अखिल भारतीय कांग्रेस के हालिया महाधिवेशन में शीर्ष नेतृत्व द्वारा भाजपा पर तीखे प्रहार के साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन पर जोरदार बहस छेड़ी गई। इसके तुरंत बाद भाजपा ने रामलीला मैदान में सत्तापक्ष पर पलट प्रहार किया। ऐसा होना जरूरी था और सामयिक भी। वर्ष 2010 के खत्म होते-होते भ्रष्टाचार देश के लिए सिर्फ एक दार्शनिक या राजनीतिक बहस का मुद्दा नहीं, बल्कि आम नागरिक के दैनिक जीवन की एक ठोस सचाई बन चुका है। इधर जो ब्योरे प्रकाश में आए हैं, उनसे जाहिर है कि भ्रष्टाचार आज हमारी तमाम पार्टियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं का कितना बड़ा, शायद सबसे बड़ा कारक तत्व बन गया है।
भ्रष्टाचार से समझौता किए बिना आम लोग न तो अस्पताल से रेल या स्कूल तक कहीं भी घुस सकते हैं, और न ही राशन कार्ड या जाति प्रमाणपत्र जैसे जरूरी कागजात हासिल कर पाते हैं। घर बनाना हो या खरीदना, या घर से बाहर कहीं सफर पर जाना, हर मोरचे पर हेराफेरी की मार झेलना जरूरी है। हाल में बिहार से सपरिवार वापस दिल्ली लौटने को व्यग्र एक परिचित रेलवे की ‘तत्काल’ सुविधा के सहारे भी टिकट न मिल पाने से बड़े खिन्न थे। उनको भुक्तभोगी जानकारों द्वारा बताया गया कि यह टिकट सेंतमेंत में नहीं पाया जा सकता। ऊपर से नीचे तक कमीशन खाने वाला भितरिया लोगों का एक खास गुट, पांच सौ रुपये फी टिकट अतिरिक्त वसूल कर उन्हें जरूरतमंदों को उपलब्ध कराता है। परिचित ने फी टिकट पांच सौ अतिरिक्त देना स्वीकार कर लिया, अगले दिन उनको बुकिंग मिल गई।
विकिपीडिया में अन्य देशों के साथ भारत के व्यापक भ्रष्टाचार पर भी एक विशेष पन्ना (शीर्षक : करप्शन इन इंडिया) है, जो भारतीय अफसरशाही, पुलिस, राजनीति, न्यायपालिका और यहां तक कि कुछ धार्मिक संगठनों के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी विशद रोशनी डालता है। उससे जो कुल तसवीर बनती है, वह यह कि भारत में भ्रष्टाचार को नियामक संस्थाओं से खाद पानी ही नहीं मिलता, हमारी विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया में मौजूद कुछ बड़े लोगों का समवेत संरक्षण भी हासिल है। नतीजतन भ्रष्टाचारी पकड़े भी गए, तो अकसर उनके खिलाफ सुबूत या गवाह नहीं मिलते और अगर कहीं मिल भी गए, तो फैसला आने में बरसों लग जाते हैं, तब तक तमाम तरह के वारे-न्यारे हो चुकते हैं।
इसमें शक नहीं कि बिना भ्रष्ट तरीके अपनाए काम हो सके, तो हम सबका जीवन बहुत सुखद हो जाएगा, लेकिन उसके लिए पूरे राज-समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक असहिष्णुता जरूरी है। हमारे यहां भ्रष्टाचार को लेकर एक गहरी भाग्यवादिता पैठी हुई है, जिसके कारण होते-होते राज-समाज के बुनियादी कल-पुरजे भ्रष्टाचार के ग्रीज से ही संचालित होने लगे हैं। जब बेईमानी ईमानदारी की तुलना में अधिक निरापद, अधिक फलदायी बन जाए, तो व्यवस्था में बेईमानों की तादाद और एकजुटता बढ़ेगी और ईमानदारी और ईमानदारों के प्रति एक गहरी अलर्जी दिखाई देगी, यह तय है। बीसियों उदाहरण हैं भी, जब कोई ईमानदार और योग्य मंत्री, अफसर, पत्रकार या पुलिसकर्मी ‘संवेदनशील’ यानी मलाईदार पद से इसलिए चुपचाप हटा दिया गया कि उसकी ईमानदार उपस्थिति से विभाग के अनेक खाने-पीने वालों को मितली आने लगी थी। और वहीं एक भ्रष्टाचारी छवि वाले पर आंच आई, तो कॉरपोरेट जगत से लेकर मीडिया तक में तमाम तरह के पैरोकार उसे सहज उपलब्ध हो गए हैं।
ऐसे माहौल में जब सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री या गडकरी और आडवाणी कहते हैं कि भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, तो सुनकर अच्छा जरूर लगता है, लेकिन कुछ खालिस भारतीय शंकाएं भी मन में कुलबुलाती हैं। पहली तो यह कि देश की सभी बड़ी-छोटी पार्टियां जिस तरह चुनाव लड़ने की शाहखर्च मशीनें बन चुकी हैं, उसके बाद अधिवेशनों में इस तरह के प्रस्ताव क्या एक प्रतीकात्मक मधुर रूढ़ि से अधिक महत्व रखते हैं? जैसे विशाल भगवती जागरणों के दौरान बच्चे बदस्तूर झगड़ते, युवा जमुहाते, औरतें शोर के परे चुपचाप मोहल्ले की खबरों का आदान-प्रदान करती और बूढ़े ऊंघते पाए जाते हैं, कुछ उसी तरह का मंजर शिखर नेतृत्व के भाषणों के दौरान विशाल पार्टी सम्मेलनों में भी दिखाई देता है। वहां भी इरादे नेक होने के बावजूद कानफोड़ जयकारे और विधि-विधान अंतत: बेमतलब ही हैं, क्योंकि श्रोताओं का असल ध्यान कहीं और है। आरती का वक्त आने पर अगर सब चौंककर एक साथ खड़े होकर हाथ जोड़ लेते हैं, तो इससे यह तो प्रमाणित नहीं होता कि समागम में मौजूद हर व्यक्ति अब पवित्रात्मा बनकर घर लौटेगा। और हर बड़ा वक्ता बाहर आते ही खुद भी सीधे जनसेवा की धूल खाने निकल पड़ेगा।
दूसरे, जहां तक प्रस्ताव पारित कराने का सवाल है, वह तो दलगत अनुशासन तले जमा हुए सिपाहियों के बीच निर्विघ्न संपन्न होना ही है, लेकिन यह भी गौरतलब है कि अनुशासन की दिशा में असल ठोस कदम उठाए गए नहीं, कि पार्टी के भीतर इन्हीं अनुशासित सिपाहियों के मुखौटे उतर जाते हैं और कड़वे विद्रोहफूटने लगते हैं। कर्नाटक में येदियुरप्पा को बचाने की कितनी भारी कीमत भाजपा दे रही है? उधर आंध्र में कांग्रेस के अति महत्वाकांक्षी युवा सदस्य, जगन रेड्डी ने भी मन-मरजी मुताबिक मुख्यमंत्री पद न पाने पर बगावती आग लगाने में देर नहीं की। तीसरी बात यह, कि पुराने अनुभवों के उजास में अभी तक बढ़ते राजकीय भ्रष्टाचार का भुक्तभोगी रहा आम आदमी प्रधानमंत्री द्वारा दागियों के खिलाफ जल्द जांच कराने के आश्वासन या खुद को भी खुली जांच के लिए प्रस्तुत करने की पेशकश को लेकर भी बहुत जल्द बहुत उत्साहित अनुभव नहीं कर रहा है। विगत में अलग-अलग मामलों में चार बार जेपीसी बैठी है, पर कुल मिलाकर नतीजा शून्य ही रहा है। अब इस बार प्रधानमंत्री पीएसी के आगे जाएं या जेपीसी के, आम आदमी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह तो तब संतुष्ट होगा, जब अस्पताल से बाहर निकालकर हर राजा बाबू को पूछताछ के लिए सीधे हिरासत ले जाया जाए, जब जांच समितियों को सेवा विस्तार दे देकर अनंत काल तक जांच चलाने के बजाय चार्जशीटें दाखिल हों और साफ-सुथरे फैसले सामने आएं, और जो सदस्य तुलसी बाबा के शब्दों में दलों के ‘परम सनेही’ रहे हों, वे भी भ्रष्टाचारी प्रमाणित होते ही निर्ममता से ‘कोटि वैरी सम’ त्यागे जाने लगें। पार्टी में टूट या एकाध चुनाव हारने का खतरा उठाए बिना अब कोई दल भ्रष्टाचार उन्मूलन की ईमानदार मुहिम कतई नहीं शुरू कर सकता। और अगर यह जोखिम न उठाया गया, तो जनता बुराड़ी की बैठक या रामलीला मैदान की रैली को एक जैसा स्वांग मानकर खुद भी भ्रष्टाचार में लीन होने की सोचेगी। बाबा चाणक्य कह ही चुके हैं कि यथा राजा तथा प्रजा।

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