Monday, December 20, 2010

विश्वसनीयता का सवाल

आज से करीब 23 साल पहले 1987 में बोफोर्स घोटाले की बात सामने आई थी। उस वक्त प्रधानमंत्री राजीव गांधी खुद आरोपों के घेरे में थे। तब यह अनुमान लगाया गया था कि यह घोटाला तकरीबन 65 करोड़ रुपये का है। इस मामले के सामने आने के तकरीबन दो साल बाद चुनाव हुए और राजीव गांधी की सरकार चली गई। यह एक अलग कहानी है कि भ्रष्टाचार के नाम पर चुनकर जो नई सरकार आई, उसने भी भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए कोई खास काम नहीं किया और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत होती गई। अभी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का मामला जोरों पर है। खुद सरकारी एजेंसी कैग ने अनुमान लगाया है कि स्पेक्ट्रम को सस्ती दर पर बेच देने से भारत सरकार को पौने दो लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस 1.76 लाख करोड़ रुपये के घोटाले के खिलाफ आम जनता में उस तरह का गुस्सा नहीं दिख रहा, जितना राजीव गांधी के समय में 65 करोड़ रुपये के घोटाले के वक्त दिखा था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? भारत में भ्रष्टाचार की यात्रा पर निगाह डालने और बीते कुछ साल की घटनाओं से इसे जोड़कर देखने पर यह मालूम पड़ता है कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई भी ऐसा पक्ष नहीं रहा, जिस पर लोग आंख मूंदकर भरोसा कर सकें और कह सकें कि यहां तो भ्रष्टाचार नहीं है। कुछ साल पहले तक लोगों को न्यायपालिका और सेना पर एक हद तक भरोसा था, लेकिन अब ये दोनों भी लोगों का भरोसा खो चुके हैं। सेना के भ्रष्ट होने की खबरें अपेक्षाकृत कम आती हैं, क्योंकि नीतियों का निर्धारण करने वाले और सही मायने में भ्रष्टाचार की मलाई खाने वालों को यह लगता है कि अगर सेना के भ्रष्टाचार से संबंधित खबरें सामने आएंगी तो इससे जवानों के मनोबल पर असर पड़ेगा। हालांकि मुंबई के जिस आदर्श सोसाइटी घोटाले की बलि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण चढ़ गए, उसमें सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों के संलिप्त होने की बात आई। सेनाध्यक्ष को कहना पड़ा कि इस खबर से भारतीय सेना मनोबल के मामले में थोड़ा कम पड़ गई है। बताते चलें कि आदर्श सोसाइटी मामले में सस्ती जमीन दी गई और मोटे तौर पर जिस नेता और जिस अधिकारी के पास से फाइल गुजरी, उसे इस सोसाइटी में एक फ्लैट मिल गया और वह भी बाजार भाव से काफी कम पर। नेताओं की तो बात करना भी ठीक नहीं या यों कहें कि उन्हें नेता कहने का कोई मतलब नहीं है, जो राजनीति को देश को लूटने और अपनी झोली भरने का जरिया बना लेते हैं। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री के पद से हटाए गए ए राजा को क्या नेता कहा जाना चाहिए? आखिर एक ऐसे आदमी को, जो बेशर्मी के साथ पौने दो लाख करोड़ रुपये के स्पेक्ट्रम को 10,000 करोड़ रुपये में बेच दे, क्या नेताओं की श्रेणी में रखा जाना चाहिए? पर ऐसे में अहम सवाल यह भी उठता है कि राजा जैसी छोटी मछली की बली चढ़ाकर क्या बड़ी मछलियों को छोड़ा तो नहीं जा रहा है? इस घोटाले को विस्तार से देखने समझने वाले लोगों की मानें तो इस घोटाले में कुल 60,000 करोड़ रुपये बतौर घूस दिए गए। कहा जा रहा है कि ये पैसे दिल्ली से चेन्नई तक में बंटा और राजा को तो इसका पांचवां हिस्सा ही मिल पाया। इस पूरी रकम में से सबसे अधिक पैसा खाने वाले लोग तो अभी भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने का काम कर रहा है। संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी जांच को लेकर सरकार का भय इस बात की पुष्टि करता है कि कहीं न कहीं कुछ बड़े नाम इस घोटाले में शामिल हैं। सरकार को इस बात का भी भय है कि अगर ये नाम सामने आएंगे तो सरकार तो जाएगी ही, भारतीय राजनीति में ब्रांड के जरिए होने वाली राजनीति भी खत्म हो जाएगी। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को आसान शब्दों में समझना बेहद जरूरी है। लोगों तक मोबाइल सेवा पहुंचाने के लिए हर कंपनी को स्पेक्ट्रम आवंटित किया जाता है और इसी के जरिए आपके मोबाइल को वायुतरंगों से जोड़ा जाता है और आप बात कर पाते हैं। यह स्पेक्ट्रम सरकारी संपत्ति है और इसके जरिए मोबाइल कंपनियां पैसे कमाती हैं, इसलिए सरकार इस स्पेक्ट्रम को ज्यादा से ज्यादा पैसे पर बेचना चाहती है। 2008 से पहले यह होता था कि जो ज्यादा पैसा दे, उसे स्पेक्ट्रम मिलेगा। पर राजा ने घोटाले के लिए खेल के नियम बदल दिए। राजा ने पहले आओ और पहले पाओ के आधार पर पौने दो लाख करोड़ रुपये की संपत्ति दस हजार करोड़ रुपये में बेच दिए। कंपनियों की पात्रता के नियम बदल दिए गए और कई नई और अनजान कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिए गए। बहरहाल, इस घोटाले ने भरोसे का संकट पैदा कर दिया है, क्योंकि अब तक जिस मीडिया के एक-एक हर्फ को लोग सत्य मानते थे, उसी मीडिया के लोग भी इस घोटाले में शामिल दिख रहे हैं। अपनी पत्रकारिता के बूते नाम कमाने वाले लोगों के नीरा राडिया के साथ जो टेप जारी हुए हैं, उसमें वे भ्रष्टाचार को अंजाम देने में माध्यम बनते दिख रहे हैं। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की विश्वसनीयता का खत्म होना एक बहुत बड़ा नुकसान है और इसके नतीजे तो भुगतने होंगे। इससे पहले राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार का मामला चल रहा था। तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये खर्च करके हुए इस आयोजन में कुछ गिरफ्तारी तो हुई है, लेकिन सुरेश कलामड़ी से कोई पूछताछ तक नहीं कर रहा। गृह मंत्रालय ने संबंधित विभागों को इस शिकायत की जांच के लिए कहा है कि कहीं आयोजन समिति ने दस्तावेज जलाए तो नहीं हैं। अंदरखाने की खबर यह है कि जिस दिन खेल खत्म हुए, उसके अगले दिन बड़ी मात्रा में आयोजन से संबंधित दस्तावेज जलाए गए। हालांकि आधिकारिक तौर पर अब तक इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। बताया जा रहा है कि खेलों के नाम पर भी तकरीबन 35,000 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आरोपों के केंद्र में रहने वाले सुरेश कलामड़ी का कुछ होगा? न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात भी नई नहीं है। नया यह है कि खुद उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बारे में टिप्पणी की है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कुछ गड़बड़ है और वहां कुछ सड़ रहा है, जिसकी साफ-सफाई की जरूरत है। बताया जा रहा है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में फैसलों को प्रभावित करने का काम काफी जोर-शोर से चल रहा है और वहां के जजों के भाई-भतीजे वकालत के पेशे में हैं। इसी का फायदा उठाकर वहां के फैसले तय किए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी से देश के न्यायालयों में भ्रष्टाचार कम होगा या कम से कम इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ही स्थिति सुधरेगी? लोकतंत्र के चार स्तंभ है- न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया। पर इसमें से भी कोई स्तंभ ऐसा नहीं है, जिसे भ्रष्टाचार ने नहीं जकड़ रखा हो। ऐसे में संकट लोगों के भरोसे का है और खतरा इस बात का है कि इन चार स्तंभों से भरोसा उठने का सीधा मतलब है लोकतंत्र से भरोसा उठना। अहम सवाल यह है कि ऐसी हालत में स्थिति क्या होगी और समाज या यों कहें कि पूरा देश किस दिशा में जाएगा!

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