Sunday, December 26, 2010

हम होंगे कामयाब बशर्ते..

देश कठिन दौर से गुजर रहा है। हर सुबह इसके किसी न किसी हिस्से से घोटाले की खबर आती है। समय गुजरने के साथ घोटालों में शामिल धनराशि के आकार में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। ऐसा लगता है कि हमारे सालाना बजट का एक बड़ा हिस्सा घोटाले की भेंट चढ़ रहा है। पैसे से ज्यादा इससे इंसान के सम्मान का सवाल जुड़ा है। बिना पैसा दिए कोई काम नहीं होता है। जो पैसा नहीं देते उन्हें अपमानित किया जाता है, धमकी दी जाती है और यहां तक कि उनके साथ गाली-गलौज भी किया जाता है। भ्रष्टाचार को रोकने के कारगर उपाय के अभाव में इसके रास्ते पर चलने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आखिर क्या वजह है कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के तमाम सुबूतों के बावजूद कोई जेल नहीं जाता है? इसकी वजह यह है कि हमारी भ्रष्टाचार निरोधक व्यवस्था सड़ी-गली है। केंद्र सरकार में केंद्रीय सतर्कता आयोग है, जो कहने को तो स्वतंत्र है, लेकिन सिर्फ सलाह दे सकता है। इसलिए किसी वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की इसकी सिफारिश को कभी-कभार ही स्वीकार किया जाता है। सीबीआइ भी स्वतंत्र है लेकिन यह पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है। कोई भी जांच शुरू करने से पहले या किसी अधिकारी और नेता के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए उसे एक ऐसी सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है जो उनके समर्थन पर टिकी है जिनके खिलाफ जांच करनी होती है। शायद सरकार अनुमति देने या स्वतंत्र जांच का आदेश देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं जुटा पाती है। राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र भी इसी तरह समझौतावादी माहौल में काम कर रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार निरोधक व्यवस्था न सिर्फ सड़ी-गली है बल्कि अपर्याप्त भी है। आप यह जानकर स्तब्ध रह जाएंगे कि भ्रष्टाचार का आरोप साबित हो जाने के बाद भी संबंधित व्यक्ति की काली कमाई को जब्त करने का कोई प्रभावी कानूनी प्रावधान नहीं है। इसके मद्देनजर हमें भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों में आमूल-चूल बदलाव करने की जरूरत है। कई लोग मुझसे पूछते हैं-क्या भारत ऐसा कर सकता है? मुझे लगता है कि ज्यादातर देशवासी ईमानदार, बुद्धिमान और मेहनती हैं। वे इस व्यवस्था के शिकार हैं। इस मामले में हमें हांगकांग से सीख लेनी चाहिए। आज के भारत से तुलना की जाए तो पिछली सदी के सातवें दशक में वहां ज्यादा भ्रष्टाचार था। पुलिस और माफिया की साठगांठ के कारण अपराध में तेजी आ गई थी। लेकिन जब इसके विरोध में लाखों लोग सड़क पर उतर आए तो सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वतंत्र आयोग का गठन करना पड़ा। उस आयोग को सारे अधिकार दिए गए। उसने सबसे पहले 180 में से 119 भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया। नौकरशाही पर इसका जबर्दस्त असर पड़ा। आज हांगकांग का सरकारी तंत्र सबसे ईमानदार तंत्रों में गिना जाता है। अपने देश में भी ऐसा कोई आयोग गठित कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार की बीमारी जड़ से खत्म हो सकती है। किरण बेदी, प्रशांत भूषण और न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े ने इस तरह का आयोग स्थापित करने के लिए एक विधेयक का मसौदा तैयार किया है। इसमें यह सुझाव दिया गया है कि भ्रष्टाचार से लड़ने वाली ढेर सारी एजेंसियों के बजाय केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का एक पद होना चाहिए। इन दोनों के पास भ्रष्टाचारियों की जांच करने और मुकदमा चलाने का अधिकार होना चाहिए। इस एजेंसी के सर्वोच्च पद पर नियुक्ति में पूरी पारदर्शिता बरती जानी चाहिए और इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

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