Tuesday, March 29, 2011

भारत की गिरती साख


संप्रग शासन में घपले-घोटालों के सिलसिले से दुनिया में भारत की नकारात्मक छवि बनती देख रहे हैं लेखक
क्या संप्रग-2 के पापों से सरकार और कांग्रेस की ही हानि हुई है? इस पाप का हिसाब तो जनता उचित समय पर ले लेगी, किंतु वास्तविक हानि तो भारत की हुई है, जो अपूरणीय है। पिछले दिनों मैं लंदन प्रवास पर था। वहां के बुद्धिजीवियों से हुई बातचीत और भारत के संदर्भ में स्थानीय समाचारपत्रों में जो खबरें पढ़ीं, उनसे भारत की नकारात्मक छवि बनने का ही संकेत मिलता है। कुछ पाश्चात्य समीक्षक तो भारत का हश्र रूस की तरह होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं, जहां आर्थिक विकास के लिए नागरिकों को अपनी व्यावसायिक बुद्धि, कार्यदक्षता और परिश्रम के सहारे न रहकर भाईभतीजावाद पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था और अपराधियों पर आश्रित रहना पड़ता है। लंदन से प्रकाशित फाइनेंसियल टाइम्स के 22 मार्च के संस्करण में भारत से संबंधित एक समीक्षा छपी थी, जिसका शीर्षक था-राइटिंग इज ऑन द वाल। नीचे राष्ट्रमंडल खेलों के लोगो के साथ दीवार पर लिखा था, स्पो‌र्ट्स (पास), गवर्नमेंट (फेल)। खबर में आगे भ्रष्टाचार के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को पहुंच रही क्षति और उसके कारण भारत की गिरती वैश्विक छवि की विस्तृत समीक्षा छपी थी। साथ ही ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के उक्त पत्र का भी हवाला था, जो उन्होंने फरवरी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा था। पिछले साल भारत दौरे पर आए कैमरन ने भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संपर्कों को नया आयाम देने की बात की थी, किंतु ब्रितानी निवेशकों को यहां जिस तरह की लालफीताशाही झेलनी पड़ रही है उससे एक साल में ही उनका मोहभंग हो गया है। कैमरन ने आर्थिक सुधारों के पितामह मनमोहन सिंह से दो-टूक पूछा, क्या नौकरशाहों और कुछेक शक्तिसंपन्न व्यापारिक घरानों द्वारा अर्थव्यवस्था का गला घोंट डालने वाला लाइसेंसी राज आज भी कायम है? कैमरन अकेले नहीं हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के मुंबई स्थित मुख्य अर्थशास्त्री समिरन चक्रवर्ती ने अपने हाल के अमेरिकी दौरे के दौरान निवेशकों में भारत के प्रति निराशा देखी। उपरोक्त आर्थिक समीक्षा में जमशेद गोदरेज, केशव महिंद्रा, बैंकर दीपक पारिख, अजीम प्रेमजी जैसे उद्योगपतियों द्वारा भारत में व्याप्त लालफीताशाही और भ्रष्ट नौकरशाही पर गहरी चिंता व्यक्त किए जाने का उल्लेख है। इन उद्योगपतियों ने अपने एक खुले पत्र में लिखा था, सरकार, व्यापार, संस्थागत कायरें आदि राष्ट्रीय जीवन के प्राय: हर क्षेत्र से गायब होते सुशासन से हम गहरे चिंतित हैं। कैमरन की आशंका निराधार नहीं है। राडिया फोन टेप प्रकरण से वर्तमान सत्ता अधिष्ठान में कुछेक व्यापारिक घरानों की गहरी दखलंदाजी का ही खुलासा हुआ था। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की लारा अल्फारो और नार्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय की अनुशा चारी ने आर्थिक सुधारों के प्रभावों का अध्ययन किया है। उन्होंने लिखा है, उदारीकरण के दौर से पूर्व जो कंपनियां बाजार में उपस्थित थीं उन्होंने बदली अर्थव्यवस्था में भी नए प्रतिस्पर्धियों से ज्यादा लाभ अर्जित करना जारी रखा। प्रसिद्ध समीक्षक ब्रह्मा चेलानी का कहना है कि आर्थिक सुधारों से उदारीकरण की स्वाभाविक अपेक्षा थी, किंतु इससे वास्तव में भ्रष्ट राजनेताओं के ही वारेन्यारे हुए। रूस में सन 2000 में करोड़पतियों की संख्या एक हजार थी, जो 2010 में बढ़कर 21,000 हो गई। वहीं भारत में सन 2000 में जहां 4000 करोड़पति थे, वहीं 2010 में करोड़पतियों की संख्या 26,000 हो गई। फो‌र्ब्स पत्रिका के अनुसार एक अरब बीस करोड़ की आबादी वाले इस देश में 69 अरबपति हैं। उनकी संपत्ति देश के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 30 प्रतिशत से भी अधिक है। सन 2009 में एशियन डेवलपमेंट बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश के पचास अरबपतियों के पास जीडीपी के 20 प्रतिशत से भी अधिक की संपत्ति और स्टॉक मार्केट की 80 फीसदी पूंजी है। संसाधनों और सत्ता के अत्यधिक नियंत्रण के कारण विकास और सुधार, दोनों पर स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल असर पड़ता है। संप्रग-2 के पतन का कारण संप्रग सरकार की पहली पारी में कम्युनिस्टों के समर्थन वापस ले लिए जाने के बाद सत्तासुख भोग के लिए की गई सौदेबाजी है। अल्पमत में आ गई सरकार को सदन में विश्वासमत हासिल करना था। संप्रग सरकार ने नोट के बदले वोट खरीद कर सदन में बहुमत साबित कर दिया। अब विकिलीक्स ने यह खुलासा किया है कि मनमोहन सिंह की सरकार ने सांसदों को घूस देकर विश्वासमत हासिल किया था। इस खुलासे के बाद सदन में प्रधानमंत्री ने अपनी सफाई में कहा है कि वोट की खरीद-फरोख्त नहीं हुई, जबकि नोट के बदले वोट की जांच के लिए गठित किशोरचंद देव समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सांसदों को रिश्वत दी गई थी। रिश्वत के लिए करोड़ों रुपयों की धनराशि कहां से आई? इसमें किन व्यापारिक घरानों का हाथ था? इस उपकार के लिए संप्रग-2 ने सरकार बचाने वाले व्यापारिक घरानों के व्यावसायिक हितों को न केवल पहली प्राथमिकता दी, बल्कि नीति-निर्धारण में उन कंपनियों की अनुचित दखलंदाजी को भी चुपचाप सहा। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हुई अनियमितता की जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित शुंगलू समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। खेल गांव के अंदर हजार फ्लैटों के निर्माण में निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन के लिए शुंगलू समिति ने दिल्ली के राज्यपाल को दोषी ठहराया है, वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री को भी घोटालों का जिम्मेदार भी ठहराया है, किंतु वास्तविकता यह है कि केंद्रीय सत्ता शिखर भ्रष्टाचारियों के संरक्षण में खड़ा है। शुंगलू समिति की रिपोर्ट पर कार्रवाई न कर प्रधानमंत्री संबंधित विभागों से उनकी टिप्पणी मांग रहे हैं। ऐसे में समिति गठित करने का क्या लाभ? क्या यह महज लीपापोती करने का प्रयास नहीं है? आइपीएल, राष्ट्रमंडल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम, सेटेलाइट स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसाइटी घोटाला, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर दागदार व्यक्ति की नियुक्ति और इन सब घोटालों से प्रधानमंत्री के अनजान होने की मासूम दलील से मनमोहन सिंह के साथ-साथ समूची संप्रग सरकार की विश्वसनीयता धुल चुकी है। प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार के मुखिया हैं। कल तक जिस देश को अत्यंत ऊर्जावान और उदीयमान सशक्त अर्थव्यवस्था के रूप में दुनिया सम्मान के भाव से देख रही थी और देश-विदेश के निवेशक यहां पूंजी निवेश के लिए उत्सुक थे, आज पूरी दुनिया उसे भ्रष्ट देश के रूप में देख रही है। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)

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