Thursday, March 24, 2011

सत्ता की खरीद-फरोख्त


सत्ता बचाने के लिए सांसदों की खरीदारी की कलंकित परंपरा की परतें उघाड़ रहे हैं लेखक
विकिलीक्स ने 2008 में सरकार बचाने में कांग्रेस पार्टी द्वारा पैसों से संसद सदस्य खरीदने की चर्चा पर बहस को ताजा कर दिया। यह कोई अंतिम और पहला अध्याय नहीं है। 1991 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार बनी थी। सरकार के पास पूर्ण बहुमत नहीं था। शुरू में विश्वास प्रस्ताव आया तो पूरे विपक्ष ने उसे काम करने की छूट दे दी, क्योंकि तुरंत चुनाव नहीं हो सकते थे। 6 दिसंबर,1992 को विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद पूरे विपक्ष का फैसला हुआ कि इस राष्ट्रीय कलंक की सरकार को तुरंत सत्ता से बाहर कर दिया जाए। बजट सत्र में ही सम्मिलित अविश्वास प्रस्ताव आया। दोनों तरफ से लामबंदी शुरू हो गई। मेरे आवास 7, पंडित पंत मार्ग के बगल में 9 नंबर की कोठी में रामलखन सिंह यादव रहते थे। जनता दल के सदस्यों की लंबी लाइन मैंने अपने घर से देखी। रामलखन यादव ने मुझे भी प्रलोभन दिया-एक करोड़ रुपये, एक पेट्रोल पंप या गैस एजेंसी और महत्वपूर्ण लोगों के लिए मंत्री का पद। वीपी सिंह के बहुत से करीबी लोगों ने इस अभियान में निष्ठा बदल डाली। गिनती में एक वोट कम हो रहा था, क्योंकि दल से बाहर होने के लिए एक-तिहाई सदस्यों की जरूरत थी। मैं पैदल अपने आवास से संसद जा रहा था। तभी रास्ते में अभूतपूर्व घटना घटी। मुरादाबाद के एमपी हाजी गुलाम मोहम्मद संसद की ओर से एनेक्सी स्थित अस्पताल जा रहे थे। पंत मार्ग की कोठी से अपने ऑपरेशन को अंजाम देने के बाद सतीश शर्मा, बलराम सिंह यादव एक गाड़ी में थे। हाजी को बीच सड़क से जबरन टांग लिया गया। जनता दल तोड़ने का कोटा पूरा हो गया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के नौ सांसद थे। उनके साथ सामूहिक सौदा हो गया। उन आदिवासी सांसदों ने प्राप्त रकम को बैंकों में जमा कर दिया। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया। बाद में नरसिम्हा राव सरकार में रामलखन सिंह यादव और अजित सिंह दोनों कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। अल्पमत को बहुमत में बदलने का यह कांग्रेस प्रबंधकों का प्रथम प्रयास था, जिसमें अवैध साधनों का इस्तेमाल किया गया। जो पार्टी दलबदल विरोधी कानून पारित कराने का श्रेय लेकर भारतीय राजनीति में शुचिता और पवित्रता लाने का दावा करती थी, उसके ही प्रबंधकों ने देश के सर्वोच्च आसन की रक्षा में जितने गलत रास्ते हो सकते हैं, उन सबका इस्तेमाल कर पूरे पांच साल सत्ता का भोग किया। 12वीं लोकसभा अल्पजीवी थी। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 21 दलों का मोर्चा काम कर रहा था। सहसा किसी ने जयललिता के मन में प्रधानमंत्री होने की लालसा पैदा कर दी। उन्हें पक्का भरोसा दिया गया कि यदि आप वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लें तो गैर भाजपाई दल आपके नेतृत्व में सरकार बनाने को राजी हो जाएंगे। उनकी पार्टी के 22 सदस्यों का समर्थन खींच लेने से सरकार अल्पमत में आ गई। स्वाभाविक था सरकार को फिर से विश्वास मत लेने की जरूरत थी। सरकार के प्रबंधक प्रमोद महाजन और जार्ज फर्नाडीस के नेतृत्व में सक्रिय हुए। उस सरकार ने कांग्रेसी हथकंडों का इस्तेमाल करने में कोई चूक नहीं की। निर्दलीय, पूर्वोत्तर के एमपी उसके जाल में फंसे। उस सरकार में मंत्री रहे लोगों को आदर्श बघारने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यदि बसपा रात में समर्थन का ऐलान न करती तो उसके सांसदों का सौदा हो चुका था। धोखे में वाजपेयी सरकार एक वोट से परास्त हो गई, किंतु वोट के समय तक मायावती को मनाने का क्रम जारी रहा। उन्हें प्रमोद महाजन सदन में ही संदेश देने आए कि कल ही कल्याण सिंह से इस्तीफा लेकर आपको उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। उनका जवाब था-देर हो चुकी है। अब तो प्रधानमंत्री जवाबी भाषण दे रहे हैं। भारत सरकार ने अमेरिका के साथ परमाणु करार कर लिया। संप्रग के मजबूत हिस्सेदार वामपंथी दलों ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। सरकार अल्पमत में आने की बात कही जाने लगी, लेकिन ऐसा नहीं था। प्रारंभ से ही समाजवादी पार्टी का सरकार को समर्थन था, जिसे पार्टी ने कभी वापस नहीं लिया था। फिर भी, कांग्रेस अपनी पुरानी चालों से कहां बाज आने वाली थी। कांग्रेस के प्रबंधक सक्रिय हो गए। कुछ दलों व पूर्वोत्तर के सांसदों को ऐसे अवसर की तलाश रहती है। कांग्रेसी प्रबंधक लेन-देन करने में माहिर खिलाड़ी हैं। इस बार की कमान अहमद पटेल के हाथ में थी। दोनों पक्षों में लामबंदी जबर्दस्त थी। कई विशेषज्ञों से परामर्श के बाद समाजवादी पार्टी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि परमाणु करार को बहाना बनाकर सरकार अस्थिर न की जाए। वामपंथी दलों के भीतर करात की पहल की घोर निंदा हुई। वरिष्ठ सीपीएम लीडर व तत्कालीन लोकसभा स्पीकर के खिलाफ पार्टी को कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि वह कहते थे इस पहल से पार्टी भाजपा के पाले में नजर आएगी, जिसका दंड पार्टी को चुनाव में भुगतना पड़ेगा। यह चेतावनी सही नजर आई। कुछ दलों का समर्थन का फैसला राजनीतिक कारणों से था। उनका नोट के लेन-देन से कोई रिश्ता नहीं था। किंतु कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा पूर्वोत्तर के आधा दर्जन सांसदों व उत्तर भारत के निर्दलीय सांसदों को मोटी रकम का भुगतान किया। विकिलीक्स ने बहुत सतही ढंग से इसका जिक्र किया है। अजित सिंह का उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री से राजनीतिक सौदा हो गया था, क्योंकि वामपंथियों ने मायावती को भविष्य का प्रधानमंत्री बनाने का सपना दिखला दिया था। इसलिए जयललिता की तर्ज पर मायावती दिल्ली में दाखिल होकर सरकार समर्थक उत्तर प्रदेश के सांसदों को तोड़ने में लग गई। सपा के चार सांसद उनके पाले में चले गए। अजित अपने तीन साथियों के साथ उनके खेमे में दाखिल हो गए। कुछ नादान खिलाडि़यों ने भाजपा के ही सांसदों को बचकाने ढंग से तोड़ने की कोशिश की जिसका कुफल लोकसभा में नोटों के बंडल लहराने के रूप में सामने आया। कांग्रेसी सत्तालोलुप राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं, उन्हें सरकार की हिफाजत के लिए किसी भी हथियार का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं है। विकिलीक्स ने किसी रहस्य से पर्दा नहीं उठाया। उसकी सूचना अधूरी ही नहीं, लचर साक्ष्य के कारण गलत भी है। विदेशी जासूस के सतही रहस्योद्घाटन को लेकर हल्ला कालातीत है। इससे अधिक जानकारी उन सभी लोगों के पास है जो उस लोकसभा के सदस्य थे। संयोगवश खरीद-फरोख्त के लिए याद की जाने वाली तीनों लोकसभाओं का साक्षी लेखक भी है और बहुत सी घटनाओं को आंखों के सामने घटते देखा है। उन्हें देखने और जानने से क्या होगा, जब देश का जनमानस ही चुनाव में धन लुटाने वालों की पीठ ठोकता है। (लेखक सपा के महासचिव हैं)

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