Monday, December 20, 2010

भ्रष्टाचार की गंगोत्री

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट बताती है कि भारत की गिनती दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में होती है। आम लोग इस सच्चाई को रोजमर्रा के अपने अनुभव से जानते हैं। भ्रष्टाचार की इस व्यापकता का मूल कारण है दोषियों को मिलने वाला संरक्षण और उन पर होने वाली कार्रवाई में देरी। जब आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो इसके समर्थकों ने दावा किया था कि उदार अर्थव्यवस्था के तहत सरकारी नियम-कानून पारदर्शी होंगे, जिससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऊंचे पदों पर काबिज नौकरशाहों ने उदारीकरण के चलते तेजी से फले-फूले निजी क्षेत्र के उद्यमों में ज्यादा भ्रष्टाचार की संभावनाएं खोज लीं और राजनेताओं को भी रास्ता दिखा दिया। आजादी के बाद से भारत से जो काला धन बाहर गया, उसमें से आधे से ज्यादा पिछले तेरह वषरें में गया है। नीरा राडिया मामले ने सिद्ध कर दिया है कि आर्थिक उदारीकरण ने भारत में भ्रष्टाचार का उदारीकरण कर दिया है। रिश्वत, फर्जी अकाउंटिंग, लॉबीइंग, नीतियों में मनमाना फेरबदल आदि का खुला खेल चालू हो गया है। पूंजी बाजार, खनन, अचल संपत्ति व निर्माण, बैंकिंग, सरकारी अनुबंध हर क्षेत्र में उदारीकरण के बाद बड़े घोटाले दर्ज हुए हैं। दरअसल, विकासशील देशों में उदारीकरण की प्रक्रिया अपनाने के बाद नियम-कानून में शिथिलता आई, परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार को पनपने के भरपूर अवसर मिले हैं। बड़ी विदेशी कंपनियां विकासशील देशों की सार्वजनिक कंपनियों के अधिकारियों को रिश्वत देकर ठेके हासिल कर रही हैं। ताजा मामला अमेरिकी कंपनी कंट्रोल कंपोनेंट इंक का है, जिसने बिजली संयंत्रों की स्थापना में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों की आपूर्ति के लिए भेल, एनटीपीसी के अधिकारियों को मोटी रिश्वत दी। विश्व बैंक के एक अनुमान के मुताबिक विकासशील देशों को निर्यात किए जाने वाले सामान को खपाने के लिए हर साल 50 से 80 अरब डॉलर की रिश्वत दी जाती है। कुछ साल पहले अमेरिका के रोचेस्टर इंस्टीट्यूट ने उदारीकरण और भ्रष्टाचार के बीच सहसंबंध को आंकते हुए नतीजा निकाला था कि जिन देशों में लोकतंत्र पहले और आर्थिक उदारीकरण बाद में आया है, वहां मुक्त बाजार ने भ्रष्टाचार को नए आयाम दे दिए हैं। यह बात भारत पर भी फिट बैठती है। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने भारत सहित एशिया के देशों में बढ़ते भ्रष्टाचार को लोकतंत्र और मानव अधिकारों का सबसे बड़ा शत्रु बताया था। पिछले छह-सात वषरें में सेंसेक्स भी उछला और सोने व जमीन की कीमतें भी बढ़ीं। सामान्यत: ऐसा नहीं होता कि तीनों एक साथ बढ़ें। फिर जिस अनुपात में दाम बढ़े उस अनुपात में अर्थव्यवस्था का विकास और जीडीपी में बढ़ोतरी नहीं हुई। इससे स्पष्ट होता है कि भ्रष्ट तरीके से कमाया गया धन कई माध्यमों, विशेषकर हवाला के जरिए भारत आ रहा है। इस धन की आवाजाही पर निगरानी की कोई विशेष व्यवस्था शेयर बाजार, वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय में नहीं है। फिर ऐसी कोशिशों का यह कहकर विरोध किया जाता है कि यह उदारीकरण की मूल भावना के खिलाफ है। काले धन की आवाजाही को कर मुक्त संधियों ने आसान बना दिया। उदाहरण के लिए, भारत में होने वाले कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का 40 फीसदी हिस्सा मारीशस रूट से आ रहा है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि मात्र बारह लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश में कौन सा खजाना गड़ा है। स्पष्ट है वह खजाना काला धन ही है जो सफेद बनकर शेयर बाजार, रीयल एस्टेट आदि क्षेत्रों में निवेश के रूप में भारत लौट रहा है। इस धन का इस्तेमाल भारत में आतंकवादी गतिविधियां फैलाने और चुनावों को प्रभावित करने के लिए भी होता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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