Monday, March 21, 2011

सीबीआई से कम कुछ भी नहीं मंजूर


विकिलीक्स के खुलासे में सांसद खरीद कर सरकार बचाने के मामले में विपक्ष प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बख्शने के मूड में कतई नहीं है। एक तरफ विशेषाधिकार हनन के मामले में सदन के भीतर उनको घेरने की कोशिशें शुरू हो गई हैं, वहीं दूसरी तरफ इस मामले में किशोर चंद्र देव समिति की सिफारिशों के आलोक में सीबीआइ जांच से कम पर विपक्ष मानने को तैयार नहीं है। विपक्ष ने प्रधानमंत्री के संसद में दिए बयान को गलतबयानी करार देते हुए इसके लिए दबाव बढ़ा दिया है। राजग ने इस मामले पर गुरुवार को अपने शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी को उतारा था तो शुक्रवार को मोर्चा संभाला लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज व राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने। दोनों नेताओं ने संसद के भीतर प्रधानमंत्री पर तमाम सवाल दागने के बाद बाहर भी संयुक्त बयान व पत्रकार वार्ता कर दो टूक कहा कि इस मामले के आपराधिक पहलू की सीबीआइ जांच तत्काल कराई जानी चाहिए। दोनों नेताओं ने कहा कि इस मामले में मनमोहन सिंह भले ही खुद को अपराधी न मानें, लेकिन इस अपराध से मिले विश्वास मत के सबसे बड़े लाभार्थी तो वही हैं। सुषमा स्वराज ने कहा कि किशोर चंद्र देव समिति ने विपक्ष के विरोध के बावजूद बहुमत के निर्णय में स्पष्ट तौर पर माना था कि इस मामले में घूसखोरी हुई थी और मामले की जांच किसी उचित एजेंसी से कराने की सिफारिश की थी। इसमें संजीव सक्सेना का नाम भी था जिसने सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए सांसदों को रिश्वत दी थी। सरकार ने इतने दिनों तक सच्चाई छिपाई और जांच नहीं कराई। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का यह कहना कुतर्क है कि 2008 की इस घटना के बाद 2009 में आम चुनाव में संप्रग ज्यादा सीटें जीतकर आया और विपक्ष की सीटें घट गई। ऐसा बयान राजनीति में अपराधीकरण को बढ़ावा देता है। क्या इससे यह माना जाएगा कि अपराधी चुनाव जीतने पर दोषी साबित होने पर भी मुकदमों से बच जाएंगे? माकपा ने भी सीबाआइ जांच की मांग की। अपना दामन साफ करने की कोशिश में सपा विकिलीक्स के नए रहस्योद्घाटन के बाद भाजपा व वामदलों की ओर से बढ़ते दबाव के बीच सपा भी जांच के लिए सहमत है। अमेरिका से परमाणु करार को लेकर 2008 में संसद में विश्वासमत हासिल करने के कठिन वक्त पर सरकार को बचाने में समाजवादी पार्टी ने सबसे अहम भूमिका निभाई थी। पार्टी की कोशिश है कि जांच के सहारे उसका दामन पाक साफ हो जाएगा। इसलिए पार्टी ने किसी भी तरह की जांच कराने की चुनौती दी है। माना जा रहा है कि यदि मामला जांच के लिए फिर खुला तो सपा भी उसकी लपेट में होगी। परिस्थिति को भांपते हुए पार्टी प्रवक्ता व राज्यसभा सदस्य मोहन सिंह ने कहा, पार्टी प्रधानमंत्री से जवाब चाहती थी। उन्होंने संसद में जवाब दे दिया, फिर भी जांच हो जाए क्योंकि विश्वासमत के दौरान पार्टी ने किसी से धन का कोई लेन-देन किया ही नहीं था। प्रधानमंत्री की दो टूक सरकार बचाने के लिए रिश्वत के आरोपों को हम दृढ़ता से पूरी तरह नकारते हैं। जुलाई 2008 में 14वीं लोकसभा में सरकार ने सरकार ने लोकसभा में विश्वास मत 256 के मुकाबले 275 मतों से जीता था। रिश्वत के आरोपों की जांच 14वीं लोकसभा द्वारा गठित एक समिति ने भी की थी। समिति ने निष्कर्ष दिया कि रिश्वत के मामले में कोई निष्कर्ष निकालने के लिए अपर्याप्त सबूत हैं। विपक्षी सदस्य भूल गए हैं कि उसके बाद आम चुनाव में विपक्षी दलों ने रिश्वत के अपने आरोप दोहराए। जनता ने उसका जवाब ऐसे दिया कि मुख्य विपक्षी पार्टी की 14वीं लोकसभा में 138 सीटें थीं जो 15वीं लोकसभा में घटकर 116 रह गईं। वाम दलों की संख्या 59 से घटकर 24 रह गई। अकेले कांग्रेस पार्र्टी के सदस्यों की संख्या 145 से बढकर 206 हुई। वित्त विधेयक में भी परेशानी मंगलवार को संसद में सरकार ने अगर अडि़यल रुख दिखाया तो उसे वित्त विधेयक पारित कराने में भी खासी परेशानी होगी। मुख्य विपक्षी दल भाजपा वित्त विधेयक को फंसाने के मूड में नहीं है, लेकिन अगर सरकार विकिलीक्स मसले पर चर्चा न कराने पर अड़ी तो फिर न सिर्फ भाजपा और वाम दल, बल्कि तेलुगूदेशम जैसे दूसरे दलों की तरफ से हंगामा तय है। एंटनी बोले राजनयिकों से संभलकर करें बात विकिलीक्स के खुलासे के बाद रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने राजनयिकों से बातचीत में चौकस रहने की सलाह दी। एंटनी ने विकि लीक्स के खुलासों की प्रामाणिकता के बारे में कुछ भी बोलने से इंकार करते हुए सुझाव दिया कि व्यवहार कितने भी मित्रवत हों, राजनयिकों से बातचीत में सतर्क होना चाहिए। उन्होंने इसके आगे कुछ भी कहने से मना कर दिया|

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