भ्रष्टाचार, घोटालों और आवश्यक वस्तुओं की महंगाई की तोहमतों में फंसी संप्रग सरकार के मंत्रालय अपना सामान्य कामकाज तक नहीं कर पा रहे हैं। खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े मंत्रालयों की हालत बेहद खराब है। कामकाज में तेजी लाने के लिए प्रधानमंत्री को आगे आना पड़ा है। वैसे तो आम बजट का महीना नजदीक आते-आते तमाम मंत्रालय अतिरिक्त रूप से सक्रिय हो जाते हैं। मगर इस बार यह तेजी दिखाई नहीं दे रही है। इससे चिंतित प्रधानमंत्री ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष के साथ इन मंत्रालयों के उच्चाधिकारियों की बैठक बुलाई है। इन मंत्रालयों में सड़क, बिजली, पेट्रोलियम, कोयला, दूरसंचार, सिविल एविएशन और रेल शामिल हैं। प्रधानमंत्री योजना आयोग के अध्यक्ष हैं और हर साल बजट से पहले आम तौर पर इस तरह की कवायद होती है। इस बार मामला थोड़ा अलग है। घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच कई मंत्रालयों में काम ही नहीं हुआ है। 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ व मुंबई आदर्श सोसायटी में भ्रष्टाचार के मामलों पर जेपीसी की विपक्ष की मांग पर हंगामे और गतिरोध के बीच सरकार को अपने कई अहम मंत्रालयों के कामकाज पर ध्यान देने का मौका ही नहीं मिला। सरकार की आधी ऊर्जा विश्व के पांच ताकतवर देशों के प्रमुखों के स्वागत और खुद प्रधानमंत्री के विदेश दौरों में खप गई। बाकी बचा समय प्याज-टमाटर की महंगाई से निपटने और 2जी व कॉमनवेल्थ से संबंधित सीबीआइ के छापों पर विपक्ष को घेरने और द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस जैसे सहयोगी दलों की नाराजगी दूर करने में जाया हो रहा है। ऐसे में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से जुड़े मंत्रालय उपेक्षित से हो गए हैं। दूरसंचार मंत्रालय तो सीधे 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के केंद्र में ही है। इस घोटाले के चक्कर में इसके पूर्व मुखिया ए. राजा की बलि चढ़ चुकी है, जबकि नए मुखिया कपिल सिब्बल को अपने पुराने मंत्रालय को संभालने के साथ इस नए मंत्रालय का गणित समझने में जद्दोजहद करनी पड़ रही है। कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के फोन टेप ने दूरसंचार मंत्रालय समेत इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से जुड़े दूसरे मंत्रालयों और उनके नए-पुराने मंत्रियों को भी विवादों के घेरे में ला दिया है। इनमें सिविल एविएशन और सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय शामिल हैं। ऐसे में इन मंत्रालयों में बैठे लोग फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे हैं। जाहिर है कि इससे काम पर असर पड़ रहा है और गतिविधियां धीमी पड़ गई हैं। सिविल एविएशन मंत्रालय नवीं मुंबई हवाई अड्डे में ही उलझा हुआ है। एयर इंडिया के पुनरुद्धार और हवाई किरायों में मनमानी बढ़ोतरी जैसे जनता से जुड़े मसलों पर मंत्रालय का रवैया ढुलमुल है। किराया वृद्धि पर तो प्रतिस्पद्र्धा आयोग के साथ ही संसद की प्राक्कलन समिति तक ने मंत्रालय से कैफियत तलब कर ली है। सरकार के ढीले रुख के चलते एयरलाइनें अब भी बाज नहीं आ रही हैं और यात्रियों से अधिक किराए वसूल रही हैं। इस बीच एयर इंडिया का पुनरुद्धार भी लटक गया है। प्रबंधन में अंदरूनी लड़ाई के चलते सरकार ने इस पर फिलहाल रुको और देखो की नीति अपना रखी है। एयर इंडिया के स्वतंत्र निदेशकों ने प्रबंधन पर एयर इंडिया एक्सप्रेस के उच्चाधिकारियों की नियुक्ति में नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है, जिससे सरकार इस सरकारी एयरलाइन को और इक्विटी मदद देने को लेकर सोच में पड़ गई है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय का भी हाल ठीक नहीं है। पहले पुराने सचिव के जाने और नए के कार्यभार संभालने में कुछ वक्त जाया हुआ। नए सचिव को आते ही ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल की धमकी से बावस्ता होना पड़ा। ट्रांसपोर्टरों ने मल्टी एक्सल ट्रकों पर टोल दरों में कमी की घोषणा के बाद ही हड़ताल से तौबा की। इसके बाद मंत्री कमलनाथ राडिया के टेप की चपेट में आ गए, जिससे उनकी तेजी को भी ग्रहण सा लग गया है। वह पहले ही रोजाना 20 किलोमीटर सड़कें बनाने के हवाई मंसूबे के चलते योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया के निशाने पर थे। ऊपर से उन्होंने पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के साथ भी मोर्चा खोल लिया। इन सब पचड़ों के चलते उनका एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी बनाने और मेगा सड़क परियोजनाएं शुरू करने का मंसूबा मझधार में फंसता दिखाई दे रहा है। बिजली मंत्रालय की कहानी तो हास्यास्पद है। यह मंत्रालय पहले बड़े लक्ष्य बनाने और फिर उन्हें अधूरा छोड़ देने के लिए कुख्यात हो चुका है। यहां मंत्री और सचिव के बीच ही तालमेल नहीं है। जहां मंत्री जी कहते हैं कि 11वीं योजना में नई विद्युत क्षमता का लक्ष्य पा लिया जाएगा, वहीं सचिव महोदय उसे नकार रहे हैं। उनका साफ कहना है कि पनबिजली परियोजनाओं के पिछड़ने से लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है। इसके बावजूद बिजली मंत्रालय 12वीं योजना के लिए एक लाख मेगावाट से भी अधिक अतिरिक्त क्षमता का मंसूबा बांधने की तैयारी कर रहा है। इन सबसे अलग रेल मंत्रालय की हालत ममता बनर्जी की राजनीतिक ख्वाहिशों के कारण खराब है। ममता की नजर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है और उनके पास रेल मंत्रालय के लिए वक्त नहीं है। वह सिर्फ उतना काम कर रही हैं जो न्यूनतम आवश्यक है और जिससे पश्चिम बंगाल में उनका मकसद पूरा होता हो। वह रेलवे रूपी दुधारू गाय को अपने हित में दुहने में जुटी हैं। जबकि रेलवे की कमाई घटती जा रही है और खर्चे बढ़ते जा रहे हैं। ममता द्वारा घोषित तमाम रेल परियोजनाएं लक्ष्य से बुरी तरह पिछड़ चुकी हैं।
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