हमारी सरकार अपनी मुद्रा को जितना सुरक्षित बनाने के उपाय करती है, उसे भारत के दुश्मन उसी गति से तार-तार कर देने को तत्पर हैं। हाल ही में आई अमेरिका की एक आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पड़ोसी पाकिस्तान से नकली मुद्रा की बाढ़ सी आ गई है। रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब देश में यह मांग तेजी से उठ रही है कि विदेशी बैंक खातों में धन जमा करने वालों के नाम सार्वजनिक किए जाएं। सरकार ने इस बारे में प्राप्त सूचना जारी नहीं की है। अलबत्ता, राजनीतिक क्षेत्र में तैर रहे बयानों में यह दावा जरूर किया जा रहा है कि यह राशि बीस लाख करोड़ रुपये तक हो सकती है। उन खातों में रखा धन यों तो देश से कमाया गया ‘असली धन’ है जो ‘काले तरीके’ से वहां ले जाकर सुरक्षित रखा गया है परंतु मुमकिन है कि इस धन की कमाई में भी नकली मुद्रा का कोई रोल हो। ‘अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण’ सम्बंधी अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट साफ कहती है कि नकली नोटों का इस्तेमाल आतंकवादी तथा आपराधिक नेटवर्क अपनी गतिविधियां चलाने के लिए करते हैं। इसके अलावा बढ़ते कालेधन तथा त्वरित गति से दूसरी जगहों पर धन भेजने के साथ खुली सीमा में धनशोधन ने भी नकली नोटों के प्रसार के कार्य में आसानी की है। निश्चित ही, नकली मुद्रा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चोट है। सरकार देश में नकली नोटों के प्रचलन की बात तो स्वीकार करती है लेकिन उसने अभी तक ऐसा कोई अनुमान या आंकड़ा नहीं प्रस्तुत किया है जिससे जाना जा सके कि भारत में प्रचलित कारोबार में नकली नोटों का योगदान कितना है? लोग अपने तरीके से इनकी र्चचा और कयासबाजी करते हैं। कुछ क्षेत्रों में कहा जाता है कि पाकिस्तान और नेपाल से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में नकली मुद्रा ने करीब-करीब असली के समानांतर दर्जा बना लिया है। इसी तरह यह खबर भी गम्भीर चेतावनी की तरह है कि नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में गलत कायरे में संलग्न लोग भारत की बैंकों के एटीएम से भारी तादाद में धन की निकासी कर उनका नकली नोटों के लेनदेन में बढ़-चढ़कर इस्तेमाल कर रहे हैं। अमूमन पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के मार्फत देश के विभिन्न भागों से आने वाली खबरें ही यह समझने के लिए काफी हैं कि फर्जी नोटों का बढ़ता प्रसार देश की अर्थव्यवस्था को किस तरह से नुकसान पहुंचा रहा है। दरअसल, नकली नोटों का प्रसार किसी ऐसे माध्यम से तो होता नहीं जिससे सरकारी स्तर पर उनका कोई हिसाब-किताब हो। कोई सरकार सीधे तौर पर नकली नोटों के किसी एकत्रित आंकड़े को जारी करने से बचना भी चाहती है क्योंकि इसके अलग खतरे होते हैं। इसीलिए ऐसी मुद्रा की कहीं, किसी स्तर पर बरामदगी के कुछ समय बाद ही उसे नष्ट कर दिया जाता है। लेकिन अमेरिकी रिपोर्ट हमारे मुद्रा प्रबंधकों को एक चेतावनी की तरह है कि वे इस पर रोक का प्रभावी इंतजाम करने से गरचे चूकते हैं तो इसकी देश को बड़ी कीमत उठानी पड़ सकती है। साथ ही यह सुरक्षा के लिए भी ‘खतरनाक जाल’ बनाएगी।
Monday, March 7, 2011
नकली नोटों का आतंक
हमारी सरकार अपनी मुद्रा को जितना सुरक्षित बनाने के उपाय करती है, उसे भारत के दुश्मन उसी गति से तार-तार कर देने को तत्पर हैं। हाल ही में आई अमेरिका की एक आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पड़ोसी पाकिस्तान से नकली मुद्रा की बाढ़ सी आ गई है। रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब देश में यह मांग तेजी से उठ रही है कि विदेशी बैंक खातों में धन जमा करने वालों के नाम सार्वजनिक किए जाएं। सरकार ने इस बारे में प्राप्त सूचना जारी नहीं की है। अलबत्ता, राजनीतिक क्षेत्र में तैर रहे बयानों में यह दावा जरूर किया जा रहा है कि यह राशि बीस लाख करोड़ रुपये तक हो सकती है। उन खातों में रखा धन यों तो देश से कमाया गया ‘असली धन’ है जो ‘काले तरीके’ से वहां ले जाकर सुरक्षित रखा गया है परंतु मुमकिन है कि इस धन की कमाई में भी नकली मुद्रा का कोई रोल हो। ‘अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण’ सम्बंधी अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट साफ कहती है कि नकली नोटों का इस्तेमाल आतंकवादी तथा आपराधिक नेटवर्क अपनी गतिविधियां चलाने के लिए करते हैं। इसके अलावा बढ़ते कालेधन तथा त्वरित गति से दूसरी जगहों पर धन भेजने के साथ खुली सीमा में धनशोधन ने भी नकली नोटों के प्रसार के कार्य में आसानी की है। निश्चित ही, नकली मुद्रा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चोट है। सरकार देश में नकली नोटों के प्रचलन की बात तो स्वीकार करती है लेकिन उसने अभी तक ऐसा कोई अनुमान या आंकड़ा नहीं प्रस्तुत किया है जिससे जाना जा सके कि भारत में प्रचलित कारोबार में नकली नोटों का योगदान कितना है? लोग अपने तरीके से इनकी र्चचा और कयासबाजी करते हैं। कुछ क्षेत्रों में कहा जाता है कि पाकिस्तान और नेपाल से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में नकली मुद्रा ने करीब-करीब असली के समानांतर दर्जा बना लिया है। इसी तरह यह खबर भी गम्भीर चेतावनी की तरह है कि नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में गलत कायरे में संलग्न लोग भारत की बैंकों के एटीएम से भारी तादाद में धन की निकासी कर उनका नकली नोटों के लेनदेन में बढ़-चढ़कर इस्तेमाल कर रहे हैं। अमूमन पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के मार्फत देश के विभिन्न भागों से आने वाली खबरें ही यह समझने के लिए काफी हैं कि फर्जी नोटों का बढ़ता प्रसार देश की अर्थव्यवस्था को किस तरह से नुकसान पहुंचा रहा है। दरअसल, नकली नोटों का प्रसार किसी ऐसे माध्यम से तो होता नहीं जिससे सरकारी स्तर पर उनका कोई हिसाब-किताब हो। कोई सरकार सीधे तौर पर नकली नोटों के किसी एकत्रित आंकड़े को जारी करने से बचना भी चाहती है क्योंकि इसके अलग खतरे होते हैं। इसीलिए ऐसी मुद्रा की कहीं, किसी स्तर पर बरामदगी के कुछ समय बाद ही उसे नष्ट कर दिया जाता है। लेकिन अमेरिकी रिपोर्ट हमारे मुद्रा प्रबंधकों को एक चेतावनी की तरह है कि वे इस पर रोक का प्रभावी इंतजाम करने से गरचे चूकते हैं तो इसकी देश को बड़ी कीमत उठानी पड़ सकती है। साथ ही यह सुरक्षा के लिए भी ‘खतरनाक जाल’ बनाएगी।
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