विगत तीन-चार महीने में कई बड़े वित्तीय घोटाले को देखते हुए लगता है कि ये सब लोकतांत्रिक व्यवस्था के ठीक से काम न करने का नतीजा है। सभी स्तम्भों की कार्यप्रणाली में जवाबदेही और पारदर्शिता सिरे से गैरहाजिर है। यह स्थिति तब है जबकि व्यवस्था को जिम्मेदार और पारदर्शी बनाने के उपक्रम विभिन्न स्तरों पर समय-समय पर चलते रहते है। फिर भी गड़बड़ियों का बने रहना, कथित रूप से कानून के होते हुए भी घपलों को न रोका जा सकना या घपलेबाजों पर कार्रवाई और उन्हें दंडित किये-कराये जाने की प्रक्रियाओं में शामिल एजेंसियों के व्यवहारों से यह नहीं लगता कि उन्होंने शासन के उक्त दो अपरिहार्य धर्मो-जवाबदेही और पारदर्शिता- का पालन किया है। इसी अर्थ में सारे अभ्यास परिणामों में विरोधाभासी लगते है। जनता ने लम्बे समय से बने इस परिदृश्य को अपनी चेतना के स्तर पर त्रासद अनुभवों के रूप में लिया है। जो ’चेक‘ किये जाने के कथित तमाम प्रबंधों के बावजूद शासन को घपलेबाजों की हिमायत या हिफाजत में ज्यादा जुटी पाती है। उसे लगता है कि ‘कानून की नजर में सब बराबर’ के इस सामान्य सिद्धांत पर तत्काल अमल करने में विशिष्ट भेदभाव क्यों किया जाता है? कार्रवाई की झंडी मिलते-मिलते इतनी देर हो जाती है कि सबूत मिट-मिटा दिये जाते है या तब तक कानूनी व्याख्याओं के बीच से बचाव का कोई रास्ता ढूंढ न लिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या शासन तंत्र की देखभाल में लगी तमाम एजेंसियों की कार्रवाई की आजादी से भ्रष्टाचार, अपराध, घोटाले या नियम-कानूनों के प्रति आम तौर पर आदर बढ़ाएगा? क्या इन्हें जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ अंजाम दिये जाने पर एजेंसियों में परस्पर सांठगांठ की आशंका खत्म हो जाएगी और किसी भी तरह के गैरकानूनी कामों पर पाबंदी लग सकेगी? जनता में इन जरूरतों के प्रति बन रही समझ के साथ तालमेल बिठाने या उसके अनुरूप चलने के लिए सरकार कितनी तैयार दिखती है? या सब कुछ यों ही चलता रहेगा? हर कार्रवाई में जिम्मेदारी और पारदर्शिता को स्वाभावत: शामिल करने में दिक्कत क्या है? आलस्य, राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी, गठबंधन सरकार में दलों के स्वार्थाें की हिफाजत की मजबूरी, स्वायत्त कर दिये गये निकायों की निडर कार्रवाइयों का डर या धन कमाने की लिप्सा के तहत कुछ छिद्रों को बनाये रखने के फायदे आदि सवालों पर विचार करने के लिए पेश है, इस बार का हस्तक्षेप :- राजनीति
आम जनता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जाग चुकी है और जाग रही है। जब पानी सिर से बाहर होगा तभी यही जनता सड़कों पर उतर कर विद्रोह करेगी। देश की सरकारों को भी शायद उसी का इंतजार है तभी वे अब तक सोयी हुई हैं। लेकिन यह काम सरकार को ही करना है और इसके लिए सरकार पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। सरकार को एक स्वायत्त भ्रष्टाचार निरोधक जांच एजेंसी भी बनाने पर जोर देना होगा, जो भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए हरसम्भव कदम उठा सके। हमने सरकार के सामने लोकपाल विधेयक का प्रारूप रखा है और उसके लागू होने पर निश्चित तौर पर लोगों की जवाबदेही तय की जा सकेगी और पारदर्शिता के साथ-साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन में भी काफी हद तक मदद मिलेगी। (श्री भूषण की पहचान सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यकर्ता के रूप में भी है) आलेख बातचीत पर आधारित अ आम जनता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जाग चुकी है और जाग रही है। जब पानी सिर से बाहर होगा तभी यही जनता सड़कों पर उतर कर विद्रोह करेगी। सरकार को एक स्वायत्त भ्रष्टाचार निरोधक जांच एजेंसी भी बनाने पर जोर देना होगा, जो भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए हरसम्भव कदम उठा सके। हमने सरकार के सामने लोकपाल विधेयक का प्रारूप रखा है और उसके लागू होने पर निश्चित तौर पर लोगों की जवाबदेही तय की जा सके गी और पारदर्शिता के साथ-साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन में भी काफी हद तक मदद मिलेगी
अभी जो धारावाहिक घोटाले उजागर हुए है, उससे कम से कम एक बात स्पष्ट तौर पर लक्षित होती है कि इस देश में सरकार ही सवरेपरि नहीं है। सरकार और उसके मंत्रियों को भी मैनेज किया जा सकता है। देश की पूरी शासन व्यवस्था चंद घरानों की जागीर बन कर रह गयी है। ये घराने अपने आर्थिक लाभ और दबदबे के लिए विधायिका, नौकरशाही और न्यायपालिका तीनों को अपनी जरूरत के मुताबिक ऑपरेट कर सकते है। इसके लिए उन्होंने जगह-जगह पर अपनी लॉबी को नियुक्त किया हुआ। पिछले कुछ सालों में देश में पूंजीपति घरानों की संख्या बढ़ी है। जो पहले के जमे-जमाये है, उनकी आय बढ़ी है। जब एक-एक आदमी के पास दसियों लाख करोड़ रुपये का साम््राज्य होगा तो वह हर चीज को प्रभावित तो कर ही सकता है। अपने यहां वह सरकार को प्रभावित नहीं कर रहा है, बल्कि सरकार उसके सामने घुटने टेक रही है। यह एक लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। दरअसल, हमें समझना होगा कि इन घरानों की कोई सामाजिक जिम्मेदारी नहीं होती, लिहाजा वे अपने लाभ के लिए सही- गलत हर कदम उठाते है। देश में अगर लोकतंत्र को बचाये रखना है तो हमें सबसे पहले इन पूंजीपतियों की ताकत को कम करना होगा। जहां तक इस देश में पारदर्शी शासन व्यवस्था की बात है तो हम लोग जानते है कि इस दिशा में हमारे यहां कभी कोई सार्थक, सकारात्मक पहल नहीं हो सकी। हम अपने संवैधानिक व्यवस्था को ही लागू करने में कामयाब नहीं हुए हैं। हालांकि पिछले दिनों सरकार ने सूचना का अधिकार देने वाला सार्थक कानून जरूर बनाया है लेकिन अब तक इस कानून को लेकर उसकी नीयत साफ नहीं हो पायी है। यही वजह है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के दौरान वह नौकरशाही के लोगों को ही ला रही है। वजाहत हबीबुल्ला निस्संदेह बहुत अच्छे व्यक्ति थे लेकिन कोई दूसरा नौकरशाह भी उतना ही अच्छा होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इस बात की आशंका जरूर है कि अगर इसी तरह नौकरशाहों की नियुक्ति ही सूचना आयुक्त के तौर पर होती रहेगी, तो यह कानून अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाएगा। नौकरशाहों को जब प्रशिक्षित किया जाता है, तभी उन्हें घुट्टी पिलायी जाती है कि सरकार की बातों को कैसे छुपाकर रखा जाना है, ऐसे में वे सूचना आयुक्त बनकर पारदर्शिता दिखाएंगे, यह सम्भव नहीं होगा। हमने लगातार सरकार से इस बात की मांग की है कि इसमें बाहर के लोगों को भी शामिल किया जाये। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करके सेवानिवृत्त लोगों को भी मौका दिया जा सकता है लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी है, जो बताता है कि उसकी भी पारदर्शी शासन व्यवस्था के लिए कोई इच्छाशक्ति नहीं है। एक बात और, अपने यहां ज्यादातर गड़बड़ियां आर्थिक मामलों में देखने को मिलती है। एक ओर तो देश की 70 फीसद आबादी रोजाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर गुजर-बसर करने को मजबूर है तो दूसरी ओर कारपोरेट घरानों की आमदनी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में हमने सरकार से मांग रखी है कि वह कानून बनाकर सौ रु पये से अधिक मूल्य की करेंसी को खत्म कर दे। जिस देश की 80 फीसद से ज्यादा आबादी के पास कोई बैक एकाउंट नहीं है वहां सौ रु पये से ज्यादा मूल्य के नोट की कोई आवश्यकता भी नहीं है। इसके अलावा इस कानून के तहत एक हजार Rs से अधिक के किसी भी ट्रांजेक्शन को बैक एकाउंट से करने का ही प्रावधान रखा जाये। इसके लिए सरकार को हर आदमी का बैक एकाउंट खोल देना चाहिए। इस कानून के बनाने से इस देश में काला बाजारी को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके अलावा इस देश में निजी संस्थाओं का दखल किन-किन क्षेत्रों में होना चाहिए, इस पर विचार किये जाने की जरूरत है। प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कभी निजी क्षेत्रों को नहीं दिया जाना चाहिए। प्राकृतिक गैस हो, या फिर जल, स्पेक्ट्रम हों, जंगल हों या फिर सड़क निर्माण इन सबको निजी क्षेत्र के दखल से मुक्त रखा जाना चाहिए। जिन संसाधनों पर देश की जनता का हक है, जब उसे निजी क्षेत्रों के हाथों में सौपा जाता है तो सबसे बड़ी दिक्कत यही होती है वह कम्पनी विशेष उस पर अपना एकाधिकार समझकर मनमाने फैसले लेती है। इस पर अंकुश लगाये जाने की जरूरत है क्योंकि वह बिना किसी सामाजिक जवाबदेही के अपने फैसले आम लोगों पर भी थोपता है। निजी क्षेत्रों को उसी क्षेत्र में कारोबार करने की अनुमति होनी चाहिए जहां फ्री मार्केट का कंसेप्ट काम कर रहा हो। लेकिन मुश्किल यही है कि ऐसे कदम तभी उठाये जाएंगे जब सरकार खुद ईमानदार हो। लेकिन कॉमनवेल्थ घोटाले से लेकर 2 जी घोटाले तक यह साफ हुआ है कि सरकार भी भ्रष्टाचार में शामिल हो गयी है। उसके ज्यादातर मंत्रियों पर भ्रष्ट होने के आरोप है। देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाली जांच एजेंसियां सरकार और मंत्रिमंडल के तहत काम करती है, लिहाजा उनकी ईमानदारी पर भी संदेह होता है। कोई भी जांच एजेंसी इतनी सशक्त भी नहीं है कि लोगों में उससे खौफ का भाव पैदा हो। बहरहाल, इतनी अंधेरगर्दी के बाद भी पूरी तरह नाउम्मीदी नहीं होनी चाहिए। (लेखक सर्वोच्च न्यायालय के प्रख्यात अधिवक्ता है)
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