सरकार और विपक्ष का झगड़ा खत्म होगा तो ही चलेगी अगले साल संसद
सोनिया मजबूत हुईं, नीतीश छाए
बड़ी पार्टियों की सहयोगियों से चलती रही अनबन
नई दिल्ली। साल 2010 राजनेताओं के घोटालों के लिए भी याद किया जाएगा। कुछ राजनेता घोटालों की वजह से हाशिए पर धकेल दिए गए लेकिन कुछ का बाल भी बांका नहीं हुआ। संसदीय प्रक्रिया के तहत राजनेताओं के साथ लंबा वक्त गुजारने वाले सुभाष कश्यप कॉमनवेल्थ गेम्स, स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसायटी और कर्नाटक के जमीन घोटालों का उल्लेख करके कहते हैं कि एक साल में इतने घोटाले कभी भी सामने नहीं आए। इस साल संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बिना कामकाज के बेकार चला गया। इसे कैसे नजरंदाज किया जा सकता है। विपक्ष घोटालों पर संयुक्त संसदीय समिति(जेपीसी) की जिद करता रहा और सरकार इस पर अड़ी रही कि पहले इस पर संसद में बहस करा ली जाए। सरकार और विपक्ष के बीच झगड़ा इसको लेकर भी मचा कि सरकार संसद की लोक लेखा समिति(पीएसी) से स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच को अहमियत देती रही। लेकिन भाजपा अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता की अध्यक्षता वाली इस कमेटी को यह कहकर जेपीसी से कमतर बताती रही कि उसका दायरा सीमित है। इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह पेशकश कर दी कि वह पीएसी के सामने गवाही देने को तैयार हैं लेकिन विपक्ष नहीं माना। नए साल में विपक्ष का रुख क्या रहता है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। एनडीए का रुख अभी नरम नहीं पड़ा है,भाजपा अपने सहयोगियों के साथ जेपीसी की मांग को लेकर दिल्ली में भ्रष्टाचार पर बड़ी रैली कर चुकी है। हालांकि कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के जमीन आवंटन में फंसे होने के बावजूद भाजपा हटाने का साहस नहीं दिखा सकी। भाजपा ने उनके हटने का रोडमैप भी तैयार किया लेकिन येदियुरप्पा ने मना कर दिया। इससे पहले झारखंड में भाजपा ने शिबू सोरेन के साथ समझौता करके अजरुन मुंडा के नेतृत्व में सरकार बनाकर भी दिखाया कि उसका भी चाल-चरित्र और चेहरा सब बदल गया है। स्पेक्ट्रम घोटाला बन गया है गले की फांस : तमाम उपायों के बावजूद स्पेक्ट्रम घोटाला अब भी सरकार के लिए गले की फांस बना हुआ है। यह मामला इतना अधिक नाजुक मोड़ पर जा पहुंचा है कि सुप्रीम कोर्ट को प्रधानमंत्री के दफ्तर पर प्रतिकूल टिप्पणी करने तक जाना पड़ा। ऐसा भी पहली बार ही हुआ। मामला यह था कि स्पेक्ट्रम घोटाले की शिकायत करने वाले जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत को हमेशा की तरह इस मामले में भी गैरजरूरी समझ लिया गया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसी महीने कांग्रेस महाधिवेशन में कहा कि पार्टी ने किसी भ्रष्टाचारी को नहीं छोड़ा। पर कॉमनवेल्थ गेम्स घोटालें में फंसे कांग्रेस सांसद सुरेश कलमाडी और स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे पूर्व संचार मंत्री ए राजा पर कार्रवाई करने में कितनी देरी की गयी, इसका सरकार और कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं है। पहले सरकार डरती रही कि अगर ए राजा पर कार्रवाई हुई तो 17 सांसदों वाली द्रमुक सरकार गिराने की कोशिश तक कर सकती है। बाद में कांग्रेस के रणनीतिकारों ने तमिलनाडु में चुनाव करीब जान कर न सिर्फ ए राजा को मंत्री पद से हटवाया, बल्कि सीबीआई ने द्रमुक नेता करुणानिधि की बेटी कनिमोझी के एनजीओ पर छापा भी मारा। बावजूद इसके राजनीतिक मजबूरियों के चलते द्रमुक नेताओं ने उफ तक नहीं की। आदर्श सोसायटी घोटाले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की कुर्सी इसलिए चली गई क्योंकि उन्होंने करगिल के शहीदों के नाम पर बने फ्लैट अपने ससुराल वालों को दिलवा दिए थे। सोनिया संगठन की प्रमुख बनी रहेंगी लेकिन राहुल पर सस्पेंस कायम : कांग्रेस में कुछ खास हुआ तो वह यह कि सोनिया गांधी के लिए पार्टी के संविधान में संशोधन कर दिया गया, अब वह पांच साल तक कांग्रेस की अध्यक्ष रहेंगी। उम्मीद की जा रही थी कि राहुल गांधी की जिम्मेदारियों में इजाफा होगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में तो पारित कराने में सरकार कामयाब रही लेकि न लोकसभा का रास्ता अभी भी टेढ़ा ही बना हुआ है। जातिगत जनगणना के लिए पहले सरकार तैयार नहीं थी लेकिन बाद में लालू प्रसाद और शरद यादव के दबाव में आ ही गई। खाद्य सुरक्षा का कानून बनाने में अभी सरकार को कुछ वक्त और लगेगा। नीतीश ने सबको रौंद दिया : क्षेत्रीय दलों ने साल 2010 में जो किया उसे भी याद रखना होगा। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कमाल कर दिया। राजद नेता लालू प्रसाद और लोजपा नेता रामविलास पासवान के सपने तो खाक में मिलाए ही साथ में कांग्रेस की भी खूब दुगर्ति की। नीतीश कुमार की जीत की आंधी में राहुल गांधी का प्रचार भी काम नहीं आया और कांग्रेस अकेले लड़कर भी सिर्फ चार सीट ले सकी। भाजपा को अपेक्षा से ज्यादा सीटें मिलना सबको चकित कर गया। बिहार के चुनाव का इसलिए भी महत्व है क्योंकि नीतीश कुमार में इतना बड़ा राजनीतिक रिस्क ले लिया कि भाजपा के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी के साथ भी मंच ‘शेयर’ करने से इनकार कर दिया। राजनीति में जो जीता वही सकिंदर होता है। इसलिए जीत होने पर इस कड़वे घूंट को भी भाजपा आसानी से पी गई। कांग्रेस-भाजपा की अपने सहयोगियों से चलती ही रही खटपट : महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा के बीच छिटपुट स्थानीय विवाद बने ही रहे। वहीं कांग्रेस की भी एनसीपी से कुछ न कुछ खटपट चलती रही। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कभी कांग्रेस से खुश और कभी खफा हुईं। राहुल गांधी के पश्चिम बंगाल दौरे में ममता बनर्जी ने उन्हें चाय या भोजन पर बुलाना तो दूर उल्टा नाराजगी ही जताई। समाजवादी पार्टी से उसके सबसे प्रमुख साथी अमर सिंह अलग हुए तो मुलायम सिंह ने दूर चले गए आजम खां को मना लिया। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीद से दुगना प्रदर्शन कर जाने से उप्र में लगा कि बसपा का वोट बैंक हिल रहा लेकिन बाद में हुए उप चुनावों में मुकाबला सपा-बसपा के बीच ही रहा और कांग्रेस-भाजपा का कहीं पता नहीं चला। आने वाला साल चुनावों का साल है। इसमें ममता बनर्जी की भी परीक्षा होनी है और द्रमुक नेता करुणानिधि की भी परीक्षा होनी है। पांच राज्यों के इन चुनावों के बाद कांग्रेस-भाजपा के सहयोगी भी बदल सकते हैं और नए राजनीतिक समीकरण भी बन सकते हैं।

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