वर्ष 1995 में भारत विश्व के देशों में भ्रष्टाचार की पंक्ति में सातवें स्थान पर था। इसके बाद उसका यह स्थान और नीचा होता गया। इसका कारण यह नहीं रहा कि भारत में भ्रष्टाचार कम हुआ, बल्कि भारत जैसे देशों की देखा-देखी अन्य देशों में भ्रष्टाचार बढ़ता गया। भ्रष्टाचार से लड़ने का सबसे सीधा उपाय कानूनी लड़ाई है। हम आकलन करें कि किस प्रकार का विधि चक्रव्यूह भ्रष्ट लोगों को पकड़ने के लिए सक्षम है। भ्रष्टाचारी को पकड़ने और भ्रष्टाचार को रोकने का जितना सटीक प्रावधान भारतीय दंड संहिता यानी आइपीसी की धारा 161 में था, वैसा कहीं नहीं है। इसका सारांश है कि भ्रष्टाचार में पैसा देने वाला व्यक्ति उतना ही अपराधी है, जितना कि पैसा लेने वाला। पर हम सन् 1860 से प्रभावी भारतीय दंड संहिता के सृजक मैकाले को गाली-गलौज करते रहे, जिनमें भारतीय बुद्धिजीवी अग्रणी थे, पर हमने उसका उपयोग देश हित में नहीं किया। आधुनिक भारत के तथाकथित निर्माता उद्योगपतियों ने इस प्रावधान की धज्जियां उड़ाई और मैकाले का मखौल। क्योंकि वे येन-केन प्रकारेण प्रतियोगिता में आगे बढ़ना चाहते थे। उन्होंने गांधी के इस संदेश की अनदेखी की कि साध्य को प्राप्त न करने वाले साधन भी सामान रूप से सत होना चाहिए। अब वे ही उद्योगपति भ्रष्ट तंत्र का रोना रो रहे हैं तथा बहुउद्देशीय कंपनियों के नेतृत्व में आगे बढ़ना चाहते हैं। वर्ष 1947 में भारत में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम अस्तित्व में आया, लेकिन वह भी मकसद में कामयाब न हो सका। दोष किसे दिया जाए? क्या हमारी जांच एजेंसियां दोषी हैं या अदालतें? दोनों को समान रूप से दोषी ठहराना उचित होगा। इसके ऊपर हमारे विद्वान अधिवक्तागण हैं, जो बाल की खाल निकालते-निकालते तलहटी तक चले जाते हैं और न्यायाधीश उनके तर्को के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पाते। इस अधिनियम में विशेष अदालतों का प्रावधान नहीं था। इस कारण यह अधिनियम भी भारत की अदालतों में विलंबित मामलों के नीचे दबकर मर गया। भारत सरकार वर्ष 1988 में फिर से संशोधित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988 लाई। इस अधिनियम में एक प्रावधान उत्तम है कि किसी भी सरकारी सेवक को आमदनी से अधिक धन संग्रह करने पर भी आरोपित किया जा सकता है। पर यह बात और है कि पुलिस या जांच एजेंसियां रिश्वत के बिरले मामलों को सिद्ध कर पाती हैं। कई बार तो ये अपने आकाओं को खुश करने तथा सस्ती प्रशंसा पाने के लिए जांच को अलग दिशा में मोड़ देती हैं। और कई बार ऐसा भी देखा गया है कि भ्रष्टाचार के आरोप राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के उद्देश्य से प्रेरित होते हैं। आज जरूरत यह है कि जो मैकाले ने सोचा था कि रिश्वत देने वाला भी समान रूप से दोषी हो, क्योंकि यदि व्यक्ति रिश्वत न दे तो भ्रष्टाचार कैसे पनपेगा। हां, जहां रिश्वत लेने की शुरुआत या दबाव किसी सरकारी सेवक से आए तो उस दशा में रिश्वत देने वाले को दोषी न करार दिया जाए, क्योंकि वह सरकारी सेवक की क्षमता के सामने खड़ा नहीं रह सकता है। यह अधिनियम ही आज देश में भ्रष्टाचार निवारण का प्रमुख हथियार है, जिसमें विशेष न्यायाधीशों की व्यवस्था है, जो बीस साल बाद भी नियुक्त न हो सके। हमेशा सरकारों को दोष देना भी उचित नहीं है। भारत सरकार ने त्वरित न्यायालयों की स्थापना की, धनराशि भी राज्य सरकारों को अनुदान स्वरूप दी, लेकिन राज्य सरकारें सभी न्यायालयों में रिक्त स्थान न भर सकीं। जिन्होंने रिक्तियां पूरी की भी, वे पदस्थ न्यायाधीशों से की गई। फलत: सामान्य-न्यायालयों में विलंब बढ़ गया और जनता द्वारा आलोचना होने लगी। राज्य सरकारें भी क्या करें? इन त्वरित न्यायालयों के लिए केंद्र सरकार के धन की धारा बंद होने पर इन न्यायाधीशों का खर्च राज्य सरकारें कैसे चलाएंगी? लगता है कि तंत्र को खराब करना राज्य सरकारों के अधिकार में है और उसे सुधारने का कर्तव्य केंद्र सरकार का है। फिर राज्य सरकारें अपने राज्य में न्यायालयों द्वारा विलंब तथा धन के खर्च का उचित हिसाब-किताब न देने का कारण दर्शाती हैं। वैसे तो भ्रष्टाचार की कोई एक वजह नहीं है। चाहे निजी क्षेत्र हों, शिक्षा क्षेत्र हो या स्वास्थ्य क्षेत्र अथवा औद्योगिक क्षेत्र। जो डोनेशन के नाम पर रिश्वत देकर शिक्षा ग्रहण करेंगे वे नौकरी मिलते ही रिश्वत के मौके की तलाश में जुट जाएंगे। पर अफसोस कि भ्रष्टाचार का कानून काफी धारदार होने के बावजूद चंद पेचिदगियों और सरकारी लापरवाही के चलते कारगार नहीं हो पाता। यह अच्छी बात है कि देश में तंत्र की विफलता के लिए जनता ने दूसरों को दोष देना कम कर दिया है और नेताओं से संजीवनी की आशा करनी भी छोड़ दी है। अब जनता ने देश का भविष्य संजोने-संवारने का बीड़ा खुद उठा लिया है। भ्रष्टाचार सहित देश की सभी प्रमुख समस्याओं से निबटने की जिम्मेदारी उसने खुद अपने हाथों में ली है। लोकपाल विधेयक 1998 के तहत कहीं-कहीं लोकायुक्त अति सक्रिय हैं। इसी प्रकार कभी-कभी सक्रियता की किरणें मध्य प्रदेश समेत कुछ राज्यों से निकलती हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के विराट आकाश में वे शीघ्र समा जाती हैं। इसी प्रकार केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रपटें सदैव सरकार के विरुद्ध होती रही हैं, लेकिन उन पर कुछ तो ध्यान दिया ही जा सकता है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में पहली बार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की जांच ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कुछ बुलबुले पैदा किए। आशा है कि सरकार का यह अंग भी इसी तरह भविष्य में सक्रिय रहेगा। जांच आयोग अधिनियम, 1992 के अंतर्गत भी भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए कई आयोगों का गठन हुआ, लेकिन उनमें से अधिकांश आयोगों की ओर से सुझावों एवं प्रतिवेदनों पर सरकारों द्वारा समुचित कार्रवाई नहीं की गई, क्योंकि आयोगों की रपटों पर कार्रवाई करने के लिए नौकरशाहों द्वारा आंतरिक समिति गठित की जाती है और उस समिति द्वारा विचार-विमर्श में समय लगता है। कुछ महीनों में सभी भूल जाते हैं और सचिवालयों में उन रपटों पर धूल जमती रहती है। आयोगों की जांच में अनावश्यक विलंब और उनके सुझावों पर उससे अधिक देर के कारण आयोगों पर से जनता का विश्वास उठता जा रहा है। कहा जाता है कि आयोग जनता का ध्यान बंटाने और उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के चहेते न्यायाधीशों को अवकाश प्राप्ति के बाद नौकरी देने के लिए गठित किए जाते हैं। पता नहीं भारत के न्यायाधीशों ने देश की कौन-सी जलवायु ग्रहण की है कि वे लंबी उम्र तक सेवारत रह सकते हैं। उत्तम हो कि सेवारत न्यायाधीशों को इन आयोगों में नियुक्त किया जाए, जैसी कि यह परंपरा अन्य देशों में है। (लेखक पूर्व आइएएसहैं)
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