Wednesday, March 9, 2011

भ्रष्टाचार को देशद्रोह क्यों न मानें


मनी लाउंडरिंग, करोड़ों रुपयों की कर चोरी, अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त और आतंकी गतिविधियों में शामिल लोगों से संपर्क रखने के आरोपी हसन अली के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कड़े शब्दों में पूछा है कि क्यों नहीं उस पर पोटा का अभियोग लगाया जाए। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी निश्चय ही दूरगामी और बहसतलब है। यह बात बिलकुल सही है कि देश की अर्थव्यवस्था को खोखला करने वाले ऐसे अपराध को देशद्रोह से कम नहीं मानना चाहिए।
वैसे भी हमारे देश में आजादी के 63 वर्षों बाद भी अंगरेजों के जमाने के अप्रासंगिक हो चुके कानून अस्तित्व में हैं, जिसे अंगरेजों ने हमें गुलाम बनाए रखने के लिए बनाया था। आजादी के बाद हमारे नीति-निर्धारकों ने न तो इसकी कभी समीक्षा की और न ही स्वतंत्र देश की आकांक्षाओं के अनुरूप इसमें जरूरी फेरबदल किया।
किसी भी स्वतंत्र देश का चरित्र उसकी अपनी कानून-व्यवस्थाओं से जाना जाता है। 1917 में जब सोवियत रूस में जारशाही खत्म हुई और आजादी आई, तो रूस के नीति निर्धारकों ने सरकारी कामकाज में अंगरेजी के बजाय रूसी भाषा को लागू किया। इस पर लोगों ने बहुत शोर मचाया, लेकिन इसमें कोई तबदीली नहीं हुई। राष्ट्र-निर्माण के लिए ऐसे ही मजबूत इरादे की जरूरत होती है।
निश्चय ही आज देशद्रोह की परिभाषा और सजा के प्रावधानों में तबदीली की जरूरत है। देशद्रोह के मूल में यह भावना है कि कोई भी अपराध या कृत्य जिससे देश के हितों को व्यापक आघात पहुंचता हो, देशद्रोह माना जाए। सामान्यत: देश की शासन व्यवस्था के विरुद्ध कार्य करने और देश की खुफिया सूचनाओं को दुश्मन देशों में पहुंचाने को देशद्रोह माना जाता है। आम जन का हक छीनकर देश की संपदा दूसरे देशों में भेजने को अंगरेजों ने देशद्रोह इसलिए नहीं माना, क्योंकि वे खुद हमें लूटकर सारा धन इंगलैंड भेजते थे।
विकसित देशों की रणनीति है कि विकासशील देशों में ऐसा कानून रहे, जो उनके लिए असुविधाजनक न हो। लेकिन आज की बदली हुई परिस्थितियों में क्या वित्तीय भ्रष्टाचार और बड़े-बड़े घोटाले को देशद्रोह नहीं मान सकते? क्या भ्रष्टाचार के कारण देश की आम जनता अपने अधिकारों से वंचित नहीं होती? बताया जाता है कि विदेशी बैंकों में हमारे देश के लोगों का इतना धन जमा है कि उससे देश का कायाकल्प हो सकता है। क्या इस धन से देश की गरीबी दूर नहीं की जा सकती थी? कई बड़ी परियोजनाएं धनाभाव के कारण शुरू नहीं हो पातीं। गरीब जनता को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पाती हैं। आबादी का एक बड़ा हिस्सा आजादी के इतने वर्षों बाद भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहा है। मगर देश का मौजूदा कानून इन घोटालों को महज भ्रष्टाचार के रूप में ही देखता है।
और जहां तक भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई की बात है, तो अभी तक यही देखने में आया है कि इसमें किसी भी बड़ी मछली को कोई सजा नहीं हुई है। छोटे अफसरों पर जरूर कार्रवाई हुई, लेकिन किसी बड़े राजनेता पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। नेताओं के ऊपर चल रहे मामले वर्षों से लंबित हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिसमें इन नेताओं के खिलाफ जांच प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश की गई है। ऐसे में गालिब का एक शेर याद आता है-बेरूखी बेसबब गालिब कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है।
इसीलिए समय आ गया है कि इस स्तर के घोटालों को देशद्रोह के रूप में परिभाषित किया जाए तथा जो सजा एक देशद्रोही को दी जाती है, वही सजा इन घोटालेबाजों और वित्तीय भ्रष्टाचार करने वालों को दी जानी चाहिए। एक सर्वे के मुताबिक अरब देशों में दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले अपराध की दर काफी कम हैं। इसका मुख्य कारण है-वहां के कानून में सख्त सजा के प्रावधान का होना। क्या हम कुछ समय के लिए उचित प्रावधानों के साथ अपने कानून को ऐसा नहीं बना सकते कि वह एक छोटे भ्रष्टाचारी और बड़े घोटालेबाजों में अंतर कर सके तथा दंड का ऐसा प्रावधान हो कि फिर कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार का दुस्साहस न कर सके। मगर इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि हम अंगरेजों के बनाए देशद्रोह कानून के दायरे में वित्तीय भ्रष्टाचार को भी शामिल करें। देश के आम लोगों में शासन का विश्वास कायम करने के लिए टाडा या पोटा जैसा कठोर कानून लगाकर ऐसे देशद्रोहियों को दंडित करना जरूरी है।

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