महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में तेल माफियाओं ने पिछले शुक्रवार को एक टीवी चैनल के रिपोर्टर और कैमरामैन पर हमला किया। इससे पहले विगत 25 जनवरी को मालेगांव के पास मनमाड में एक कर्मठ सरकारी अधिकारी यशवंत सोनवणे को तेल माफियाओं ने जिंदा जला दिया था। उससे भी पहले इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के सेल्स मैनेजर मंजूनाथ षणमुघम की उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 19 नवंबर, 2005 को हत्या कर दी गई थी। बिहार में इंजीनियर सत्येंद्र दुबे और महाराष्ट्र में रेत माफिया का भंडाफोड़ करने वाले एक अधिकारी को भी कर्तव्यपरायणता की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी थी। जब भी ऐसी कोई घटना होती है, तब शोर तो मचता है, लेकिन फिर इन अधिकारियों की शहादत भुला दी जाती है।
मनमाड में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड के तेल डिपो हैं। इसलिए वर्षों से वहां मिलावट करने वाले अपराधी गिरोह सक्रिय हैं। इस इलाके में सड़कों के किनारे कई छोटे-छोटे ढाबे हैं, जहां पेट्रोल-डीजल ले जाने वाले टैंकरों के ड्राइवर-खलासी रुकते हैं और यहीं पर दीवारों के पीछे टैंकर खड़ी कर मिलावट का काम किया जाता है। तेल माफिया केवल महाराष्ट्र में ही सक्रिय नहीं, यह खेल कमोबेश सभी प्रदेशों में दशकों से निर्बाध चल रहा है। अपराध, व्यवसाय और राजनीति की तिकड़ी की बदौलत यह मिलावट का काम धड़ल्ले से चलता है।
पेट्रोल और डीजल में मिलावट मुनाफे का धंधा है। पेट्रोल-डीजल और केरोसिन तेल की कीमतों में भारी अंतर है। दाम का यह फर्क ही अपराधियों का दुस्साहस बढ़ा देता है। केरोसिन को गरीबों का ईंधन मानकर सरकार उस पर भारी सबसिडी देती है। एक अनुमान के मुताबिक, देश में हर साल जितना केरोसिन बिकता है, उसका 40 फीसदी तेल माफिया के पास पहुंच जाता है। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकानॉमिक रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक मात्र रियायती दर पर मिलने वाले केरोसिन तेल को तेल माफिया कई गुना महंगे पेट्रोल-डीजल में मिलाकर भारी मुनाफा कमाते हैं। इस धंधे के बीच जो भी आता है, वह मारा जाता है।
नेपाल, पाकिस्तान व बांग्लादेश जैसे हमारे पड़ोसी देशों में केरोसिन तेल की कीमतें पेट्रोल-डीजल की कीमतों के लगभग बराबर हैं। इसलिए सरकारी तेल डिपों व टैंकरों से चुराया गया केरोसिन तस्करी के जरिये इन देशों में महंगे दामों पर बेचा जाता है। एसोचेम के एक सर्वे के अनुसार, हर साल सौ करोड़ लीटर केरोसिन की तस्करी हो रही है। इससे सरकार को सालाना 3,395 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। किरीट पारेख कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्रामीण गरीब अब केरोसिन तेल का इस्तेमाल मात्र 1.3 फीसदी यानी न के बराबर करते हैं। रियायती दर पर मिले इस केरोसिन तेल का तेल माफिया जमकर फायदा उठाते हैं।
तेल के वितरण में हेराफेरी और मिलावट रोकने के लिए मार्कर के उपयोग की बात फिर से की जा रही है। मार्कर लागू हो जाने से कोटे के केरोसिन का रंग अलग हो जाएगा, जिससे वह आम दुकानों पर नहीं बिक सकता है। इसके अलावा पेट्रोल-डीजल में मिलाने पर उसका भी रंग बदल जाता है, जो जांच में आसानी से पकड़ा जा सकता है। पूर्व पेट्रोलियम सचिव श्रीनिवास ने मंजूनाथ की हत्या के बाद से मार्कर सिस्टम को पूरे देश में लागू करवाया था। अक्तूबर, 2006 से दिसंबर, 2008 तक इंडिया केरोसिन अडल्टरेशन प्रोग्राम लागू होने से मिलावट लगभग बंद हो गई थी। आरोप है कि काली कमाई करने वालों ने तेल अधिकारियों की मिलीभगत से तेल की जांच के लिए एक्टिव चारकोल व सनलाइट की शर्तें भी शामिल करा दीं। इन नई शर्तों के कारण 2008 और 2009 में जांच कार्यक्रम नहीं चल पाया।
सिर्फ तेल ही नहीं, किसी भी वस्तु में मिलावट हमारे देश में बड़ा अपराध नहीं माना जाता है और इसे रोकने के लिए कोई सख्त तंत्र नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कब तक चंद कर्मठ और ईमानदार अधिकारी इन माफियाओं के कारण अपनी जान गंवाते रहेंगे। यदि कर्तव्यपालन की कीमत जान देकर चुकानी पड़े, तो कोई कब तक ऐसी हिम्मत दिखा पाएगा और क्या इसका गलत संदेश नहीं जाएगा? सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसी घटनाएं रोकने और विशुद्ध चीजें उपलब्ध कराने के लिए माफिया तंत्र पर शीघ्र अंकुश लगाए।

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