विदेशी बैंकों में अरबों की राशि रखने के मामले में घिरे हसन अली खान को केंद्र सरकार का समर्थन काफी पुराना है। वर्ष 2009-10 में आयकर विभाग ने हसन अली को 3250 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचाने की कोशिश की। दरअसल, उस पर बकाया कर की राशि के तौर पर 4056 करोड़ रुपये का ब्याज बतौर जुर्माना लगाया जाना था, लेकिन आय कर विभाग ने सिर्फ 706 करोड़ रुपये का ही जुर्माना तय किया था। इस बात का खुलासा सीएजी की एक रिपोर्ट में हुआ है, जिसे शुक्रवार को सदन पटल पर रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक छह वर्षो (वर्ष 2001-02 से वर्ष 2006-07) के दौरान पुणे स्थित इस व्यापारी की आय 529 करोड़ रुपये से बढ़ कर 54,298 करोड़ रुपये हो गई। लेकिन इस दौरान उसने कर भुगतान में खूब गड़बडि़यां कीं। अली ने वर्ष 2001-02 से लेकर 2003-04 और फिर 2005-07 में कर का भुगतान नहीं किया। लेकिन बाद में जब आयकर विभाग ने उस पर दबिश दी तो मई, 2007 में एकमुश्त कर अदायगी की। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2009-10 में देश भर में कुल दो लाख करोड़ रुपये की राशि बतौर आयकर बकाया थी। इसमें से लगभग 35 फीसदी यानी 71,874 करोड़ रुपये की राशि सिर्फ हसन अली समूह पर बकाया थी। इस पर ब्याज का आकलन करने में आयकर विभाग ने काफी गड़बडि़यां की हैं। सीएजी के मुताबिक हसन अली पर अग्रिम कर की गणना तो वास्तविक राशि (9756.9 करोड़ रुपये) से ज्यादा (10,033.3 करोड़ रुपये) की गई है। लेकिन समय पर रिटर्न नहीं भरने के मामले में बकाया आयकर पर ब्याज लगाने के मामले में हसन अली पर 3250 करोड़ रुपये कम बोझ डाला गया। सीएजी की रिपोर्ट हसन अली को बचाने का आरोप झेल रही केंद्र सरकार की मुश्किलें और बढ़ा सकती है। विपक्षी दलों को सरकार पर आक्रमण करने का एक और मौका मिल गया है। हसन अली मामला सरकार के लिए काफी परेशानी पैदा कर रहा है। सरकार पर विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि वह हसन अली को बचाने में जुटी है। जबकि उसके तार विदेशी बैंकों में जमा राशि और हथियारों की खरीद-फरोख्त करने वालों से जुड़े हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले पर केंद्र सरकार को झाड़ लगाई थी। दरअसल, निचली अदालत ने तो हसन अली को जमानत भी दे दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को न केवल उसकी जमानत खारिज कर दी बल्कि निचली अदालत के न्यायाधीश पर तीखी टिप्पणियां भी कीं। इसके बाद हसन अली ने प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है|
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