इक्कीसवीं सदी का भारत बाबा रामदेव में अपनी छवि देख रहा है। शायद बाबा को भी इसका अंदाजा नहीं होगा कि योग सिखाते-सिखाते व्यवस्था और राजनीति से उपजी दुर्गंध के बीच पसरे शून्य को वह इस कदर भुना ले जाएंगे। बाबा में अब इतनी चतुराई आ गई है कि कभी महात्मा गांधी के विरोधी रहे बाबा वक्त की नजाकत को समझते हुए अब अंतिम आदमी की बात कर रहे हैं। उनका आंदोलन सफल होता दिख रहा है, क्योंकि प्रश्न राजनेताओं के भ्रष्टाचार से उपजी काली कमाई और खाते-पीते लोगों के शरीरों को दुरुस्त रखने का है। बाबा की जुबान वही भाषा बोलती है, जो ‘यूज एेंड थ्रो’ वाला हिंसात्मक समाज अपने धैर्य और विवेक को बस्ते में रखकर सुनना चाहता है।
बाबा के आंदोलन से धीरे-धीरे सभी राजनीतिक दलों में बौखलाहट है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि बाबा उस जगह को घेर रहे हैं, जिस पर सभी दल कब्जे की होड़ लगाते हैं। देश की नामी-गिरामी (पर समझदार!) हस्तियां भी उनकी ओर खिंचने लगी हैं। कइयों को बाबा रामदेव का आंदोलन गांधी जी के खिलाफत आंदोलन जैसा लगता है। इस पर ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि इस आंदोलन की परिणति क्या होगी। यदि आम चुनाव तक यह आंदोलन चलता रहा, तो सत्ता परिवर्तन होगा और यही बाबा के आंदोलन का चरमोत्कर्ष होगा। याद कीजिए जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से उपजी जनता पार्टी की सरकार को। लेकिन उसके बाद? उस समय तो देश ठहरकर सोचता भी था, पर आज किसी के पास इसकी फुरसत नहीं है, क्योंकि पूरा देश ‘थ्रिलिंग मुद्रा’ में है। हमारे समाज की सबसे बड़ी विचित्रता यही है कि आंदोलन भावावेश के मुद्दों पर खड़ा होता है। रामदेव ने भ्रष्टाचार और काला धन के जो मुद्दे चतुराई से झटके हैं, वे किसी बहस को जन्म नहीं देते। आज बड़ा सवाल यही है कि नए समाज की रचना के लिए हम कौन-सी फसल बोएंगे और कैसे?
इस सचाई को स्वीकारने का साहस कोई नहीं जुटा पाता कि यह देश अपने जननायकों को समझने में हमेशा भूल करता रहा है। साम्यवाद हो या पूंजीवाद, गांधी के समग्र चिंतन को खारिज करने की ताकत किसी में नहीं है, लेकिन उसे स्वीकार करने का साहस भी नहीं है। पूंजीवाद तो उस चिंतन की पीठ पर ही अपना बल दिखा सकता है। हमारी सोच का धरातल इस स्तर तक आ पहुंचा है कि गांधी और गांधी-विचार को पलट दीजिए, तो सब कुछ संभव और आसान है।
इस बात को समझ पाने में हर कोई नाकाम है कि भ्रष्टाचार स्वयं में किसी समस्या का नाम नहीं है। आजादी के बाद हमने जिस व्यवस्था को अंगीकार किया, उसने स्वच्छंदता को जन्म दिया। औद्योगिक समाज की भौतिकवादी व्यवस्था ने गांवों से लेकर छोटे-छोटे शहरों और कसबे तक को अपनी हाल पर छोड़ दिया। लोहिया और जेपी ने गांधी विचार के धरातल पर अपने चिंतन को दृढ़ करने की कोशिश की। लोहिया ने अपने पीछे एक पीढ़ी को तैयार कर एक हद तक इसमें सफलता भी पाई, लेकिन गांधी के विचार और दर्शन की कोई खालिस पीढ़ी तैयार नहीं हो पाई। समस्त गांधीजन उत्तरार्द्ध या प्रौढ़ गांधी को पकड़कर बैठ गए, जबकि गांधी की समस्त देन तो उस गांधी की है, जो दक्षिण अफ्रीका में जिए और उसी के बल पर महात्मा बने और फिर भारत में आकर छा गए। फलस्वरूप गांधी के बाद उनके रचनात्मक कार्यों को साकार करने की सोची तक नहीं गई। आज गांधी केवल दर्शन, संस्थाओं, करेंसी और चौक-चौराहों के प्रतीक भर बनकर रह गए हैं। नेहरू की समाजवादी व्यवस्था का रंग भी धीरे-धीरे उड़ गया और पिछले बीसेक वर्षों से अंगरेजियत अपनी नई सभ्यता और शैली की अकड़ के साथ पूरे देश में पसर गई है। कौन नहीं जानता कि आज जीवन का प्रधान तत्व पैसा है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार समस्या नहीं, जीवन शैली की पूरक मान्यताओं की परिभाषा बनकर हमारे बीच पसर गई है। पर हम उसे भूलकर कपटपूर्ण राजनीति से बुने संस्थागत भ्रष्टाचार की खाल उधेड़ने में लगे हैं।
भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक आता है, यह अगर सत्य भी हो, तो यह जुमला खुद को तसल्ली देकर अपने को बचा लेने की कवायद से ज्यादा कुछ नहीं है। इन तसल्लियों से भ्रष्टाचार का तालाब साफ नहीं होगा, हां साफ होने का भ्रम जरूर फैलेगा। लेकिन जरूरत तो आमूल-चूल परिवर्तन की है, अन्यथा इतिहास खुद को दोहराता रहेगा।

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