भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों (व्हिसल ब्लोअर्स) को सुरक्षा की गारंटी नहीं मिली। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई दिशा-निर्देश निर्धारित करने से इंकार कर दिया। अदालत का कहना था कि वह कानून नहीं बना सकती। मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने वकील एन राजा रमन और अजय मंडयाल की ओर से दाखिल जनहित याचिका (पीआइएल) को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। तेल माफिया द्वारा महाराष्ट्र में एक अतिरिक्त जिलाधिकारी को जिंदा जलाकर मारने की घटना का हवाला देते हुए याचिका में मांग की गई थी कि व्हिसल ब्लोअर्स को कानूनी सुरक्षा मुहैया कराने के लिए दिशा-निर्देश तय किए जाएं। दोनों वकीलों ने अपनी याचिका में अन्य कई घटनाओं का भी उल्लेख किया, जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों को माफिया और नेताओं द्वारा या तो मरवा दिया गया अथवा उन्हें धमका कर चुप करा दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से कहा था कि वह केंद्र को इस बारे में कानून बनाने के लिए निर्देश जारी करे। दोनों वकीलों की दलील थी कि ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिससे आरटीआइ कानून का इस्तेमाल करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले आरटीआइ कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और वकीलों को सुरक्षा प्रदान किया जा सके। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए इस बारे में कोई आदेश देने से इंकार कर दिया। हालांकि शीर्ष न्यायालय ने सलाह दी कि किसी खास मामले सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका काम कानून बनाना नहीं है और ऐसा करने के लिए वह सरकार से भी नहीं कह सकती है|
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