2010 में कारोबारी जगत में सफलता और विफलता के समाचारों की सुर्खियों में सबसे अधिक चर्चा राडिया, अंबानी और अकुला जैसे नामों की रही। इन नामों से जुड़ी खबरें भारतीय कंपनी जगत के बदलते रूप-रंग और नई चाल ढाल का प्रतिबिंब माना जा रहा है, जो अपने वाले वर्ष में नए आयाम हासिल कर सकता है।
लाबिंग का भूत
पीआर कंपनी चलाने वाली महिला नीरा राडिया के रूप में कॉरपोरेट जगत ने लाबिंग का चकित करने वाला चेहरा देखा। टेलीफोन टैप खुलासे के बाद देश में लाबिंग के पेशे के नियमन की बात की जाने लगी है। नीरा राडिया की बातचीत लीक होने के बाद कंपनी जगत और मीडिया के साथ साथ संसद में भी बवंडर आ गया। परत दर परत लीक होती बातचीत के बीच दूरसंचार मंत्री ए राजा पद गवांना पड़ा। राजा के कार्यकाल में 2जी स्पेक्ट्रम घोटले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बिठाने की मांग को लेकर संसद 23 दिन तक ठप रही।
वारिस की खोज
टाटा समूह के मालिक रतन टाटा भी पहले उत्तराधिकारी के मुद्दे पर और फिर 2जी स्पेकट्रम आवंटन विवाद के बीच लगातार चर्चा में बने रहे। इनफोसिस के मेंटर नारायण मूर्ती भी अपने उत्तराधिकारी खोजने की योजना की वजह से सुखिर्यो में आए।
सबसे बड़ा सौदा
सुनील मित्तल की कंपनी भारतीय एयरटेल पहले दक्षिण अफ्रीकी कंपनी एमटीएन अधिग्रहण के प्रयास में विफल रहने के कारण चर्चा में रही। इसके बाद मित्तल ने कुवैत स्थित कंपनी जेन के अफ्रीकी देशों के कारोबार का 10.7 अरब डॉलर में अधिग्रहण कर डंका बजाया।
कॉरपोरेट दानवीर
प्रेमजी ने एक बार फिर दो अरब डॉलर मूल्य के शेयर अपने एक धर्मार्थ ट्रस्ट को दान करने की वजह से चर्चा में रहे। इसके पैसे से ट्रस्ट शिक्षा सेवाआें का विस्तार करेगा।
वर्चस्व की लड़ाई
नियामक संस्थाओं की स्वायत्ता और अधिकारों के लिए सेबी प्रमुख भावे और रिजर्व बैंक के गर्वनर सुब्बाराव की सरकार के साथ खींचतान को भी मीडिया में खूब स्थान मिला।
महाजनी कर्ज का पंजा
इस वष देश ने अंबानी बंधुओं के बीच गैस को लेकर कंपनी जगत का एक जबर्दस्त संग्राम देखा जिसका समापन अनिल और मुकेश अंबानी के बीच सुखद समझौते के साथ हुआ।
भाइयों की तकरार और प्यार
ग्रामीणों को महाजनी ऋण के चंगुल से मुक्त कराने की कारगर व्यवस्था के रूप में प्रचारित की जा रही सूक्षम ऋण संस्थाओं की एक दूसरी ही पहचान उभरी। संस्था एसकेएस माइक्रोफाइनेंस ने आईपीओ ला कर एक नया इतिहास बनाया पर साल बीता भी नहीं कि एसकेएस सहित माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं महाजननी तरीके अपनाने की बदनामी में घिर गईं। आईपीओ के जरिए 35 करोड़ डॉलर जुटाने वाले एसकेएस माइक्रोफाइनेंस और उसके संस्थापक विक्रम अकुला के लिए खुशी का दौर तो आया, परंतु यह अल्पकालिक साबित हुआ। कारोबारी प्रशासनिक मुद्दा, एसकेएस मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुरेश गुरमानी के अचानक हटाने, उच्च ब्याज दर और आंध, प्रदेश सरकार द्वारा माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र के विनियमन ने अकुला को परेशान किया।

No comments:
Post a Comment