Saturday, December 18, 2010

निजी स्वार्थो की पूर्ति

केंद्र हो या राज्य हर जगह भ्रष्ट मंत्रियों और सचिवों का गिरोह अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति में लगा है। टू जी स्पेक्ट्रम का घोटाला हो या आदर्श सोसायटी अथवा नोएडा भूमि आवंटन का घपला सभी जगहों पर इस तरह का गठबंधन गैरकानूनी काम करता है। भ्रष्ट अधिकारी गैरकानूनी ढंग से धन कमाने और राजनेताओं को पहुंचाकर बड़े पद प्राप्त कर लेते हैं। ईमानदार अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों से दूर रखा जाता है। यही कारण है कि दिल्ली में दागी अधिकारी पीजे थॉमस को केद्रीय सतर्कता आयोग का मुख्य आयुक्त बनाया गया और दिल्ली पुलिस कमिश्नर के पद पर वरिष्ठता के बावजूद किरण बेदी की नियुक्ति नहीं की गई। उत्तर प्रदेश में भी मुख्य सचिव के पद पर अखंड प्रताप सिंह और नीरा यादव जैसे अधिकारियों का चयन किया गया जिन्हें आईएएस अफसरों के एक गुप्त जनमत संग्रह में सबसे अधिक भ्रष्ट बताया गया था। भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद दोनों लगातार तरक्की पाते रहे हैं और प्रदेश के सभी मुख्यमंत्रियों के चहेते बने रहे। इसलिए सवाल सिर्फ एक या दो अधिकारियों के सजा मिलने या इस्तीफा देने का नहीं है। इसे ऐसे भ्रष्टाचार के रूप में देखा जाना चाहिए जिसने लोककल्याणकारी योजनाओं का भट्ठा बैठा दिया है। सरकार चाहे यूपीए की हो या एनडीए अथवा तीसरे मोर्चे की, सबमें भ्रष्ट मंत्रियों और सचिवों का गठबंधन अपना काम करता रहा है। यह कम चौंकाने वाली बात नहीं है कि केंद्र सरकार के पास 319 दागी अफसरों और कुछ नेताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने की सूची लंबित पड़ी है। सुप्रीम कोर्ट के एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया है कि मुकदमा चलाने की मंजूरी के कुल 126 मामले लंबित हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग वर्षो से इन भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति मांग रहा है, लेकिन सरकार मामला लटकाए हुए है। इसके अलावा अब तो संयुक्त सचिव से ऊपर के अधिकारियों की जांच-पड़ताल के लिए भी आयोग और सीबीआइ को केंद्र से अनुमति लेनी पड़ती है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी तीन दर्जन आला अफसरों के खिलाफ मुकदमें के इंतजार में है चूंकि भ्रष्ट अधिकारियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देने में सरकारें हीला हवाली करती हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई तभी होती है जब अदालत आदेश देती है अथवा वे अवकाश प्राप्त कर चुके होते हैं। आदर्श सोसायटी का घोटाला हो या उत्तर प्रदेश के नोएडा, कर्नाटक और उत्तराखंड का भूमि घोटाला हो, हर जगह ऐसे घोटाले राजनीतिक संरक्षण के बिना नहीं हो सकते। जमीन का आवंटन एक ऐसी लाटरी है जो रातोंरात किसी को मालामाल कर सकती है। इसलिए जमीन के साथ सबसे ज्यादा घोटाले जुड़े होते हैं। वास्वत में अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ यदि प्रशासनिक सुधार नहीं हो तो भष्ट राजनेता, अफसर, उद्योगपति सांठगाठ करके गैर वाजिब फायदा उठाते रहेंगे और कानून की राह पर चलने वाले लोग इनसे पिछड़ते रहेंगे। नीरा राडि़या के टेलीफोन संवाद के टेप इन दिनों चर्चा में है और वे भी यही बताती हैं कि अगर प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही न हो तो किस तरह के गिरोह सरकारी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। यह मामला हमें एक बार फिर बताता है कि आला अफसरों को जो वैधानिक सुरक्षा मिली हुई है उसे कम करने की जरूरत है ताकि वे भी जवाबदेह हों। हमारे यहां भ्रष्टाचार की चर्चा तो बहुत होती है लेकिन उसे मिटाने की कोशिशें शायद ही कार्रवाई तक पहुंच पाती हैं। देश के बड़े-बड़े महानगरों में हमारे नौकरशाहों, माफिया और राजनेताओं की बनी बड़ी-बड़ी कोठियां और तमाम नामी-बेनामी संपत्तियां किस बात का प्रमाण हैं। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कानून इन लोगों के लिए नहीं है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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