कभी कॉमनवेल्थ घोटाला तो कभी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला और अब उत्तर प्रदेश में खाद्यान्न घोटाला। अगर यूपीए सरकार खुद 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से नहीं घिरी होती तो आज उत्तर प्रदेश में हुए इतने बड़े खाद्यान्न घोटाले पर उसके तेवर कुछ और ही होते। कांच के घर में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते, कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों देश की यूपीए सरकार का हो गया है। उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट ने एक तरफ खाद्यान घोटाले की सीबीआइ जांच के लिए आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन अब देखना यह है कि इस मामले में असली कसूरवार को सजा मिलती है या फिर बाकी घोटालों की तरह इस मामले की जांच भी ठंडे बस्ते में धूल खाती रहेगी। खाद्य सुरक्षा का सवाल महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक और उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र सरकार तक, देश में होने वाले तमाम घोटालों में नौकरशाह, नेताओं और कारोबारियों के बीच का गठजोड़ अपनी तिजोरिया भरने में लगा है और आम जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है। एक तरफ यूपीए सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाने की बात कर रही है और दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में इतना बड़ा खाद्यान्न घोटाला हो जाता है। इस पूरे मामले ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि गरीबों को बांटने के लिए दिया गया अनाज बांग्लादेश और नेपाल के खुले बाजार में बेचा जाता रहा और यह सिलसिला एक दो साल नहीं, पूरे सात साल तक चलता रहा, लेकिन उत्तर प्रदेश में चाहे मुलायम की सरकार रही हो या फिर मायावती की मौजूदा सरकार, किसी ने भी इस घोटाले को लेकर दोषियों को सलाखों के पीछे नहीं पहुंचाया। इस मामले में कई बार एफआइआर दर्ज हुई, लेकिन फिर भी उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार अपने मुंह पर ताला डाले रही। इस पूरे मामले में याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि लंबे समय से इस मामले को दबाने की कोशिश की जा रही थी। चतुर्वेदी का मानना है कि यह घोटाला 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन और कॉमनवेल्थ घोटालों से भी बड़ा है। इस पूरे घोटाले के सामने आने के बाद एक बार फिर देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर सवालिया निशान लग गया है। एक तरफ यूपीए सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाकर तकरीबन सात करोड़ गरीबों को हर माह 35 किलो अनाज तीन रुपये प्रति किलो की दर से देने की बात कर रही है तो दूसरी तरफ मौजूदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली अब भी पूरी तरह दुरुस्त नहीं हो सकी है। कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त सतर्कता समिति ने भी देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भ्रष्टाचार से भरपूर करार दिया था। समिति के मुताबिक भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, अफसरशाही, राशन दुकानदारों और दलालों के बीच गठजोड़ की वजह से सार्वजनिक वितरण प्रणाली अपने मकसद में कामयाब नहीं हो रही है। वितरण प्रणाली में खामी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश डीपी वधवा ने शीर्ष अदालत को सौंपी अपनी रिपोर्ट में जिक्र किया था कि केंद्र सरकार सावर्जनिक वितरण प्रणाली पर सालाना 28 हजार करोड़ रुपये खर्च करती है, लेकिन यह पैसा भ्रष्ट लोगों की जेब में चला जाता है। समिति का साफ कहना था कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में हर स्तर पर भ्रष्टाचार है और जब तक इसे दूर नहीं किया जाएगा, तब तक जरूरतमंदों को इसका कोई फायदा नहीं होगा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आप गरीबों के लिए कागज पर योजनाएं बनाते रहिए, लेकिन घोटालेबाजों की मिलीभगत की चलते दो जून की रोटी के लिए तरसते आम आदमी को उसका फायदा कैसे मिलेगा? उत्तर प्रदेश में हुए इस खाद्यान्न घोटाले पर केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का कहना है कि केंद्र सरकार का काम राज्यों को खाद्यान्न उपलब्ध कराना है और यह राज्यों का जिम्मा है कि वह इसे जनता तक पहुंचाए। खाद्यान्न लोगों तक पहुंचाना राज्यों की जिम्मेदारी है, लेकिन केंद्र सरकार इस योजना पर हर साल भारी भरकम राशि सब्सिडी के तौर पर खर्च कर रही है तो यह उसकी भी जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों को दूर करे ताकि किसी भी राज्य में इस तरह की गड़बडि़यों पर रोक लगाई जा सके। आज जरूरत इस बात की है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की लूट के लिए नेता, नौकरशाही, राशन दुकानदार और दलालों के बीच की साठगांठ को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। मायावती की जवाबदेही अभी कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति ने गरीबी और भुखमरी से तंग आकर अपनी तीन बेटियों को मौत के घाट उतार दिया था। पिछले साल प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक गांव में एक दलित परिवार के आठ सदस्यों ने जहर खाकर आत्महत्या की कोशिश की। दलितों और गरीबों की बात करने वाली मायावती अपने राज में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त क्यों नहीं कर सकीं? प्रदेश में गरीबों के निवालों को लेकर इतना बड़ा घोटाला हो जाता है, लेकिन मायावती सरकार की तरफ से इसको लेकर अब तक कोई कदम क्यों नहीं उठाए गए? वैसे बात किसी एक राज्य की नहीं है, आज देश के किसी भी राज्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लेकर तमाम तरह की शिकायतों का अंबार है। गोदामों में अनाज सड़ जाता है, लेकिन गरीबों को दो जून की रोटी नसीब नहीं है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में भूख एवं कुपोषण से पीडि़त लोगों की सबसे ज्यादा तादाद भारत में है और यह हाल उस वक्त है, जब केंद्र सरकार 28 हजार करोड़ की सालाना सब्सिडी केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर दे रही है। अनाज की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद महिलाएं और बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश में खाद्यान्न घोटाले पर हाईकोर्ट की यह टिप्पणी गौर करने लायक है कि उत्तर प्रदेश में जो भी हो रहा है, उसे चुपचाप सहन नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट का कहना है कि जब भ्रष्टाचार देश के विकास पर चोट कर रहा हो तो न्यायपालिका मूक दर्शक नहीं बन सकती। चाहे देश में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो या फिर सीवीसी की नियुक्ति, अदालत सरकार को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराने में जुटी हैं। यूपीए सरकार की प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा योजना या फिर मौजूदा नरेगा जैसी योजनाएं तभी कारगर होंगी, जब ऐसी योजनाओं का फायदा उठाकर अपनी जेब भरने वालों को सरकार कड़ी से कड़ी सजा दे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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