पिछले महीने दावोस में मेरी मुलाकात एक मशहूर व्यापारी से हुई। उस समय अपने देश में यह बात सुर्खियों में थी कि स्विट्जरलैंड के बैंकों के गुप्त खातों सबसे ज्यादा पैसा भारत से आया है, तो मैंने अपने स्विस मित्र से पूछा कि क्या ऐसा मुमकिन है? उन्होंने पहले तो मेरी तरफ देखकर जांचा कि मैं सवाल गंभीरता से पूछ रही हूं या मजाक में। जब उन्होंने देखा कि सवाल गंभीरता से पूछा जा रहा है, तो वह हंसने लगे। फिर उन्होंने कहा, ‘अगर ऐसा होता, तो यकीन कीजिए कि स्विट्जरलैंड के बैंक बंद हो जाते, क्योंकि भारतीयों के पास इतना पैसा है ही नहीं। हमारे बैंकों का कारोबार चलता है यूरोप के धन से। नंबर दो पर शायद अरब देशों का पैसा है और उसके बाद आती है अमेरिका की बारी। यह भारत वाली बात आपको बताई किसने?’
वापसी दिल्ली आने के बाद मैंने अपने तौर पर थोड़ी तहकीकात की यह जानने के लिए कि यह बात फैली कहां से है? इस खोजी पत्रकारिता से कुछ ज्यादा हासिल न हुआ, लेकिन इतना मालूम पड़ा कि यह खबर जान-बूझकर कोई फैला रहा है, हमें-आप को बहकाने के लिए। काला धन हमारे राजनेताओं को आजकल स्विट्जरलैंड में छिपाने की जरूरत नहीं है। मैं यह नहीं कह रही हूं कि भ्रष्ट नेता लोग अपना पैसा स्विस बैंकों में जमा नहीं कर रहे हैं। वे थोड़ा बहुत पैसा जरूर जमा कर रहे होंगे, लेकिन उनका असली माल यहीं है अपने देश में। कुछ मुंबई-दिल्ली की नई इमारतों में निवेश कर दिया गया है, कुछ शिक्षा संस्थानों के बहाने जमीन हासिल कर लेने में, कुछ पत्नियों के गहनों में, लेकिन ज्यादा पैसा निवेश हो चुका है बिजनेस में। आज तकरीबन हर राजनीतिक परिवार में एक ऐसा सदस्य दिख जाता है, जिसे बिजनेस में माहिर कहा जाता है।
कुछ तो अचानक इतने सफल हो जाते हैं व्यवसाय-व्यापार में कि मुकेश अंबानी को भी पीछे छोड़ देते हैं। आंध्र प्रदेश के दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगन का कमाल देखिए। पिछले वर्ष उन्होंने 84 करोड़ रुपये का टैक्स भरा। पूर्व वर्ष के हिसाब से यह 1,100 प्रतिशत की बढ़ोतरी थी। और उससे दो वर्ष पहले का अगर टैक्स देखें जगन जी का, तो केवल 2.91 लाख था। ऐसे में इनकम टैक्स वाले क्यों नहीं जगन रेड्डी के धन की तहकीकात कर रहे हैं? क्यों नहीं मालूम कर रहे हैं कि करुणानिधि परिवार के पास इतना पैसा कहां से आया है? मायावती के गले में पैसों के उस हार को हम क्यों भूल गए हैं इतनी जल्दी?
काला धन अगर हम वास्तव में ढूंढ निकालना चाहते हैं, तो क्यों नहीं हम मालूम कर रहे हैं कि राजनीतिज्ञों की पत्नियां आजकल इतनी अमीर कैसे हो गई हैं? चुनाव के समय जब अपने धन के बारे में खुलासा करते हैं अपने नेतागण चुनाव आयोग के सामने, क्या आपने गौर किया है कि नेताजी बेशक गरीब, बे-कार और बेघर हों, लेकिन उनकी पत्नियों के पास कभी कोई कमी नहीं होती है मोटरगाड़ी, बंगले या गहनों की? यह कैसे? कैसे मिल जाती है हमारे गरीब नेताओं को हमेशा इतनी अमीर बीवियां?
इन सवालों के जवाब तो मैं दे नहीं सकती, लेकिन निजी तौर पर यह जरूर कह सकती हूं कि मैंने अपनी आंखों से राजनीतिज्ञों को अमीर होते देखा है संसद में पहुंचने के बाद। मैं ऐसे पत्रकारों को जानती हूं, जिनके पास कुछ नहीं था राजनीति आने से पहले और जो राजनीति में कदम रखते ही इतने अमीर हो जाते हैं कि हम उनके गरीब साथी देखते ही रह जाते हैं।
वैसे काले धन का भंडार देखना हो, तो यह दिल्ली की राजनीतिक कोठियों में दिख सकता है, जब चुनाव करीब आते हैं। मैं यहां तक कहने को तैयार हूं कि यदि काला धन न हो, तो अपने भारत महान में चुनाव के लिए पैसा ही न हो। मैं कोई नई बात नहीं कह रही हूं। वही बातें कह रही हूं, जो दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सब जानते हैं, लेकिन कोई ये बातें सार्वजनिक तौर पर कहना नहीं चाहता, क्योंकि कहीं सुप्रीम कोर्ट तक न पहुंच जाए मामला। पुणे के व्यापारी को लेकर देखिए, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते कैसी फटकार लगाई है सरकार को।
इसलिए काले धन के गहरे राज राज ही रह जाएं, तो अच्छा है। लेकिन मेहरबानी करके जब अगली बार आपको कोई विदेशी देशों से काला धन वापस लाने की बातें कहे, तो कान बंद कर लीजिएगा। ऐसी बातें सिर्फ बातें हैं। अपने देश के बेचारे आम आदमी को गुमराह करने का एक व्यापक तरीका। यह बात सब जानते हैं, राजनेता, अधिकारी और हम पत्रकार भी, लेकिन इस देश का आम आदमी इतना नादान है आज भी कि उसको गुमराह करना राजनेताओं के लिए बाएं हाथ का खेल है। वह नहीं जानता कि काला धन न होता, तो राजनीतिक दलों का कारोबार न चलता, काला धन न होता तो शायद भारतीय लोकतंत्र का कारोबार भी बंद हो जाता।

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