देशभर के जाने-माने संत व प्रवचनकर्ता हिमाचल में अपने ठिकाने तलाश रहे हैं। बर्फ की चांदी से ढके पर्वतों के आंचल में संतों को एक अदद आशियाना नसीब होना यहां भू-खरीद की सख्त धाराओं के कारण कठिन है, इसीलिए ट्रस्ट एक बढि़या विकल्प बनकर उभरा है। धर्म या समाज के प्रति सरोकारों के जरिए हिमाचल की प्राइम जगहों पर जमीन लेने और फिर आलीशान संपदा खड़ी करने का चलन बढ़ता जा रहा है। दर्जनों ने तो ट्रस्ट के जरिये बड़े-बड़े भवन बनाए हैं और निगाहें सरकार की कृपादृष्टि पर भी हैं। लिहाजा सरकारी जमीन पट्टे पर लेने के लिए ढेरों आवेदन पहुंच रहे हैं। हिमाचल की शांत वादियों में अधिकांश संत, महात्माओं की दृष्टि उन जगहों पर है जो सुगम हों, लिहाजा कुल्लू या कांगड़ा जिलों में प्राथमिकताएं तय हो रही हैं। सोलन जिले में भी कई धार्मिक न्यासों के नाम पर जमीन तेजी से खरीदी जा रही है। गर्मी आते ही प्रदेश की ठंडी वादियों में कई सत्संग स्थायी कुटिया की इच्छा से भी जुड़े हैं। हाल में सोलन जिले में बाबा रामदेव के न्यास को सरकार ने 96 बीघा भूमि क्या दे दी, अन्य धर्मगुरुओं की आस भी जगी है। सूत्रों के अनुसार पालमपुर के लिए भी ऐसे कागज चलने शुरू हो गए हैं। ट्रस्ट से जुड़े लोग दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। राजनेताओं के इर्द-गिर्द भी प्रयास हो रहे हैं, लेकिन जिनका सरकारी दांव न लगे वह गिफ्ट डीड या ट्रस्ट के नाम पर निजी भूमि ले रहे हैं। हालांकि राज्य के भूसंरक्षण अधिनियम की धारा 118 के तहत कोई भी गैर हिमाचली यहां जमीन नहीं ले सकता, लेकिन ट्रस्ट के नाम पर जमीन खरीदने की अनुमति सरकार अपने स्तर पर दे सकती है। सरकार अपनी जमीन भी लीज पर दे सकती है, लेकिन धार्मिक नेताओं की असल समस्या यह है कि बहुत बड़ी जमीन लोगों से निजी तौर पर लेने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है और उसके बाद सरकार के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे में लीज ही शार्टकट व कम सिरदर्द वाला रास्ता है। अभी तक सोलन, साधुपुल (बाबा रामदेव), डगशाई- विश्वास मेडिटेशन आश्रम, पालमपुर- डेरा सच्चा सौदा, पूरे प्रदेश में कई जगह राधा स्वामी, ब्यास, सलोगड़ा व ऊना आसाराम बापू (कुटिया), कुल्लू- विश्व जागृति मिशन, डडौर- निरंकारी, अंब-महंत सूर्यनाथ, शिमला- मानव उत्थान सेवा समिति (सतपाल महाराज) समेत कई धार्मिक न्यास बनाए जा चुके हैं|
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment