Monday, December 20, 2010

व्यवस्था को बदलना होगा

पाप का घड़ा लबालब भर गया और दुष्कर्मो का जहर हर घड़ी छलक रहा है, लेकिन पुरानी कहावत के अनुसार घड़ा फूट नहीं रहा है। ऐसा लगता है कि कुम्हार ने घड़ा बनाते समय मिट्टी में मिलावट कर दी है। किसी भी कल्पना से भी कई गुना भ्रष्टाचार खुलकर सामने आया, लेकिन एक मुख्यमंत्री पदच्युत हुआ, इसके अतिरिक्त भारत के राजनैतिक और प्रशासनिक ढांचे में कहीं कोई बिखराव नहीं है। पाप का इतना समर्थन जिस व्यवस्था में हो, उस व्यवस्था में ही कहीं न कहीं त्रुटि होगी। बोफोर्स तोप का प्रकरण वर्तमान के 2जी घोटाले से हजारों गुना कम है। उस समय बोफोर्स के प्रकरण पर राजनीतिक व प्रशासनिक प्रतिक्ति्रया कहीं अधिक बलशाली थी। 2जी, आदर्श अपार्टमेंट्स, राष्ट्रमंडल खेल और खाद्यान्न घोटाले का सामूहिक अंदाजा लिया जाए तो शायद विश्व के किसी भी घोटाले से कई गुना अधिक होगा। इन घोटालों में राडिया के प्रकरणों को भी मिला दिया जाए तो भारतीय समाज का जो चित्र उभरता है, वह बड़ा भयानक है। समाज के मुख्य अंगों पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। सर्वप्रथम वर्तमान की राजनीति केवल कठघरे में खड़ी नहीं है, लेकिन उसके पूरी तरह से पापी होने और पथ भ्रष्ट होने के स्पष्ट प्रमाण हैं। केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री हजारों करोड़ का चूना देश की जनता को लगाते हैं और राजनैतिक व्यवस्था उसे मुश्किल से अपने पद से हटा सकने में सफल होती है। प्रशासन के मुखिया द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह को अनदेखा करके फैसला लिया गया और प्रधानमंत्री सहित पूरा मंत्रिमंडल असहाय रहा। आज भी राजनीति के क्षेत्र में प्रधानमंत्री को दोषी मानने वाले बहुत कम हैं। मंत्रिमंडल के फैसलों के लिए सामूहिक दायित्व का सिद्धांत किसी को याद नहीं आ रहा है। राडिया केस से जाहिर होता है कि जिस राजा को इन दुष्कर्मो के लिए जिम्मेदार माना जा रहा हैं, उसे मंत्री बनवाने के लिए देश के तथाकथित शीर्ष पत्रकारों का हाथ रहा था। राडिया टेप केस के वार्तालाप से स्पष्ट जाहिर होता है कि एक महिला पत्रकार इसलिए राजा की पैरवी कर रही थीं, जिससे कि एक औद्योगिक समूह को लाभ पहुंचे। 2जी घोटाले से एक निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि राजनीति व्यापार हो गई है। आदर्श हाउसिंग सोसायटी कांड राजनेताओं और नौकरशाही ने मिलकर अंजाम दिया। शत्रु के साथ युद्ध में शहीद होने वाली सैनिकों की विधवाओं की निवास व्यवस्था करने की परियोजना में जिस प्रकार राजनेता और नौकरशाह घुस बैठे, यह तो भ्रष्ट लालची प्रवृत्तियों की परम सीमा है। वरिष्ठ सैनिक अधिकारी भी जाने-अनजाने इसके हिस्सा बन गए। सामाजिक कल्याण की अधिकतर परियोजनाओं का यही हाल है। जिन गरीब उपेक्षित और दीन-हिन वर्गो के लिए कल्याण योजनाएं बनती हैं, उन्हें तो इस कल्याण की हवा भी नहीं मिलती और लाभ समाज का प्रभावी वर्ग आपस में बांट लेता है। पीले कार्ड के आवंटन, सार्वजनिक खाद्य वितरण, नरेगा के लाभ कार्यो की सूचना व छात्रवृत्तियों का विद्यार्थियों में वितरण, यह सब भ्रष्ट व्यवस्था से ग्रसित है और ऐसा लगता है कि सामाजिक कल्याण के उपाय भी एक व्यापार बन चुके हैं, जिसमें राजनेता, अधिकारी और स्वयं सेवी संस्थान पूरी तरह पनप रहे हैं। राजनीति अपने पथ से हटकर व्यापार बन गई। प्रशासन का दर्शन व्यापार हो गया, खेलो का आयोजन व्यापार हो गया. सामाजिक कल्याण की योजनाओ का व्यापारीकरण हो गया और पत्रकारिता सेवा या व्यवसाय ना होकर कारोबार बन गयी. मानव समाज के सभी व्यवस्थाओं को व्यापार के वायरस ने डस लिया. लेकिन किसी भी व्यापार  की कुछ सीमाएं और मर्यादाएं होती है. आधारभूत ईमानदारी और सामाजिक दायित्व का बोध किसी भी व्यवसाय की अनिवार्यताएं होती है. इनमे से किसी का उल्लंघन होता है तो भ्रष्टाचार स्थापित होता है. वर्त्तमान भारत में ऐसा लगता है की लगभग सभी मुख्य व्यवस्थाओं का ना केवल व्यापारीकरण हुआ है, बल्कि उस व्यापार को भी विकृत कर समाज के साथ धोखा व राष्ट्र के साथ द्रोह की स्थितियां है और देश का शीर्ष नेतृत्व मौन है. न्याय संगत जांच का विरोधी है, लेकिन इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज का पतन एक सीमा से अधिक हुआ है तो क्रांति का सूत्रपात हुआ है. और परिवर्तन के लिए समाज  से ही नेतृत्व उभरकर आया है. पाप का घड़ा केवल भरा ही नही है, छलक भी गया है. बस, फूटने का इंतज़ार है. (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति हैं)



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