2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, खनन, हाउसिंग सोसाइटी के बाद अब सड़क घोटाले का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है। लेकिन इस घोटाले को उजागर करने का श्रेय किसी जनहित याचिका अथवा सीएजी की रिपोर्ट को न जाकर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट मिलता है। विश्व बैंक की इंस्टीट्यूशन यूनिट की रिपोर्ट के मुताबिक ठेकेदारों ने नेशनल हाइवे एथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआइ) के अधिकारियों और सलाहकारों को प्रभावित करने के लिए 1.15 करोड़ रुपये की रिश्वत दी। सिर्फ 9.88 लाख रुपये तो अधिकारियों को उपहार देने और होटलों की बुकिंग के लिए खर्च किए गए। ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर के तहत लखनऊ से मुजफ्फरपुर के बीच बन रहे राजमार्ग, जीटी रोड सुधार परियोजना और राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के तीसरे चरण में बड़े पैमाने पर गड़बडि़यां पाई गईं। विश्व बैंक की रिपोर्ट जारी होने के बाद सरकार ने मामले की जांच कराने का फैसला लिया। राजमागरें के निर्माण में गड़बडि़यां लंबे समय से सुनाई दे रही हैं। तब सरकार ने किसी प्रकार की जांच क्यों नहीं कराई। करीब दशक भर पहले एक ईमानदार इंजीनियर सत्येंद्र दुबे ने एनएचएआइ में भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक पत्र लिख था, जिसके बाद उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। देखा जाए तो सड़कें किसी भी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा और बुनियाद होती हैं। अमेरिका व यूरोपीय देशों के तीव्र विकास में तीव्रगामी राजमागरें की उल्लेखनीय भूमिका रही है। भारत में भी जिन राज्यों में सड़कों का व्यवस्थित नेटवर्क है, वे विकास की दौड़ में आगे हैं जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु। दूसरी ओर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा के आर्थिक पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह सड़कों की दयनीय स्थिति भी है। दरअसल, तीव्रगामी राजमार्ग उत्पादकों व उपभोक्ताओं के बीच, खेतों, कारखानों व बाजारों के बीच और लोगों व अवसरों के बीच संपर्क मुहैया कराते हैं। उद्योग संगठन एसोचैम की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि खराब सड़कों से देश की अर्थव्यवस्था को हर साल 30,000 करोड़ रुपये की चपत लगती है। राजग सरकार ने 1998 में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (एनएचडीपी) शुरू की, जिसे राजमागरें के सुधार, विस्तार आदि का काम सौंपा गया था। उस दौरान एक ऐसा समय था जब रोजाना 11 किलोमीटर सड़कों का निर्माण होने लगा था, लेकिन जैसे ही संप्रग सरकार आई एनएचडीपी पर मानो ब्रेक लग गया। 11 किलोमीटर की रफ्तार घटकर महज दो किलोमीटर पर आ गई। बाद में कमलनाथ ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री का पद संभालते ही जोर-शोर से घोषणा की थी कि अगले पांच वषरें में 35,000 किमी राजमागरें का निर्माण किया जाएगा अर्थात रोजाना 20 किलोमीटर। लेकिन भूमि अधिग्रहण संबंधी कठिनाइयों तथा धन की कमी के चलते निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं हो सका। अब मंत्रालय प्रतिदिन 20 किलोमीटर के लक्ष्ये को 2014 तक हासिल करने की बात कर रहा है। भले ही एनएचएआइ ने भारी-भरकम लक्ष्य निर्धारित किया हो, लेकिन संगठनात्मक कमजोरियों के चलते उसे हासिल करना कठिन होगा। गौरतलब है कि एनएचएआइ में पिछले डेढ़ साल से कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है। इसे हर साल पेट्रोलियम पर सेस के जरिए करीब पांच हजार करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। इसके बावजूद महत्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर पूरा नहीं हो पाया है। सड़क परिवहन मंत्रालय में नीतियों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। फिर सलाहकारों, इंजीनियरों और ठेकेदारों के भ्रष्ट गठजोड़ के कारण सड़कों की गुणवत्ता गिरती जा रही है और वे दो-तीन साल में ही गड्ढ़ों में तब्दील होती जा रही हैं। दूसरी ओर टोल टैक्स से होने वाली वसूली की दरों में लगातार इजाफा होता जा रहा है। इसमें भी एक बड़ा घोटाला छिपा हुआ है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) राजमार्ग निर्माण में धांधलियों पर रमेश दुबे की टिप्पणी
Monday, April 16, 2012
और अब सड़क घोटाला
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