Tuesday, December 21, 2010

इच्छाशक्ति का अभाव

कांग्रेस महाधिवेशन के मंच से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने लंबे भाषण में भ्रष्टाचार से निपटने पर जिस तरह जोर दिया उससे यह स्पष्ट है कि वह इससे अवगत हैं कि यही वह मुद्दा है जिससे उनकी सरकार घिरी है, लेकिन बावजज्द इसके वह इसके लिए आश्वस्त नहीं कर सके कि अब भ्रष्ट तत्वों की खैर नहीं। अपने भाषण में उन्होंने प्रधानमंत्री पद की निष्ठा की महत्ता बताई, लेकिन सवाल निष्ठा का नहीं इच्छाशक्ति का है। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की बातें करना और ऐसा करने की इच्छाशक्ति दिखाने में अंतर होता है। समस्या यह है कि यह अंतर स्पष्ट नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री के इस कथन से सहमत होना कठिन है कि सिर्फ संदेह होने पर उनके नेताओं ने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि यह जग जाहिर है कि ए. राजा से तब त्यागपत्र लिया गया जब इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रह गया था। जब मीडिया और विपक्ष राजा के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा था तब कांग्रेसजन देश को यह समझा रहे थे कि राजा को त्यागपत्र देने की आवश्यकता क्यों नहीं है? एक निराशाजनक तथ्य यह भी है कि जब राजा को स्पेक्ट्रम घोटाले के लिए जिम्मेदार माना जा रहा था तब उनका बचाव खुद प्रधानमंत्री की ओर से किया गया। ऐसा ही शशि थरूर के मामले में हुआ था और जहां तक अशोक चह्वाण की बात है वह तो रंगे हाथ पकड़े गए थे। यदि चह्वाण को हटाया गया तो राष्ट्र पर कोई उपकार नहीं किया गया। यदि केंद्र सरकार अपनी चौतरफा आलोचना के बाद चेत गई है तो फिर देश को यह बताया जाए कि उच्चतम न्यायालय की प्रतिकज्ल टिप्पणियों के बावजज्द केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर एक ऐसा शख्स क्यों विराजमान है जिस पर आयात घोटाले में लिप्त होने का न केवल आरोप है, बल्कि जो इस मामले में अभियुक्त भी है? सवाल यह भी है कि सीवीसी के रूप में पीजे थॉमस की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय की ओर से निर्धारित प्रक्रिया के तहत क्यों नहीं की गई? आखिर एक दागदार छवि वाले शख्स को सीवीसी बनाकर केंद्र सरकार यह दावा भी कैसे कर सकती है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त है? यदि स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रहे केंद्रीय जांच ब्यज्रो की निगरानी उच्चतम न्यायालय को करनी पड़ रही है तो क्या इसका एक अर्थ यह नहीं कि खुद शीर्ष अदालत यह मान रही है कि सीबीआइ सरकार से प्रभावित हो सकती है? प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने इरादों को प्रकट करते समय यह उल्लेख किया कि भाजपा किस तरह कर्नाटक के अपने मुख्यमंत्री को बचा रही है। इसमें संदेह नहीं कि भाजपा येद्दयुरप्पा के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही, लेकिन आखिर केंद्र सरकार अपनी तुलना भाजपा से क्यों कर रही है? यदि भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती नहीं दिखाएगी तो क्या केंद्र सरकार भी ऐसा ही करेगी? क्या कोई उदाहरण ऐसा है जिससे यह साबित हो कि केंद्र सरकार ने स्वेच्छा से किसी भ्रष्ट तत्व के खिलाफ कार्रवाई की? यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री लोक लेखा समिति के सामने उपस्थित होने को तैयार हैं, लेकिन उनकी इस पहल के बावजज्द यह प्रश्न तो अनुत्तरित है कि संयुक्त संसदीय समिति क्यों नहीं गठित होनी चाहिए? वस्तुत: यह वह अनुत्तरित प्रश्न है जो केंद्र सरकार के इरादों के प्रति संदेह पैदा करता है।


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