डेल्फी को बेचा गया था। माना जा रहा है कि स्वान को 2जी स्पेक्ट्रम का लाइसेंस मिलने के पहले उसके 9.1 फीसदी हिस्से का मूल्य भी लगभग 240 करोड़ रुपये ही होगा। जांच के दौरान पता चला कि डेल्फी खुद मावी इंवेस्टमेंट नाम की कंपनी की सहायिका है। मजेदार बात यह है कि मावी इंवेस्टमेंट के मालिक का भी अभी तक पता नहीं चल सका है। मॉरीशस गए सीबीआइ अधिकारियों को पता चला कि मावी इंवेस्टमेंट स्विटजरलैंड स्थित किसी कंपनी की सहायक कंपनी है। सीबीआइ ने स्विटजरलैंड को एलआर भेजकर इस कंपनी के मालिकों की जानकारी मांगी है। सीबीआइ अधिकारी ने दावा किया है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की पूरी साजिश से पर्दा उठ चुका है। इसमें दी गई रिश्वत की रकम की पहचान भी कर ली गई है। विदेशों में लगभग 500 करोड़ रुपये की रिश्वत लेने वालों तक पहुंचना जांच अधिकारियों के लिए असली चुनौती होगी।
Tuesday, April 3, 2012
बंदरबांट के लिए मुर्दो का भी कल्याण
सरकार की कल्याणकारी योजनाओं में कैसे बजट ठिकाने लगाया जाता है, यह देखना हो तो हरिद्वार जिले के बहादरपुर खादर गांव चले आइए। संपूर्ण स्वच्छता अभियान के बजट से स्वजल महकमे के कारिंदों ने पात्रता के मानकों को धता बताते हुए अपनों का जमकर कल्याण किया। सरकारी धन का बंदरबांट करने के लिए मुर्दो तक को नहीं छोड़ा। इस कारस्तानी में कई तो दोहरा लाभ भी पा गए। ऐसे भी लोगों के नाम सूची में हैं, जो गांव में रहते ही नहीं। सूचना अधिकार अर्जी के जवाब से योजनाओं का सच सामने आ गया। बहादरपुर खादर निवासी कुलदीप सिंह ने स्वजल परियोजना विभाग से 2011-12 में संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत गांव में बने शौचालयों के संबंध में सूचना मांगी थी। उपलब्ध कराई गई सूचना के मुताबिक, एक फरवरी 2011 से 23 फरवरी 2012 तक 21 बीपीएल लाभार्थियों को 2700 रुपये और 126 लाभार्थियों को 3200 रुपये के हिसाब से शौचालय निर्माण के लिये प्रदान किए गए। लाभार्थियों की सूची में डेढ़ दर्जन ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो 2003-04 में भी इस योजना का लाभ ले चुके हैं। मुखराम नामक एक व्यक्ति को लाभार्थी दर्शाया गया है, जबकि इस नाम का कोई व्यक्ति गांव में है ही नहीं। एक दर्जन ऐसे नाम हैं, जो बीपीएल श्रेणी के हैं ही नहीं। उन्हें 2700 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से योजना की राशि देना दर्शाया गया है। एक लाभार्थी तो पिछले दो दशकों से गांव में रहता ही नहीं है। रेलवे विभाग से पेंशन प्राप्त कर रहे आठ लोगों के नाम भी सूची में शामिल हैं। इतना ही नहीं, दुनिया से विदा हो चुके तीन लोगों के नाम भी योजना के लाभार्थियों में है। स्वजल परियोजना के प्रबंधक एएच खान ने कहा कि मामला संज्ञान में नहीं है। यदि ऐसा है तो यह गंभीर मामला है। पूरे मामले की जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
विपक्ष की गैरमौजूदगी में विस में पेश की कैग रिपोर्ट
बजट सत्र के आखिरी दिन कांग्रेस की गैरमौजूदगी का फायदा उठा राज्य की नरेंद्र मोदी सरकार ने कैग (महालेखा नियंत्रक) , मानवाधिकार एवं जहरीली शराब कांड की रिपोर्ट पेश कर दी। इससे सरकार फिलवक्त इन मुद्दों पर सदन में चर्चा से तो बच गई, लेकिन हजारों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई है। कैग रिपोर्ट में अकेले जीएसपीसी को पांच हजार करोड़ की चपत लगने का अनुमान व्यक्त किया गया है। कांग्रेस महज एक साल में 16 हजार 707 करोड़ रुपयों के भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है। नेता विपक्ष शक्तिसिंह गोहिल ने कैग रिपोर्ट में हुए खुलासे को गुजरात का अब तक के सबसे बड़े भ्रष्टाचार बताया है। उन्होंने कहा कि इसी के चलते इस पर सरकार बहस से बचती रही। बजट सत्र के आखिरी दिन कैग की रिपोर्ट को पेश किया गया ताकि विपक्ष इन मुद्दों पर चर्चा नहीं कर सके। कांग्रेस ने जीएसपीसी को भ्रष्टाचार को प्लेटफॉर्म कहा है। गोहिल का आरोप है कि जीएसपीसी ने जेवी पार्टनर तथा जियो ग्लोबल रिसार्स इंक कनाड़ा के साथ बिना विशेषज्ञों व तकनीकी राय तथा केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना तेल व गैस निकालने का काम शुरू किया जिससे वर्ष 2007-11 के बीच करीब 104 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। इसके अलावा वर्ष 2006-09 के बीच जीएसपीसी ने महंगे दाम पर गैस की खरीद कर अदाणी समूह को सस्ते दाम पर गैस उपलब्ध कराई जिससे सरकारी तिजारी को 70.54 करोड़ रुपयों का नुकसान उठाना पड़ा। जीएसपीसी में हुई वित्तीय गड़बडि़यों को लेकर उठ रहे सवालों पर गुजरात सरकार के प्रवक्ता जयनारायण व्यास का कहना है कि यह कैग का आकलन है, सरकार इस मुद्दे को पब्लिक अकाउंट कमेटी के समक्ष लेकर जाएगी। पीएससी का अध्यक्ष कांग्रेस का है, विपक्ष को वहां अपने इन तथ्यों को रखना चाहिए। जबकि अदाणी को सस्ते दाम पर दी गई गैस के संबंध में व्यास ने साफ किया कि तेल व गैस की खरीद व्यापारिक एवं घरेलू इकाईयों से की जाती है। खुले बाजार में गैस खरीद व बिक्री के लिए सरकारों को एक पैकेज देना होता है। इसके चलते सरकार को एक औसत भाव रखना पड़ता है। पैकेज में कई बार खरीद मूल्य से कम दाम पर भी गैस का वितरण करना पड़ता है। गुजरात में सरकारी विभागों के बेहताशा तथा अनियमित खर्च के चलते खुद राज्य सरकार बचाव की मुद्रा में है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड तकनीकी तथाा वित्तीय आंकलन के बिना वर्ष 2006 से 2011 के बीच केजी बेसिन में तेल व गैस निकालने पर 19 हजार 245 करोड़ से अधिक की राशि खर्च की, जबकि कंपनी को इसके सामने 15 सौ 63 करोड़ रुपये के ही तेल व गैस का उत्पादन हो सका। सरकार को इसके ड्रिलिंग खर्च में भारी हर्जाना उठाना पड़ा है। केजी बेसिन में 102.23 मिलियन यूएस डॉलर के बजाए इस योजना पर एक हजार 302 मिलियन यूएस डॉलर अर्थात 5920 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े जो वास्तविक खर्च का दस गुना है।
