Thursday, December 23, 2010

जवाबदेही न तय करने का नतीजा है ये दुर्दशा

जबावदेही सुनिश्चित करने से लोगों का व्यवस्था में भरोसा मजबूत होगा और अधिकारियों में भी डर पैदा होगा। ज्यादातर कामों में प्रबंधकीय कौशल का भी अभाव दिखता है। अगर प्रबंधकीय जगहों पर सही और ईमानदार लोग तैनात किये जायें तो बेहतर नतीजे मिल सकते हैं।
आज हर ओर भ्रष्टाचार दिखता है। शासन व्यवस्था का कोई भी महकमा हो, दावे से नहीं कहा जा सकता है, कि वहां भ्रष्टाचार नहीं है। अब तो ऐसे में मामले सामने आ रहे हैं जिससे सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। एक लोकतांत्रिक देश के किसी भी सभ्य और जागरूक नागरिक के लिए यह सब तकलीफ बढ़ाने वाला है, और मुझे भी तकलीफ होती है। लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जवाबदेही अपनी जनता के लिए होती है लेकिन मौजूदा समय में लगने लगा है कि सरकारों को आम लोगों से कोई लेना-देना नहीं है। महंगाई लगातार बढ़ रही है, उस पर काबू पाने के लिए सरकारी पहल नहीं हो रही है, लेकिन सरकारी योजनाओं का पैसा लूटा जा रहा है। दरअसल, आम लोगों की समस्याओं और उनके निदान को लेकर सरकारों में संवेदनहीनता नजर आने लगी है। ऐसा नहीं है कि देश में आम लोगों के लिए कोई खास योजना नहीं है, तमाम अच्छी योजनाएं मौजूद हैं, जिसको सही ढंग से लागू करने पर हर नागरिक के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है लेकिन मुश्किल यह है कि कोई भी योजना इस देश में ढंग से लागू ही नहीं हो पाती। हमारे यहां कानून बनाने को लेकर थोड़ी बहुत संवेदनशीलता तो है लेकिन कानून बन जाने के बाद उसको लागू भी सही ढंग किया जाये, इसको लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। योजनाएं ढंग से लागू नहीं हो पाने की एक बड़ी वजह यह भी है कि आम लोगों में जागरूकता का अभाव है। यही वजह है कि भ्रष्टाचार के मामले में हम दुनिया के कई देशों से गए गुजरे हैं। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशल की रिपोर्ट के मुताबिक हमारे यहां बीते एक साल में भ्रष्टाचार इतना बढ़ा है कि हम 84वें नंबर से खिसककर 87वें नंबर पर आ गए। संयुक्त राष्ट्र की ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की रिपोर्ट बताती है कि कुपोषण के मामले में भारत कई दक्षिण अफ्रीकी देशों और बांग्लादेश जैसे छोटे-छोटे देशों से भी बदतर स्थिति में है। स्वास्थ्य का क्षेत्र हो या कोई अन्य क्षेत्र, हर जगह भ्रष्टाचार की जड़ें लगातार मजबूत होती जा रही हैं। किसी भी योजना का पूरा पैसा लोगों तक नहीं पहुंच रहा है। पारदर्शी शासन व्यवस्था के जरिए इस पर अंकुश लगाया जा सकता है लेकिन पारदर्शिता के नाम पर भी महज खानापूर्ति की जा रही है। सूचना का अधिकार कानून लागू तो हो गया है लेकिन इसके जरिए भी सूचना हासिल करने के लिए लोगों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, यह देखना भी दुखद है। हालांकि सरकार चाहे तो वह सार्वजिनक जगहों से भ्रष्टाचार को दूर कर सकती है। इसके लिए उसे सबसे पहले लोगों की जबावदेही सुनिश्चित करनी होगी। जबावदेही सुनिश्चित करने से लोगों का व्यवस्था में भरोसा मजबूत होगा और अधिकारियों में भी डर पैदा होगा। ज्यादातर कामों में प्रबंधकीय कौशल का भी अभाव दिखता है। अगर प्रबंधकीय जगहों पर सही और ईमानदार लोग तैनात किये जायें तो बेहतर नतीजे मिल सकते हैं। एक अहम बात और है, ज्यादातर भ्रष्टाचार के मामलों में संलिप्त लोगों को लगता है कि इस देश की कानून व्यवस्था उनका ज्यादा कुछ बिगाड़ नहीं पाएगी, इस भरोसे से वह मनमर्जी पर उतर आते हैं। ऐसा नहीं है कि देश में इन सब पर अंकुश लगाने के लिए कोई ठोस संवैधानिक व्यवस्था नहीं है, कई जांच एजेंसियां हैं, अदालत है और कानून भी है। लेकिन एक बड़ी मुश्किल यह है कि देश की न्यायिक व्यवस्था में न्याय मिलने में काफी देरी होती है। न्यायिक प्रक्रिया लम्बी होती है, वे जितनी लम्बी होगी, उसको प्रभावित करने की आशंका उतनी ज्यादा होगी। अगर न्यायिक प्रक्रिया के जरिये न्याय को जल्दी लागू किये जाने की व्यवस्था हो जाती है, तो इस एक कदम से भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। (लेखक एम्स, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक है)

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