Thursday, December 30, 2010

सामने आने से कतरा रहे घोटाले के शिकार निवेशक

गुड़गांव फर्जीवाड़ा कर निवेशकों को करोड़ों का चूना लगाने के आरोपी निजी बैंक अधिकारी शिवराज पुरी अभी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा है। खुलासा हुआ कि वह देश-विदेश के विभिन्न बैंकों में रिश्तेदारों के नाम डेढ़ दर्जन खातों में करोड़ों रुपये जमा करा चुका है। इस समय उनमें से चार खातों में हजार से दो हजार रुपये जमा है। अन्य चौदह खातों में 3 करोड़ 85 लाख रुपये जमा हंै। उन्हें पुलिस ने रिजर्व बैंक से अनुरोध कर सीज करा दिया है। पुलिस ने अब तक 78 खातों को सील कर दिया है, जिन पर शक है कि इन खातों से लेन-देन हुआ है। पुलिस जांच में यह बात भी सामने आई है कि इस घोटाले में सात निवेशक भी लाभांवित हुए और उन्होंने जमा रकम की दोगुनी रकम निकाली। यह भी सामने आया है कि नौ खाते ब्रोकरों के हैं। ऐसे में निवेशकों द्वारा लगाया गया धन शेयर बाजार में लगाया गया। गुड़गांव में हुए इस महाघोटाले में अभी तक 40 से अधिक निवेशकों के प्रभावित होने की बात सामने आई है। सिटी बैंक के सहायक उपाध्यक्ष बीनू सोमन ने मंगलवार को थाना डीएलएफ फेज टू में मामला दर्ज कराया था। आरोप है कि डीएलएफ फेज टू स्थित सिटी बैंक की कारपोरेट शाखा में तैनात रहे शिवराज पुरी ने सेबी (नियामक) की ओर से एक फर्जी मंजूरी पत्र दिखा बैंक के लेटर हेड पर फर्जी निवेश स्कीम की जानकारी दे सितंबर, 2009 में संपर्क किया। उसने निवेशकों (नामी-गिरामी कंपनियां) को यकीन दिलाया कि एक साल की अवधि में बैंक रकम को दो गुना कर देगा। उसके झांसे में आकर करीब चालीस निवेशकों ने उसके बताए खाते में करोड़ों की रकम जमा कर दी थी। वह खाता शिवराज ने नाना प्रेमनाथ के नाम से खोल रखा था, जिसमें रकम जमा होते ही वह अन्य बैंकों में खुले परिजन के खातों में जमा करा देता था। उसके इस कारनामे का खुलासा तब हुआ बैंक अधिकारियों को पता चला कि एक ही खाते से करोड़ों की रकम (सौ से चार सौ करोड़) कई खातों में डाली गई। इसके बाद अमेरिकन मूल की इस बैंकिग कंपनी में हड़कंप मच गया। अमेरिका से बैंक का उच्चस्तरीय जांच दल गुड़गांव आया और जांच की तो महाघोटाले का नायक शिवराज निकला जिसे बैंक ने कारपोरेट घरानों से बेहतर संबंध बनाने के लिए रखा था। पुलिस अधिकारी की मानें तो शिवराज की शेयर दलालों से भी मिलीभगत हो सकती है। कयास है कि नाना के खाते में निवेश कराई गई करोड़ों की रकम दलालों के खाते में डाल दी गई हो। पर्दे के पीछे भी कई खिलाड़ी : अभी भले ही मामले में मुख्य आरोपी शिवराज हो और उसकी मदद नाना प्रेमनाथ, नानी शीला और रिश्तेदार दीक्षा पुरी ने जाने-अनजाने में की हो, पर पूरे खेल में बैंक के कुछ अधिकारी व कर्मचारी भी शामिल हो सकते हैं। पुलिस आयुक्त एसएस देसवाल ने कहा कि आरोपी की गिरफ्तारी के पहले कुछ नहीं कह सकते। उसे दबोचने के लिए लुकआउट सरकुलर जारी कर एयरपोर्ट पर भी पुलिस टीम लगा दी गई है। निवेशकों के रिकार्ड देखने के बाद ही रकम की स्थिति भी स्पष्ट हो सकेगी। पता गलत दिया, घर से गायब : बैंक कर्मचारियों के मुताबिक आरोपी दिल्ली में रहता था। पुलिस ने वहां छापेमारी की तो पता चला कि वह डीएलएफ फेज-4 स्थित हेमिल्टन कोर्ट स्थित उसके 425-ए नंबर के फ्लैट में रहता है। पुलिस टीम ने वहां छापेमारी की तो पता चला कि उसका परिवार फ्लैट में सात दिन से नहीं आया। फ्लैट में ताला लगा था। पड़ोसी पुलिस को कुछ अधिक बता नहीं सके। पुलिस यह जानने में लगी की फ्लैट किराये का है या फिर उसका अपना। अंदेशा है कि मामला प्रकाश में आते ही उसने ठिकाना बदल लिया।
निवेशक नहीं आए सामने : अभी तक 40 निवेशकों (कई कारपोरेट कंपनियां) द्वारा फर्जी स्कीम में काफी धन लगाने का खुलासा हुआ है, लेकिन किसी निवेशक ने पुलिस थाने में मामला दर्ज नहीं कराया है। पुलिस आयुक्त कह चुके हैं कि निवेशक पुलिस से संपर्क करे। बैंक प्रवक्ता ने अपील भी जारी की थी।

विदेश से सीधे कर्ज नहीं ले सकती सहकारी बैंक

भोपाल किसानों की जमीनें गिरवी रखने के मामले में जब दैनिक जागरण ने तहकीकात की तो कई सनसनीखेज जानकारियां सामने आई। सूत्रों ने बताया कि अपेक्स बैंक सीधे विदेश से कर्ज नहीं ले सकता। उसके पास ऐसा करने का लाइसेंस भी नहीं है। लिहाजा उसने बिचौलिए के जरिए किसानों की जमीन गिरवी रखने का तानाबाना इतनी होशियारी से बुना कि बैंक के आला अधिकारियों को भी इसकी भनक नहीं लग पाई। बैंक के संचालक मंडल में भी इसका प्रस्ताव एक्स एजेंडा विषय के तौर रखा गया। यह प्रस्ताव 30 नवंबर 2009 की संचालक मंडल की बैठक में पारित किया गया। बिचौलिए को क्या होगा फायदा बैंक द्वारा जिस स्टार एजेंसीज प्राइवेट लिमिटेड से कर्ज लेने और किसानों की जमीन गिरवी रखने की कार्यवाही पूरी कर ली गई है, वह कोलकाता में पंजीकृत है। इस कंपनी को भोपाल में सालों तक मेडिकल रिप्रजेंटेटिव का काम करने वाले एस.के. पंडित ने खरीद लिया। पंडित 2008 से वित्तीय संस्था का कामकाज देख रहे हैं। कंपनी की नेटवर्थ कुछ लाख रुपये की है। अपेक्स बैंक को विदेशी संस्था से 6500 करोड़ का कर्ज दिलाने के एवज में पंडित को दो प्रतिशत कमीशन मिलना है। व‌र्ल्ड केपिटल स्टेटजी कार्पोरेशन के वाइस प्रेसीडेंट रार्बड कोहने और पंडित के बीच हुए पत्राचार में इस कमीशन का उल्लेख है। कैसे हासिल होगा बैंक को लोन अपेक्स बैंक ने 16 दिसंबर 2009 को कृषकों की गिरवी रखी जमीन अचल संपत्ति और 1699.09 करोड़ की नगद प्रतिभूतियों का प्रमाण पत्र दिया है। इसके आधार पर महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड द्वारा 688.42 करोड़ रुपये मूल्य का एसजीएल खाते का प्रमाण पत्र जारी किया गया। संपत्ति ब्लाक करने का आश्र्वासन भी बैंक द्वारा लिखित में दिया गया। सूत्रों ने बताया कि कर्ज लेने वाला बैंक किसी वित्तीय संस्थान पर स्वयं बैंक गारंटी जारी नहीं कर सकता। इस कारण वचन पत्र जारी किया गया। अपेक्स बैंक द्वारा 19 अप्रैल 2010 को स्पीड स्टार एजेंसीज प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में 6500 करोड़ रुपये मूल्य का अखंडनीय टर्म प्रामिसरी नोट (एक ऐसा दस्तावेज जो लोन के सबूत के तौर पर लिखित रूप में सौंपा जाता है) भी जारी कर दिया गया। स्पीड स्टार एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड दस साल बाद महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के माध्यम से बैंक आफ इंडिया, लंदन में इस नोट को प्रस्तुत कर 6500 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त कर सकती है। क्या है सब्सिडियरी जनरल लेजर अकाउंट (एसजीएल) आरबीआइ द्वारा बड़े बैंकों और वित्तीय संस्थानों को दी जाने वाली वह सुविधा जिसके जरिए वे सरकारी बांडों और ट्रेजरी बिल को इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में रख सकते हैं। एसजीएल खाते के जरिए इन सिक्योरिटीज की डिलीवरी देकर भुगतान प्राप्त किया जा सकता है।

सहकारी बैंक ने विदेश में गिरवी रखी जमीन

भोपाल मध्यप्रदेश की शीर्ष सहकारी बैंक (अपेक्स बैंक) ने किसानों से इजाजत लिए बगैर उनकी 2 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा कीमत वाली जमीन को विदेश में गिरवी रख दिया है। जमीन एक ऐसी संस्था को गिरवी रखी गई है, जो एकदम नई है और बैंकिंग क्षेत्र के लोग भी इसके बारे में नहीं जानते। स्पीड स्टार एजेंसीज प्राइवेट लिमिटेड नामक इस संस्था से अपेक्स बैंक ने 6500 करोड़ रुपये का कर्ज लेने का अनुबंध किया है। मामले की भनक लगते ही पूरा सरकारी तंत्र और जांच एजेंसी सक्रिय हो गई हैं। यह प्रदेश का सबसे बड़ा घोटाला साबित हो सकता है। इस घोटाले के तार महाराष्ट्र के सहकारी बैंक से भी जुड़े प्रतीत हो रहे हैं। अपेक्स बैंक के अध्यक्ष भंवर सिंह शेखावत ने कहा कि हमने किसानों की जमीन गिरवी नहीं रखी है। कर्ज के दस्तावेजों को भी उन्होंने झुठला दिया। वित्त विभाग के प्रमुख सचिव जी.पी. सिंघल ने कर्ज के मामले की पुष्टि करते हुए कहा कि मामले की जांच की जा रही है। क्या बैंक को सीधे विदेशी संस्था से कर्ज लेने का अधिकार है? इस पर सिंघल ने कहा कि इसका जवाब सहकारिता विभाग देगा। सहकारिता विभाग के प्रमुख सचिव मदन मोहन उपाध्याय ने कहा कि मामला उनकी जानकारी में है। सरकार प्रकरण को देख रही है। सूत्रों ने बताया कि वित्त विभाग के प्रमुख सचिव जी.पी. सिंघल ने बुधवार को पूरी डील के बारे में एक नोट अपर मुख्य सचिव सहकारिता आभा अस्थाना को भेजा है। इस नोट में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही करने के लिए कहा गया है। वित्त विभाग ने पूरे मामले को षड्यंत्र करार दिया है। सूत्रों ने बताया कि आज पूरे दिन मंत्रालय में इस मामले से निपटने के लिए उच्च स्तरीय बैठक चलती रही। मुख्य सचिव अवनि वैश्य खुद पूरे मामले पर निगरानी रखे हुए थे। सूत्रों ने बताया सरकार ने विधि विभाग से पूछा है कि अखण्डनीय वचन पत्र को समय से पूर्व निरस्त कैसे किया जा सकता है। सरकार को आशंका है कि इस वचन पत्र का उपयोग कर किसानों की जमीनें हड़पी जा सकती हैं। सरकार मामले की जांच आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो से कराने पर भी विचार कर रही है। इस घोटाले के सामने आने के बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दिक्कतें बढ़ने वाली हैं। यह घोटाला ऐसे वक्त में सामने आया है, जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की संस्था भारतीय किसान संघ की त्यौरियां चढ़ी हुई हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री चौहान कांगे्रस के महासचिव दिग्विजय सिंह को घेरने के लिए उनके शासनकाल में हुए 714 करोड़ रुपये के आइसीडी घोटाले की फाइल खोले हुए बैठे हैं।

Tuesday, December 28, 2010

भ्रष्टों का समाज

नए अपराधियों को हमारा समाज सम्मान क्यों देता है

पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली में एक पांचमंजिला भवन धराशायी हो गया था। उसी हादसे के आसपास राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला और 2 जी स्पेक्ट्रम बंटवारे में घोटाले के मामले सामने आए। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन सभी घोटालों से मीडिया और आम लोगों का ध्यान भी धीरे-धीरे हटने लगा है। सचाई यह है कि आज बड़ा से बड़ा अपराध भी लोगों की स्मृति से कुछ ही दिनों में उतर जाता है।
अगर हम इतिहास में झांकें, तो पाएंगे कि अपराध मानव समाज में युगों से है। वेदों में हमें अनार्यों द्वारा आर्यों की संपत्ति चुराने का जिक्र मिलता है। मगर वह चोरी अंधेरे में होती थी। इसलिए हम सूर्य, चंद्रमा, ऊषाकाल, प्रकाश आदि की अभ्यर्थना पाते हैं। धर-धान्य, मवेशी आदि की चोरी प्राचीन काल से होती आई है। बदमाश, जेबकतरे, डाकू आदि नए नहीं हैं। यहां ध्यान रखने की बात यह है कि शिकार बनाने और शिकार बनने वाले, दोनों की पहचान स्पष्ट होती है। मसलन, जेबकतरा जब आपकी जेब काटता है, तो उसे अपने शिकार का पता होता है।
अपराध के स्वरूप और उसके विभिन्न आयामों में परिवर्तन 19वीं सदी में देखने में आया, जब आधुनिक पूंजीवाद का उदय हुआ। इनकी चर्चा हमें चार्ल्स डिकेंस, बाल्जाक, एमिल जोला आदि साहित्यकारों की कृतियों में मिलती है। मगर पहली बार इनका वैज्ञानिक विश्लेषण अमेरिकी समाजशास्त्री एडवर्ड अल्सवर्थ रौस ने पिछली सदी के प्रथम दशक में किया। द क्रिमिनलोयाड नाम से उनका मशहूर शोधपत्र द एटलांटिक मंथली के जनवरी 1907 अंक में प्रकाशित हुआ।
उनके मुताबिक, जिन नए किस्म के अपराधियों का उदय हुआ है, उन्हें समाज सामान्यतया कर्मठ, बुद्धिमान और सफल मानता है और उन्हें सम्मान भी देता है। आम अपराधियों के विपरीत इनकी गिरफ्तारी को दबा दिया जाता है। ध्यान से देखें, तो वे परंपरागत अपराधियों से अधिक खतरनाक होते हैं। वे समाज और राजकोष को ही अधिक क्षति पहुंचाते हैं, जिसका असर लंबे समय तक महसूस किया जाता है।
ऐसा इसलिए नहीं होता कि समाज उनका चापलूस होता है। इसका मूल कारण है कि उनके अपराध नए हैं और पूंजीवाद के आधुनिक रूप के साथ आए हैं। इन अपराधों को अंजाम देने वालों के लक्ष्य उस तरह स्पष्ट नहीं होते, जिस तरह किसी बदमाश या जेबकतरे के होते हैं। इनके दुष्परिणाम भी तुरंत प्रकट नहीं होते। अगर कोई अभिजात व्यक्ति किसी को गाड़ी से कुचल दे, समय समाप्त होने के बाद शराब परोसने से मना करने वाली परिचारिका को गोली मार दे या अपनी पत्नी की हत्या कर दे, तो भारी हंगामा मचता है। लेकिन रिश्वतखोरी के कारण घटिया निर्माण सामग्रियां इस्तेमाल करने वाला या रिश्वत लेकर ठेका देने में पक्षपात करने वाला समाज और मीडिया की भर्त्सना का कभी-कभार ही शिकार होता है। आजादी के बाद बिहार में भूमि सुधार कानूनों की धज्जियां उड़ाकर राज्य को पिछड़ेपन की गर्त में धकेलने और करोड़ों लोगों को विपन्न जीवन बिताने के लिए मजबूर करने वालों की सामाजिक प्रताड़ना तक न हुई। उलटे वे अधिकाधिक संपन्न होकर सत्ता पर हावी हो गए। इसका मूल कारण यह है कि परंपरागत किस्म की नैतिकता हमारे ऊपर हावी है।
आधुनिक औद्योगिक पूंजीवाद काफी जटिल है। बाजार ने सारे कार्य-व्यापार को इतना जटिल बना दिया है कि सतह के नीचे क्या हो रहा है, यह जान पाना सबके बूते की बात नहीं है। नई वित्तीय व्यवस्था और विधिशास्त्र की जटिलताओं ने आपराधिक कृत्यों को काफी हद तक छिपाया है। बाजार में ऐसे विशेषज्ञ आ गए हैं, जो बताते हैं कि करों तथा अन्य चीजों की चोरी कैसे निरापद रूप से की जाए। चोरी के धन को कहां छिपाया जाए या धो-पोंछकर कैसे कानूनी कारोबार में लगाया जाए। ऐसी एक बड़ी प्रभावशाली जमात का जन्म हुआ है, जिसका काम नए प्रकार के अपराधों पर परदा डालना, सत्तारूढ़ लोगों को प्रभावित करना तथा अपराध में लिप्त लोगों की छवि को मनोहारी बनाना है। व्यवसायियों, नौकरशाहों और राजनेताओं के बीच एक गठबंधन बन गया है। आजादी के बाद ही नए किस्म के दलाल सत्ता के गलियारों में दिखते आ रहे हैं।
परंपरागत अपराधियों के विपरीत नए किस्म के अपराधी सामाजिक रूप से सक्रिय होते हैं। कई तो धार्मिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक अवसरों तथा राहत कार्यों के दौरान तिजोरी खोल खुद को लोकप्रिय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ये राजनेताओं के चुनाव अभियान में भी भरपूर मदद करते हैं।
नए प्रकार के ये अपराधी अपने संसाधनों और प्रभाव के बूते ऐसा सामाजिक एवं राजनीतिक सम्मान और दबदबा हासिल कर लेते हैं, जो किसी आम चोर-डाकू को कभी मयस्सर नहीं हो सकता। एक डाकू या हत्यारा किसी व्यक्ति से उसकी कमाई या जिंदगी छीन लेता है, मगर समाज के आदर्शों को स्थायी रूप से कोई क्षति नहीं पहुंचाता, जबकि वित्तीय हेराफेरी करने वाले का अपराध पूरा समाज भुगतता है।
नए किस्म के अपराधी आम तौर पर संवेदनहीन होते हैं, क्योंकि उनको पता नहीं कि शिकार कौन और कब बनेगा। सौ वर्ष के लिए बना पुल अगर घटिया सामान के कारण बीस वर्षों में धराशायी हो जाता है, तो बनाने वाले को मालूम नहीं होता कि इससे कितनी जानें जाएंगी। इसी प्रकार सरकारी खजाना लूटनेवाले को यह भान नहीं होता कि पैसे के अभाव में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलने से किसे हानि होगी। इसके बावजूद नए किस्म के अपराधियों के अपराध को समाज और सरकारें गंभीरता से नहीं लेतीं, तो इससे बड़ी विडंबना और कुछ नहीं है।