बजट 1800 करोड़ रुपये हो और फिजूलखर्ची सात से आठ सौ करोड़ हो तो आप उसे क्या कहेंगे? खर्च की मनमानी या लूट। राष्ट्रमंडल आयोजन समिति में भी यही हुआ। मंगलवार को सरकार को दी रिपोर्ट में वीके शंुगलू ने सीधे तौर पर आयोजन समिति के पूर्व अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। समिति का मानना है कि कैटरिंग से लेकर दूसरे कई मामलों में जानबूझकर देरी की गई जिसके कारण पैसों की लूट हुई। राष्ट्रमंडल खेल आयोजन में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों की जिम्मेदारी का हवाला देकर अपना बचाव करने में जुटे कलमाड़ी के लिए शुंगलू ने परेशानी बढ़ा दी है। बताते हैं कि शुंगलू रिपोर्ट में कैटरिंग, ओवरलेज, टीएसआर, उद्घाटन व समापन समारोह जैसे सभी मामलों में फिजूलखर्ची पर तीखे सवाल उठाए गए हैं। कैटरिंग कांट्रेक्ट को लेकर अंतिम समय तक चलते रहे खेल पर रिपोर्ट ने आपत्ति जताई है। कैटरिंग के लिए पहले डीलावेयर नार्थ को कांट्रेक्ट देने का मन बना लिया गया था। अंतिम समय में कलमाड़ी ने उसे रद कर दिया। आखिरी समय में नया कांट्रेक्ट तय किया गया जिसके कारण तकरीबन 20 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। समिति का मानना है कि कलमाड़ी ने विभिन्न सामानों की खरीद में भी जानबूझकर देरी की और उसका खामियाजा सरकारी खजाने को भुगतना पड़ा। ओवरलेज को लेकर सवाल उठते रहे हैं। समिति का भी मानना है कि जो काम 300 करोड़ में होने चाहिए थे उसके लिए लगभग दोगुना दाम दिया गया। कारण फिर से जानबूझकर की गई देरी थी। टीएसआर का जिम्मा स्विस टाइमिंग को दिया गया था। मेलबर्न में इसका जिम्मा संभाल चुके स्विस टाइमिंग ने दिल्ली में कहीं ज्यादा पैसे लिए थे। स्विस टाइमिंग ने पहले ही अपनी ओर से सार्वजनिक सफाई दी है, पर समिति को लगता है कि आयोजन समिति ने यहां भी जानबूझकर लूट की छूट दे दी थी। समिति पहले की रिपोर्ट में कह चुकी है कि पूरे खेल पर मनी सिंड्रोम हावी था जिस कारण हर अनुबंध में 25-35 फीसदी ज्यादा कीमत चुकाई गई। लूट हर ओर मची थी। सूत्रों के अनुसार आयोजन समिति के सदस्यों ने भी कई मामलों में ठेकेदारों की ओर से कई फर्जी पर्ची देकर घोटाला किया। उद्घाटन और समापन समारोह में हुए खर्च पर भी इस देरी का असर था। जांच समिति का मानना है कि आयोजन समिति कोई भी दलील दे, इस जिम्मेदारी से नहीं मुकर सकती है कि उसने फैसले लेने में देरी की और उसका फायदा हर ठेकेदार ने उठाया|
Wednesday, March 30, 2011
कालेधन पर एसआइटी बनाने के पक्ष में नहीं केंद्र
कालेधन पर विशेष जांच दल (एसआइटी) के गठन का विरोध करने के लिए सरकार को मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी का सामना करना पड़ा। शीर्ष अदालत ने कहा कि एसआइटी इसलिए जरूरी है क्योंकि तीन साल से चल रही जांच में शामिल एजेंसियों ने धन के स्रोत की जांच नहीं की। न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और एस एस निज्जर की पीठ ने जांच को लेकर असंतोष जाहिर करते हुए कहा, हम बुनियादी सवाल (धन का स्रोत) जानना चाह रहे हैं, लेकिन जांच एजेंसियों के पास इसका जवाब नहीं है। पीठ ने कहा, जिस तरीके से साल 2008 से जांच आगे बढ़ी है, उससे स्पष्ट होता है कि इसमें कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 2008 से आपको पता है कि कुछ लोगों ने विदेश में कालाधन छिपा रखा है, लेकिन उसकी जांच के बदले आपने दोहरे कराधान संधि और इस संधि और उस संधि की बात की। आप उन लोगों से सरल सवाल पूछ सकते थे कि आपने यह धन कहां से हासिल किया जिसका आपने अब तक जवाब नहीं दिया। पीठ ने कहा कि ईडी कई बार स्टेटस रिपोर्ट सौंप चुका है, लेकिन किसी में भी धन के मूल स्रोत का जिक्र नहीं है। पीठ में से एक जज ने ईडी की ओर से सोमवार को दाखिल स्टेटस रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा, मैंने पूरी रात रिपोर्ट पढ़ी, लेकिन उससे कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि आपने धन का स्रोत पता लगाने के लिए कुछ किया है। रिपोर्ट में तीन-चार सवाल जरूर उठाए गए हैं, लेकिन धन के स्रोत पर कुछ नहीं कहा गया। पीठ ने कहा, कालेधन के आरोपी कोई विदेशी नहीं हैं। वे सभी यहीं हैं, लेकिन पिछले तीन सालों में आपने कुछ नहीं किया। पीठ ने याचिकाकर्ता और वरिष्ठ वकील राम जेठ मलानी के उन आरोपों पर भी विचार किया जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र सरकार द्वारा हसन अली की सीडी बनाने वाले पुलिस अधिकारी को सस्पेंड करने की बात कही थी। कोर्ट ने आदेश दिया कि 8 अप्रैल से पहले सीडी को उसके समक्ष पेश किया जाए|
Tuesday, March 29, 2011
भारत की गिरती साख
संप्रग शासन में घपले-घोटालों के सिलसिले से दुनिया में भारत की नकारात्मक छवि बनती देख रहे हैं लेखक
क्या संप्रग-2 के पापों से सरकार और कांग्रेस की ही हानि हुई है? इस पाप का हिसाब तो जनता उचित समय पर ले लेगी, किंतु वास्तविक हानि तो भारत की हुई है, जो अपूरणीय है। पिछले दिनों मैं लंदन प्रवास पर था। वहां के बुद्धिजीवियों से हुई बातचीत और भारत के संदर्भ में स्थानीय समाचारपत्रों में जो खबरें पढ़ीं, उनसे भारत की नकारात्मक छवि बनने का ही संकेत मिलता है। कुछ पाश्चात्य समीक्षक तो भारत का हश्र रूस की तरह होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं, जहां आर्थिक विकास के लिए नागरिकों को अपनी व्यावसायिक बुद्धि, कार्यदक्षता और परिश्रम के सहारे न रहकर भाईभतीजावाद पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था और अपराधियों पर आश्रित रहना पड़ता है। लंदन से प्रकाशित फाइनेंसियल टाइम्स के 22 मार्च के संस्करण में भारत से संबंधित एक समीक्षा छपी थी, जिसका शीर्षक था-राइटिंग इज ऑन द वाल। नीचे राष्ट्रमंडल खेलों के लोगो के साथ दीवार पर लिखा था, स्पोर्ट्स (पास), गवर्नमेंट (फेल)। खबर में आगे भ्रष्टाचार के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को पहुंच रही क्षति और उसके कारण भारत की गिरती वैश्विक छवि की विस्तृत समीक्षा छपी थी। साथ ही ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के उक्त पत्र का भी हवाला था, जो उन्होंने फरवरी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा था। पिछले साल भारत दौरे पर आए कैमरन ने भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संपर्कों को नया आयाम देने की बात की थी, किंतु ब्रितानी निवेशकों को यहां जिस तरह की लालफीताशाही झेलनी पड़ रही है उससे एक साल में ही उनका मोहभंग हो गया है। कैमरन ने आर्थिक सुधारों के पितामह मनमोहन सिंह से दो-टूक पूछा, क्या नौकरशाहों और कुछेक शक्तिसंपन्न व्यापारिक घरानों द्वारा अर्थव्यवस्था का गला घोंट डालने वाला लाइसेंसी राज आज भी कायम है? कैमरन अकेले नहीं हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के मुंबई स्थित मुख्य अर्थशास्त्री समिरन चक्रवर्ती ने अपने हाल के अमेरिकी दौरे के दौरान निवेशकों में भारत के प्रति निराशा देखी। उपरोक्त आर्थिक समीक्षा में जमशेद गोदरेज, केशव महिंद्रा, बैंकर दीपक पारिख, अजीम प्रेमजी जैसे उद्योगपतियों द्वारा भारत में व्याप्त लालफीताशाही और भ्रष्ट नौकरशाही पर गहरी चिंता व्यक्त किए जाने का उल्लेख है। इन उद्योगपतियों ने अपने एक खुले पत्र में लिखा था, सरकार, व्यापार, संस्थागत कायरें आदि राष्ट्रीय जीवन के प्राय: हर क्षेत्र से गायब होते सुशासन से हम गहरे चिंतित हैं। कैमरन की आशंका निराधार नहीं है। राडिया फोन टेप प्रकरण से वर्तमान सत्ता अधिष्ठान में कुछेक व्यापारिक घरानों की गहरी दखलंदाजी का ही खुलासा हुआ था। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की लारा अल्फारो और नार्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय की अनुशा चारी ने आर्थिक सुधारों के प्रभावों का अध्ययन किया है। उन्होंने लिखा है, उदारीकरण के दौर से पूर्व जो कंपनियां बाजार में उपस्थित थीं उन्होंने बदली अर्थव्यवस्था में भी नए प्रतिस्पर्धियों से ज्यादा लाभ अर्जित करना जारी रखा। प्रसिद्ध समीक्षक ब्रह्मा चेलानी का कहना है कि आर्थिक सुधारों से उदारीकरण की स्वाभाविक अपेक्षा थी, किंतु इससे वास्तव में भ्रष्ट राजनेताओं के ही वारेन्यारे हुए। रूस में सन 2000 में करोड़पतियों की संख्या एक हजार थी, जो 2010 में बढ़कर 21,000 हो गई। वहीं भारत में सन 2000 में जहां 4000 करोड़पति थे, वहीं 2010 में करोड़पतियों की संख्या 26,000 हो गई। फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार एक अरब बीस करोड़ की आबादी वाले इस देश में 69 अरबपति हैं। उनकी संपत्ति देश के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 30 प्रतिशत से भी अधिक है। सन 2009 में एशियन डेवलपमेंट बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश के पचास अरबपतियों के पास जीडीपी के 20 प्रतिशत से भी अधिक की संपत्ति और स्टॉक मार्केट की 80 फीसदी पूंजी है। संसाधनों और सत्ता के अत्यधिक नियंत्रण के कारण विकास और सुधार, दोनों पर स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल असर पड़ता है। संप्रग-2 के पतन का कारण संप्रग सरकार की पहली पारी में कम्युनिस्टों के समर्थन वापस ले लिए जाने के बाद सत्तासुख भोग के लिए की गई सौदेबाजी है। अल्पमत में आ गई सरकार को सदन में विश्वासमत हासिल करना था। संप्रग सरकार ने नोट के बदले वोट खरीद कर सदन में बहुमत साबित कर दिया। अब विकिलीक्स ने यह खुलासा किया है कि मनमोहन सिंह की सरकार ने सांसदों को घूस देकर विश्वासमत हासिल किया था। इस खुलासे के बाद सदन में प्रधानमंत्री ने अपनी सफाई में कहा है कि वोट की खरीद-फरोख्त नहीं हुई, जबकि नोट के बदले वोट की जांच के लिए गठित किशोरचंद देव समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सांसदों को रिश्वत दी गई थी। रिश्वत के लिए करोड़ों रुपयों की धनराशि कहां से आई? इसमें किन व्यापारिक घरानों का हाथ था? इस उपकार के लिए संप्रग-2 ने सरकार बचाने वाले व्यापारिक घरानों के व्यावसायिक हितों को न केवल पहली प्राथमिकता दी, बल्कि नीति-निर्धारण में उन कंपनियों की अनुचित दखलंदाजी को भी चुपचाप सहा। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हुई अनियमितता की जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित शुंगलू समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। खेल गांव के अंदर हजार फ्लैटों के निर्माण में निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन के लिए शुंगलू समिति ने दिल्ली के राज्यपाल को दोषी ठहराया है, वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री को भी घोटालों का जिम्मेदार भी ठहराया है, किंतु वास्तविकता यह है कि केंद्रीय सत्ता शिखर भ्रष्टाचारियों के संरक्षण में खड़ा है। शुंगलू समिति की रिपोर्ट पर कार्रवाई न कर प्रधानमंत्री संबंधित विभागों से उनकी टिप्पणी मांग रहे हैं। ऐसे में समिति गठित करने का क्या लाभ? क्या यह महज लीपापोती करने का प्रयास नहीं है? आइपीएल, राष्ट्रमंडल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम, सेटेलाइट स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसाइटी घोटाला, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर दागदार व्यक्ति की नियुक्ति और इन सब घोटालों से प्रधानमंत्री के अनजान होने की मासूम दलील से मनमोहन सिंह के साथ-साथ समूची संप्रग सरकार की विश्वसनीयता धुल चुकी है। प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार के मुखिया हैं। कल तक जिस देश को अत्यंत ऊर्जावान और उदीयमान सशक्त अर्थव्यवस्था के रूप में दुनिया सम्मान के भाव से देख रही थी और देश-विदेश के निवेशक यहां पूंजी निवेश के लिए उत्सुक थे, आज पूरी दुनिया उसे भ्रष्ट देश के रूप में देख रही है। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)
भ्रष्टाचार से लड़ने वालों को सुरक्षा की गारंटी नहीं
भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों (व्हिसल ब्लोअर्स) को सुरक्षा की गारंटी नहीं मिली। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई दिशा-निर्देश निर्धारित करने से इंकार कर दिया। अदालत का कहना था कि वह कानून नहीं बना सकती। मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने वकील एन राजा रमन और अजय मंडयाल की ओर से दाखिल जनहित याचिका (पीआइएल) को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। तेल माफिया द्वारा महाराष्ट्र में एक अतिरिक्त जिलाधिकारी को जिंदा जलाकर मारने की घटना का हवाला देते हुए याचिका में मांग की गई थी कि व्हिसल ब्लोअर्स को कानूनी सुरक्षा मुहैया कराने के लिए दिशा-निर्देश तय किए जाएं। दोनों वकीलों ने अपनी याचिका में अन्य कई घटनाओं का भी उल्लेख किया, जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों को माफिया और नेताओं द्वारा या तो मरवा दिया गया अथवा उन्हें धमका कर चुप करा दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से कहा था कि वह केंद्र को इस बारे में कानून बनाने के लिए निर्देश जारी करे। दोनों वकीलों की दलील थी कि ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिससे आरटीआइ कानून का इस्तेमाल करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले आरटीआइ कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और वकीलों को सुरक्षा प्रदान किया जा सके। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए इस बारे में कोई आदेश देने से इंकार कर दिया। हालांकि शीर्ष न्यायालय ने सलाह दी कि किसी खास मामले सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका काम कानून बनाना नहीं है और ऐसा करने के लिए वह सरकार से भी नहीं कह सकती है|
कालेधन की तह तक पहुंचे सरकार
सर्वोच्च न्यायालय ने काले धन की जांच सिर्फ हसन अली तक सीमित रखने और स्विस बैंक के अन्य खातेदारों के नामों का खुलासा करने में गुरेज पर सोमवार को फिर सरकार को आड़े हाथों लिया। अदालत ने न सिर्फ जांच में राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू ध्यान रखने की नसीहत दी, बल्कि धन के स्रोत का भी पता लगाने को कहा है। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि देश की जनता को पता चलना चाहिए कि जांच में क्या हो रहा है। काले धन की जांच का दायरा बढ़ाने की बात कह कर न्यायालय ने सरकार के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी है, क्योंकि इससे कई विशिष्ट और रसूख वालों पर जांच का फंदा कस सकता है। न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी व एसएस निज्जर की पीठ ने सरकार और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की पैरवी कर रहे सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम से पूछा कि जांच सिर्फ हसन अली तक ही सीमित क्यों है। सरकार के पास तो और लोगों के भी नाम हैं। उनके खिलाफ क्या कार्यवाही हो रही है। कोर्ट ने ईडी की ओर से पेश स्थिति रिपोर्ट देखने के बाद कहा, रिपोर्ट देखकर चुपचाप नहीं बैठा जा सकता। स्विस बैंक के खातेदारों का नाम उजागर करने में सरकार के संकोच पर अदालत ने कहा, देश की जनता को पता लगना चाहिए कि यहां क्या हो रहा है। शीर्ष अदालत ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वे नामों को सार्वजनिक करने में परहेज पर पीठ को संतुष्ट करें। अभी तक हुई जांच पर असंतोष जताते हुए पीठ ने कहा, इसमें कहीं पर भी धन का स्रोत जानने की कोशिश नहीं की गई है। धन का स्रोत महत्वपूर्ण है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू शामिल है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। पीठ ने कहा कि क्यों न इस मामले की जांच में आईबी, रॉ और सीबीआई आदि सरकारी एजेंसियों को भी शामिल किया जाए और उसकी निगरानी के लिए सेवानिवृत्त या अन्य अधिकारी की अध्यक्षता में एसआइटी गठित की जाए। पीठ के सवाल पर सुब्रमण्यम ने कहा, मामले में बहुत से कानून और पहलू शामिल हैं। जांच की जा रही है। उन्हें एक और स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का समय दिया जाए। सुब्रमण्यम ने कहा कि हसन ने ईडी को पत्र लिखकर अपनी और अपने परिवार की जान को खतरा बताया है और सुरक्षा की मांग की है। जिस पर ईडी ध्यान दे रहा है, लेकिन इस मामले की जांच कर रहे ईडी के अधिकारियों को भी सुरक्षा और संरक्षण दिए जाने की जरूरत है|
Monday, March 28, 2011
Thursday, March 24, 2011
राष्ट्रीयकृत बैंकों की भूमिका पर भी उठेगा सवाल
2जी घोटाले के मद्देनजर सीबीआई द्वारा दायर की जाने वाली चार्जशीट पूर्व संचार मंत्री ए. राजा की परेशानी और बढ़ा सकती है। उनके पूर्व निजी सचिव आरके चंदोलिया ने सीबीआई से अपने बयान में कहा कि वह सिर्फ अपने आका के निर्देश पर ही फाइल डिस्पोज करते थे। सूत्रों के अनुसार सीबीआई अपनी चार्जशीट में इस बात को जोरशोर से रखने जा रही है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा जिस तरह कुछ कंपनियों को फंडिंग की गई, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। सीबीआई अपनी चार्जशीट में यह जिक्र करने वाली है कि इस तरह के अपराध भविष्य में न हों, इसलिए इसमें संलिप्त लोगों के साथ कोई सहानुभूति न बरती जाए। सूत्रों के अनुसार, सीबीआई इस महीने में 2जी मामले में अपनी चार्जशीट दाखिल करने वाली है। सीबीआई इस चार्जशीट में चंदोलिया के उस बयान को भी उजागर करने वाली है, जिसमें उसने कहा कि उसका काम था फाइल को अपने वरिष्ठ (राजा) के सामने रखना। उसने सीबीआई को यह भी कहा था कि वह सिर्फ अपने आका के आदेश का पालन करते थे। सूत्रों के अनुसार, सीबीआई ने चंदोलिया की स्टेटमेंट को आधार बनाया और उन सुबूतों को इकट्ठा कर लिया है, जिससे यह साबित होगा कि राजा और चंदोलिया का भी इस घोटाले में हाथ था। सीबीआई अपनी चार्जशीट में कई सुबूतों के साथ यह साबित करने जा रही है कि चंदोलिया राजा के आदेशों का पालन करता था। सीबीआई अपनी चार्जशीट में इस बात का भी खुलासा करने जा रही है कि चंदोलिया के कई जगह मना करने के बावजूद भी ऐसे सबूत मिले हैं, जिसमें उसकी (चंदोलिया) की भूमिका थी। उसकी (चंदोलिया की) यूएएस लाइसेंस आवंटन में महत्वपूर्ण भूमिका थी, विशेषकर यूएएस लाइसेंस को स्वीकार करने में। सीबीआई ने सबूत में पाया कि आरके चंदोलिया यूएएस लाइसेंस के आवेदन को स्वीकार करने में काफी 'चूजी' थे और यही कारण रहा कि कुछ ऐसे दस्तावेज स्वीकार किए गए जो फर्जी थे। सूत्रों के अनुसार, पूरी चार्जशीट और ड्राफ्ट चार्जशीट जिसे बृहस्पतिवार को सीबीआई निदेशक के सामने प्रेजेन्टेशन के रूप में दिखाया जाएगा, उसमें इन सब मामलों का जिक्र होगा। इसके अलावा सीबीआई अपनी उस जांच को भी चार्जशीट में उजागर करने वाली है, जिसमें पाया था कि स्वान टेलीकॉम में जिस समय यूएएस लाइसेंस के लिए आवेदन किया था, उस समय वह योग्य पात्र ही नहीं था। जांच में मालूम हुआ कि मेसर्स टाइगर ट्रेडर्स प्रा. लि. का अधिकांश शेयर स्वान में था। जांच में पता चला कि जितने भी टाइगर ट्रेडर्स के पास स्वान के शेयर्स थे, वे अप्रत्यक्ष रूप से अनिल भाई धीरूभाई अंबानी ग्रुप द्वारा फंडेड थे। सीबीआई को जांच में पहले ही पता चल चुका है कि रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड जो एडीएजी ग्रुप की कंपनी है, को पहले ही कुछ सर्किल के लिए लाइसेंस मिल चुका था। इस तरह स्वान टेलीकॉम जो एडीएजी ग्रुप की एसोसिएट कंपनी थी, वह लाइसेंस प्राप्त करने योग्य ही नहीं थी। सीबीआई इस बात की जोर-शोर से जांच कर रही है कि स्वान टेलीकॉम के मालिक शाहिद बलवा के क्या संबंध कुछ हवाला आपरेटर, डी कंपनी और पाकिस्तान एवं श्रीलंका के कुछ संगठनों से तो नहीं हैं। सीबीआई इस बात की भी जांच कर रही है, जिसे वह अपनी चार्जशीट में दर्शा सकती है कि लूप टेलीकॉम के कुछ अधिकारियों ने मॉरीशस में भारतीय उच्चायोग से मुलाकात की और सीबीआई द्वारा भेजे गए एलआर की विस्तृत जानकारी मांगी थी।
पोल खुलने से हलकान
ऊंची कुर्सियों पर बैठे भ्रष्ट और तिकड़मी, देश की सुरक्षा यहां तक कि इसके अस्तित्व को भी दांव पर लगाने से नहीं चूकते; इसका नंगा खेल हम टू-जी स्पेक्ट्रम महाघोटाले और हवालाबाज हसन अली के मामलों में देख चुके हैं। ऊपर से ये दोनों मामले भले अलग दिखें लेकिन सतह को हल्का खुरचते ही आतंकियों और माफिया सरगनाओं के काले निशान हर जगह दिखने लगते हैं। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गिरफ्तार शाहिद बलवा के तार अगर कुख्यात माफिया सरगना दाऊद इब्राहिम से जुड़े बताए जा रहे हैं तो हसन अली को दुनियाभर के कुख्यात आतंकियों का बैंकर कहा जा रहा है। लेकिन असल चिंता की बात इन दोनों की वह गहरी पैठ है जो इन्होंने देश के सत्ता गलियारे में बना ली थी। शुक्र है कि सजग सुप्रीमकोर्ट और आक्रामक मीडिया के दबाव में बलवा और अली सरीखे तिकड़मी सीखचों के पीछे जा चुके हैं और उनके काले कारनामों के बेनकाब होने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। लेकिन दूसरी ओर एक और खतरनाक खेल शुरू हो गया है जिसमें इन मामलों से माफिया के पदचिह्नों को मिटाने की कोशिश है। खबर है कि दाऊद इब्राहिम सीबीआई के दफ्तर पर हमला बोल कर टू-जी स्पेक्ट्रम महा घोटाले के उन दस्तावेजों को नष्ट करने की फिराक में है जिनके सिरे इस माफिया सरगना तक पहुंचते हैं। खुद सीबीआई को मिली इस जानकारी के बाद उसके मुख्यालय में रखे इन दस्तावेजों की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और जांच में लगे लोगों को भी पूरा सतर्क रहने का निर्देश दे दिया गया है। लेकिन एक बात जो साफ दिखाई दे रही है वह है इन माफिया सरगनाओं का दुस्साहस, जो देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी के मुख्यालय पर भी हमले की साजिश रचने से नहीं डरते। यह साजिश सादिक बाशा के कथित आत्महत्या के रहस्य को और उलझा देने वाली है। बाशा न केवल स्पेक्ट्रम घोटाले से गहराई से जुड़ा था बल्कि वह पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए. राजा के काले कारनामों का राजदार भी था। घोटाले की रकम को दुबई और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों में खपाने की जिम्मेदारी उसी की थी और इस सिलसिले में वह दाऊद जैसे माफिया सरगनाओं के सम्पर्क में बताया जाता था। उसकी 'कथित आत्महत्या' उस वक्त हुई जब वह सीबीआई के बुलावे पर दिल्ली जाने की तैयारी कर रहा था। आत्महत्या के घंटों बाद बरामद दिखाए गए सुसाइड नोट में भी अनेक विसंगतियां थीं। हद तो तब हो गई जब उसकी लाश का पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर खुद शक के घेरे में आ गया। जाहिर है कि महाभ्रष्टाचारों की बांसुरी बजाने वाले देश के तमाम सफेदपोश पोल खुलने के डर से हलकान हैं। स्पेक्ट्रम महाघोटाले में आरोपपत्र दाखिल करने का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है उनकी बदहवासी बढ़ती जा रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और केंद्र में सचिव जैसे बड़े लोग इस आरोपपत्र के सीधे निशाने बनने जा रहे हैं। तमिलनाडु में सत्तासीन डीएमके के सुप्रीमो करुणानिधि की सांसद बेटी और उनकी उम्रदराज पत्नी आरोपों के घेरे में हैं। देश के सर्वशक्तिमान उद्योगपतियों और व्यापारियों पर आरोपों का शिंकजा कसता जा रहा है। ये सब वही लोग हैं जो लाइसेंस राज में भी कमाते थे और आर्थिक सुधारों की आड़ में भी इनका धंधा बदस्तूर है। यह पहला मौका है जब देश इनसे इनके किए का हिसाब मांग रहा है। महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता दावा कर रहे हैं कि हसन अली के साथ हवाला धंधे में जुड़े राज्य के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम उनके पास हैं। यदि ऐसा है तो उन्हें तत्काल यह पर्दाफाश करना चाहिए। ध्यान रहे, पूरा देश सब देख और सुन रहा है।
सत्ता की खरीद-फरोख्त
सत्ता बचाने के लिए सांसदों की खरीदारी की कलंकित परंपरा की परतें उघाड़ रहे हैं लेखक
विकिलीक्स ने 2008 में सरकार बचाने में कांग्रेस पार्टी द्वारा पैसों से संसद सदस्य खरीदने की चर्चा पर बहस को ताजा कर दिया। यह कोई अंतिम और पहला अध्याय नहीं है। 1991 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार बनी थी। सरकार के पास पूर्ण बहुमत नहीं था। शुरू में विश्वास प्रस्ताव आया तो पूरे विपक्ष ने उसे काम करने की छूट दे दी, क्योंकि तुरंत चुनाव नहीं हो सकते थे। 6 दिसंबर,1992 को विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद पूरे विपक्ष का फैसला हुआ कि इस राष्ट्रीय कलंक की सरकार को तुरंत सत्ता से बाहर कर दिया जाए। बजट सत्र में ही सम्मिलित अविश्वास प्रस्ताव आया। दोनों तरफ से लामबंदी शुरू हो गई। मेरे आवास 7, पंडित पंत मार्ग के बगल में 9 नंबर की कोठी में रामलखन सिंह यादव रहते थे। जनता दल के सदस्यों की लंबी लाइन मैंने अपने घर से देखी। रामलखन यादव ने मुझे भी प्रलोभन दिया-एक करोड़ रुपये, एक पेट्रोल पंप या गैस एजेंसी और महत्वपूर्ण लोगों के लिए मंत्री का पद। वीपी सिंह के बहुत से करीबी लोगों ने इस अभियान में निष्ठा बदल डाली। गिनती में एक वोट कम हो रहा था, क्योंकि दल से बाहर होने के लिए एक-तिहाई सदस्यों की जरूरत थी। मैं पैदल अपने आवास से संसद जा रहा था। तभी रास्ते में अभूतपूर्व घटना घटी। मुरादाबाद के एमपी हाजी गुलाम मोहम्मद संसद की ओर से एनेक्सी स्थित अस्पताल जा रहे थे। पंत मार्ग की कोठी से अपने ऑपरेशन को अंजाम देने के बाद सतीश शर्मा, बलराम सिंह यादव एक गाड़ी में थे। हाजी को बीच सड़क से जबरन टांग लिया गया। जनता दल तोड़ने का कोटा पूरा हो गया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के नौ सांसद थे। उनके साथ सामूहिक सौदा हो गया। उन आदिवासी सांसदों ने प्राप्त रकम को बैंकों में जमा कर दिया। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया। बाद में नरसिम्हा राव सरकार में रामलखन सिंह यादव और अजित सिंह दोनों कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। अल्पमत को बहुमत में बदलने का यह कांग्रेस प्रबंधकों का प्रथम प्रयास था, जिसमें अवैध साधनों का इस्तेमाल किया गया। जो पार्टी दलबदल विरोधी कानून पारित कराने का श्रेय लेकर भारतीय राजनीति में शुचिता और पवित्रता लाने का दावा करती थी, उसके ही प्रबंधकों ने देश के सर्वोच्च आसन की रक्षा में जितने गलत रास्ते हो सकते हैं, उन सबका इस्तेमाल कर पूरे पांच साल सत्ता का भोग किया। 12वीं लोकसभा अल्पजीवी थी। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 21 दलों का मोर्चा काम कर रहा था। सहसा किसी ने जयललिता के मन में प्रधानमंत्री होने की लालसा पैदा कर दी। उन्हें पक्का भरोसा दिया गया कि यदि आप वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लें तो गैर भाजपाई दल आपके नेतृत्व में सरकार बनाने को राजी हो जाएंगे। उनकी पार्टी के 22 सदस्यों का समर्थन खींच लेने से सरकार अल्पमत में आ गई। स्वाभाविक था सरकार को फिर से विश्वास मत लेने की जरूरत थी। सरकार के प्रबंधक प्रमोद महाजन और जार्ज फर्नाडीस के नेतृत्व में सक्रिय हुए। उस सरकार ने कांग्रेसी हथकंडों का इस्तेमाल करने में कोई चूक नहीं की। निर्दलीय, पूर्वोत्तर के एमपी उसके जाल में फंसे। उस सरकार में मंत्री रहे लोगों को आदर्श बघारने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यदि बसपा रात में समर्थन का ऐलान न करती तो उसके सांसदों का सौदा हो चुका था। धोखे में वाजपेयी सरकार एक वोट से परास्त हो गई, किंतु वोट के समय तक मायावती को मनाने का क्रम जारी रहा। उन्हें प्रमोद महाजन सदन में ही संदेश देने आए कि कल ही कल्याण सिंह से इस्तीफा लेकर आपको उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। उनका जवाब था-देर हो चुकी है। अब तो प्रधानमंत्री जवाबी भाषण दे रहे हैं। भारत सरकार ने अमेरिका के साथ परमाणु करार कर लिया। संप्रग के मजबूत हिस्सेदार वामपंथी दलों ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। सरकार अल्पमत में आने की बात कही जाने लगी, लेकिन ऐसा नहीं था। प्रारंभ से ही समाजवादी पार्टी का सरकार को समर्थन था, जिसे पार्टी ने कभी वापस नहीं लिया था। फिर भी, कांग्रेस अपनी पुरानी चालों से कहां बाज आने वाली थी। कांग्रेस के प्रबंधक सक्रिय हो गए। कुछ दलों व पूर्वोत्तर के सांसदों को ऐसे अवसर की तलाश रहती है। कांग्रेसी प्रबंधक लेन-देन करने में माहिर खिलाड़ी हैं। इस बार की कमान अहमद पटेल के हाथ में थी। दोनों पक्षों में लामबंदी जबर्दस्त थी। कई विशेषज्ञों से परामर्श के बाद समाजवादी पार्टी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि परमाणु करार को बहाना बनाकर सरकार अस्थिर न की जाए। वामपंथी दलों के भीतर करात की पहल की घोर निंदा हुई। वरिष्ठ सीपीएम लीडर व तत्कालीन लोकसभा स्पीकर के खिलाफ पार्टी को कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि वह कहते थे इस पहल से पार्टी भाजपा के पाले में नजर आएगी, जिसका दंड पार्टी को चुनाव में भुगतना पड़ेगा। यह चेतावनी सही नजर आई। कुछ दलों का समर्थन का फैसला राजनीतिक कारणों से था। उनका नोट के लेन-देन से कोई रिश्ता नहीं था। किंतु कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा पूर्वोत्तर के आधा दर्जन सांसदों व उत्तर भारत के निर्दलीय सांसदों को मोटी रकम का भुगतान किया। विकिलीक्स ने बहुत सतही ढंग से इसका जिक्र किया है। अजित सिंह का उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री से राजनीतिक सौदा हो गया था, क्योंकि वामपंथियों ने मायावती को भविष्य का प्रधानमंत्री बनाने का सपना दिखला दिया था। इसलिए जयललिता की तर्ज पर मायावती दिल्ली में दाखिल होकर सरकार समर्थक उत्तर प्रदेश के सांसदों को तोड़ने में लग गई। सपा के चार सांसद उनके पाले में चले गए। अजित अपने तीन साथियों के साथ उनके खेमे में दाखिल हो गए। कुछ नादान खिलाडि़यों ने भाजपा के ही सांसदों को बचकाने ढंग से तोड़ने की कोशिश की जिसका कुफल लोकसभा में नोटों के बंडल लहराने के रूप में सामने आया। कांग्रेसी सत्तालोलुप राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं, उन्हें सरकार की हिफाजत के लिए किसी भी हथियार का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं है। विकिलीक्स ने किसी रहस्य से पर्दा नहीं उठाया। उसकी सूचना अधूरी ही नहीं, लचर साक्ष्य के कारण गलत भी है। विदेशी जासूस के सतही रहस्योद्घाटन को लेकर हल्ला कालातीत है। इससे अधिक जानकारी उन सभी लोगों के पास है जो उस लोकसभा के सदस्य थे। संयोगवश खरीद-फरोख्त के लिए याद की जाने वाली तीनों लोकसभाओं का साक्षी लेखक भी है और बहुत सी घटनाओं को आंखों के सामने घटते देखा है। उन्हें देखने और जानने से क्या होगा, जब देश का जनमानस ही चुनाव में धन लुटाने वालों की पीठ ठोकता है। (लेखक सपा के महासचिव हैं)
पीएम अपने पुराने बयान पर कायम
दोबारा मिले जनादेश का हवाला देकर विकिलीक्स रहस्योद्घाटन पर विपक्ष को चुप कराने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बुधवार को नैतिकता के कठघरे में घेरने की कोशिश हुई। भाजपा के साथ जदयू और वामदलों ने भी कुछ अकाट्य तर्को के साथ उन्हें आगाह किया कि इतिहास से डरें। पैसे के बदले वोट का नजारा सबकी आंखों के सामने हुआ है। संसदीय समिति भी मान चुकी है कि इसकी पर्याप्त जांच होनी चाहिए। लिहाजा ऐसा काम न करें कि उनकी रहबरी पर ही सवाल खड़े हो जाएं। विपक्ष ने मांग की कि इसकी जांच सीबीआइ से हो और उसमें उन लोगों के भी नाम जोड़े जाएं जिनका विकिलीक्स में जिक्र है। राजग ने पीएम के जवाब से असंतोष जताते हुए वाकआउट भी किया। बावजूद इसके प्रधानमंत्री पिछले सप्ताह संसद में दिए गए अपने बयान पर न केवल कायम रहे, बल्कि उन्होंने विपक्ष को नसीहत भी दी कि किसी देश और उसके दूतावास के बीच की अपुष्ट बातचीत पर शोर मचाना काफी खतरनाक हो सकता है। उन्होंने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी पर यह कटाक्ष भी किया कि जनता ने हमें स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावों में जनादेश दिया है। अब आप साढ़े तीन साल और इंतजार कीजिए। बीते सप्ताह संसद में विकिलीक्स पर प्रधानमंत्री के बयान को लेकर बुधवार को दोनों सदनों में चर्चा के दौरान विपक्ष की ओर से सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, गुरुदास दासगुप्ता, शरद यादव आदि ने आगाह किया कि किसी की आड़ में छिपकर चेहरा बचाने की कोशिश न करें। सुषमा ने कहा कि विकिलीक्स ने विपक्ष के आरोपों को पुष्ट किया है कि सरकार बचाने के लिए खरीद फरोख्त की गई। विकिलीक्स ने घटना का जिक्र किया है और उसमें सच्चाई के अलावा कुछ नहीं। पीएम के बयान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी आदत है कि वह 2जी को राजा के माथे और कामनवेल्थ को कलमाड़ी के माथे फोड़कर अपना बचाव करते रहे हैं। गुरुदास ने भी कहा कि जनादेश मिलने के साथ सारे अपराध खत्म नहीं हो जाते। सरकार के घाव को कुरेदते हुए उन्होंने कहा कि 84 के सिख दंगे के बाद कांग्रेस बड़े बहुमत से जीती थी, लेकिन क्या सरकार उस दाग से बच सकती है? राज्यसभा में जेटली ने कहा कि लेन देन के दस्तावेजी सबूत हैं, लेकिन सरकार गुनहगारों को सजा दिलाने की बजाय उन पर उंगली उठा रही है जिन्होंने इसका पर्दाफाश किया। शरद यादव ने पीएम के इकबाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि सीवीसी और 2जी मामले में सरकार को कोर्ट के शरणागत होना पड़ा है। विकिलीक्स में जो खुलासा हुआ वह संसद में खुली आंखों से दिख चुका है। सपा सरकार के बचाव में आगे आई। मुलायम सिंह ने रालोद अध्यक्ष अजित सिंह की ओर इशारा करते हुए कहा कि खुलासे में जिनका नाम लिया गया उन्होंने सरकार के विरोध में वोट डाला था। लिहाजा विकिलीक्स का खुलासा ही गलत है। बसपा ने सच्चाई सामने लाने की मांग की। प्रधानमंत्री ने विपक्षी आरोपों के जवाब में उलझने के बजाय मामले को राजनीतिक मोड़ देते हुए अपना बचाव किया। उन्होंने भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि आडवाणी को विश्वास था कि प्रधानमंत्री बनना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और इसीलिए उन्होंने मुझे कभी माफ नहीं किया। उन्होंने पुराने बयान को दोहराते हुए कहा कि 2008 में विश्वास मत हासिल करने के लिए कांग्रेस व उनकी सरकार के किसी व्यक्ति ने न तो गैर कानूनी रास्ता अपनाया और न ही उन्होंने इसके लिए किसी को अधिकृत किया था। उनके जवाब से पहले लोकसभा में कपिल सिब्बल व राज्यसभा में चिदंबरम ने विपक्षी हमलों की धार भोथरी करने की कोशिश की। सिब्बल ने विकिलीक्स में भाजपा नेताओं के अमेरिका से रिश्तों का पर्दाफाश करते हुए आडवाणी पर दोहरी भाषा बोलने का आरोप लगाया। उच्च सदन में चिदंबरम ने इस बारे में हुए स्टिंग आपरेशन को लेकर कहा कि विपक्ष ने सरकार गिराने के लिए यह साजिश रची थी। अपने इन सेनापतियों के विपक्ष से दो-दो हाथ होने के बाद प्रधानमंत्री ने भाजपा और लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ मोर्चा खोला। इस दौरान उन्होंने विकिलीक्स के खुलासे पर फिर यह कहा कि उसकी पुष्टि या जांच संभव नहीं। इस बारे में जिनका हवाला दिया गया है उनमें से कई ने खंडन किया है। सांसदों को खरीदने के मामले की संसदीय समिति ने जांच की थी और उसका निष्कर्ष था कि इस बारे में पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। उन्होंने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी द्वारा दी गई व्यवस्था का जिक्र भी किया|
Wednesday, March 23, 2011
काला सौदा, काली जुबां
काले धन के देश के सबसे बड़े सौदागर की जुबान खुलने लगी है और ऐसे खतरनाक रहस्य खुलने लगे हैं जिनसे आप वाकई चिंता में डूब जाएंगे। घोड़े और कबाड़ का धंधा करने वाला हसन अली देश में ऐसा समानांतर बैंक चला रहा था जिसका काम बड़े राजनेताओं, अफसरशाहों और बिचौलियों की अवैध कमाई को पहले विदेश भेजना और बाद में इसे वापस लाकर वैध सम्पदा में बदलना था। देश की सर्वोच्च अदालत की पहल पर गिरफ्तार अली ने पूछताछ में जो नाम लिये हैं; उनमें महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी बताए जा रहे हैं। हवाला के गोरखधंधे में अली विदेशी बैंकों की भी खुलकर मदद लेता था और काली कमाई को सफेद करने के लिए देश के शेयर बाजारों का इस्तेमाल करता था। इस काम के लिए अली का पसंदीदा देश मारीशस था, जो दुनिया भर की काली कमाई को धोने के सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। आश्र्चय नहीं कि टू-जी स्पेक्ट्रम महाघोटाले में शामिल कई कम्पनियों के सिरे भी इस छोटे से द्वीपराष्ट्र से ही निकलते दिख रहे हैं। इतना ही नहीं, जिस विदेशी निवेश की ओर हमारा देश टकटकी लगाए बैठा है, उसका एक बड़ा हिस्सा इसी काली कमाई का हुआ करता था। आर्थिक सुधारों के शुरू होने के बाद हमारे शेयर बाजारों ने जो छलांगें लगाई थीं उसका बड़ा कारण विदेशी निवेशकों द्वारा इन बाजारों में भारी मात्रा में निवेश था। इसके लिए विदेशी निवेशकों का प्रिय माध्यम पार्टिसिपेटरी नोट्स हुआ करते थे जिसमें यह बताने की जरूरत नहीं होती थी कि वास्तविकता में पैसा लगाने वाला कौन है और कहां का है।अली ने भी भ्रष्ट राजनेताओं और अफसरों की काली कमाई को सफेद बनाने के लिए इसी रास्ते को चुना था। अब यह समझा जा सकता है कि हवाला के आरोप बार- बार लगने के बावजूद क्यों अली बेखौफ घूमता रहता था? जिसके ऊपर सत्ता के सरमायेदारों का हाथ हो उसे हाथ लगाने की जुर्रत कौन कर सकता है? शायद इसी लिए महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सरकारी प्रकोप झेलना पड़ रहा है जिसने अली से पूछताछ की थी और बकायदे उसकी सीडी भी बनाई थी। हसन अली से प्रवर्त्तन निदेशालय (ईडी) की पूछताछ में नए खुलासे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसकी रिमांड तीन दिनों के लिए और बढ़ा दी है जिसमें और खतरनाक खुलासों की सम्भावना है। अली का सबसे खतरनाक पक्ष वह है जिसमें उसके रिश्ते हथियारों के सौदागर अदनान खशोगी और दुर्दात आतंकवादियों से बताए जा रहे हैं। ईडी यह जानने की कोशिश में है कि केवल पांच करोड़ रुपए से खुले अली के बैंक खाते में देखते-देखते चौवन हजार करोड़ रुपए की बाढ़ कहां से आ गई? दुबई, सऊदी अरब से उसके खाते में धनवर्षा करने वाले छुपे चेहरे कौन थे? आशंका है कि अमेरिकी ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद दुनिया भर के बैंकों पर लगी बंदिशों को देखते हुए आतंकियों ने अली के खाते का जी भर कर इस्तेमाल किया। काला धन हमारे लिए कितना बड़ा खतरा है, क्या अब भी यह बताने की जरूरत है?
सच से डरे हुए शासक
विकिलीक्स के खुलासे पर प्रधानमंत्री के बयान को देश को गुमराह करने वाला बता रहे हैं लेखक
विकिलीक्स ने एक बार फिर भारत के भ्रष्ट और झूठे नेताओं के चेहरे बेनकाब कर दिए हैं और सत्ता पक्ष के पास अपनी निर्लज्जता छिपाने के लिए लोकोक्ति के अनुसार सूखे पत्ते तक का सहारा नहीं बचा है। विकिलीक्स के केबल भले ही दुनिया में गलत आचरण करने वाले शासकों के महलों में खलबली मचा रहे हों, लेकिन आज तक किसी ने भी उनकी सत्यता या प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया। केवल भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक हास्यास्पद बयान दिया, जिसमें न केवल उन्होंने विकिलीक्स पर संदेह किया, बल्कि यह तक कह दिया कि सांसदों को रिश्वत देने के मामले की जांच के लिए गठित समिति ने यह निष्कर्ष निकाला था कि सांसदों को रिश्वत देने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि यह मामला 14वीं लोकसभा से जुड़ा था। उसके बाद इसी मुद्दे को लेकर जो दल चुनाव में उतरे वे जनादेश प्राप्त नहीं कर सके और कांग्रेस को उनसे ज्यादा सीटें मिलीं। यह एक हारे हुए तथा हताश प्रधानमंत्री का ही बयान हो सकता है क्योंकि यह तर्क कौन स्वीकार करेगा कि यदि कोई अपराधी चुनाव में जीत जाए तो उसकी जीत उसके अपराधों को खत्म कर देती है। प्रधानमंत्री ने सांसदों को रिश्वत देने के मामले की जांच के लिए बिठाई समिति की रपट का निष्कर्ष भी गलत उद्धृत किया। हालांकि इस समिति के चार सदस्य वे थे जिन्होंने सदन में विश्वास मत पर सरकार का समर्थन किया था। इसके बावजूद इस सात सदस्यीय जांच समिति के तीन सदस्यों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कुछ सांसदों को रिश्वत दिए जाने का स्पष्ट मामला सिद्ध होता है। जबकि शेष चार सदस्यों के बहुमत के कारण समिति की रपट में माना गया था कि संजीव सक्सेना चाहे-अनचाहे रिश्वत देने वाले थे इसलिए वह संविधान के अनुच्छेद 105 (2) के अंतर्गत संरक्षण पाने पात्र नहीं हैं। इसके अलावा रेवती रमन सिंह के व्यवहार पर भी समिति ने संदेह व्यक्त करने वाली स्पष्ट टीका की थी। संसदीय जांच समिति ने कहीं भी यह नहीं कहा कि सांसदों को रिश्वत देने का मामला प्रमाणित नहीं होता है। इसके विरुद्ध उसके निष्कर्ष में लिखा गया कि रिश्वत देने वाले सक्सेना का बयान असंतोषजनक और सत्य से परे है। यानी समिति ने यह स्पष्ट रूप से माना था कि सक्सेना चाहे-अनचाहे रिश्वत देने वाले तो थे ही और इस संदर्भ में पूरी छानबीन की आवश्यकता है। मनमोहन सिंह ने इन तमाम तथ्यों की अनदेखी की। उस देश का क्या होगा जहां का प्रधानमंत्री सांसदों को रिश्वत देकर अपनी सत्ता और सरकार बचाने की कोशिश करे! क्या ऐसा देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा कर सकता है? क्या ऐसे देश के परमाणु संयंत्र सुरक्षित रह सकते हैं? क्या ऐसे देश के छात्र और युवा बलिदान देने के लिए तत्पर सैनिक या जनता के हित की रक्षा के लिए सब कुछ दांव पर लगा देने वाले अफसर बनने की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं? पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के विरुद्ध कार्रवाई के लिए समूचे विपक्ष और मीडिया को एकजुट लड़ना पड़ा। ए. राजा के सहयोगी सादिक बाशा की रहस्यमय मृत्यु हो गई, जबकि वह सीबीआई के सामने पेश होने की तैयारी में था। बाशा का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने इस्तीफा दे दिया। हर दिन एक नए घोटाले का खुलासा हो रहा है। ऐसी स्थिति में भारत के परमाणु संयंत्र और यूरेनियम भंडार माओवादी या तालिबानी आतंकवादियों के हाथों में नहीं जा सकते क्या इसकी कोई गारंटी ले सकता है? विकिलीक्स के सर्जक और संचालक जूलियन असांजे ने एक भारतीय चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा कि भारत के प्रधानमंत्री विकिलीक्स के मामले में जनता को गुमराह कर रहे हैं। विकिलीक्स ने जो केबल भारत के संदर्भ में उद्घााटित किए वे अमेरिकी राजनयिकों द्वारा वाशिंगटन में अपने विदेश विभाग को भेजे गए थे। असंाजे का कहना है कि भारत में अमेरिकी राजदूत या अन्य राजनयिकों को अपने ही विदेश मंत्रालय से झूठ बोलने की क्या जरूरत हो सकती है? अगर ऐसा होता है तो यह अमेरिका में बहुत बड़ा अपराध है। अभी कुछ समय पहले तक भारत सूचना-प्रौद्योगिकी के कीर्तिमान, भारतीय डॉक्टरों, इंजीनियरों तथा विश्वव्यापी औद्योगिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गौरवशाली उद्योगपतियों के कारण पूरी दुनिया में प्रतिष्ठा और ख्याति अर्जित कर रहा था, वह आज जिंदा भ्रष्ट देश के नाते जाना जा रहा है। दुनिया के हर कोने में भारत के नेताओं के शर्मनाक भ्रष्टाचार, संसद में इन मुद्दों को लेकर चल रहे लगातार गतिरोध तथा सत्ता पक्ष द्वारा विपक्ष को इस प्रकार के विषय उठाए जाने की अनुमति न देने के समाचार उन सभी करोड़ों भारतीयों का सिर शर्म से झुका रहे हैं जो कल तक गौरवशाली भारतीय के नाते रह रहे थे। वे जानते हैं भारत भ्रष्ट देश नहीं है। न ही भारत कायर और ठगों का देश है। सिर्फ कुछ नेता भारत की राजनीति और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उनकी आंखों में भारत है ही नहीं। सत्ता में बैठे लोग एक विदेशी मूल की उस महिला के हाथों में भारत की तकदीर दे बैठे हैं जिनका भारत के चित्त, मर्म और आत्मा के साथ कोई संबंध ही नहीं रहा। इसीलिए क्वात्रोची के खाते खुलवाए, सीबीआई को कांग्रेस की घरेलू शैतानी मशीनरी का पुर्जा बना दिया गया, हिंदुओं को आतंकवाद से जोड़कर पूरे देश की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता को लांछित करने का प्रयास किया गया और अब मध्य प्रदेश से एक ही किस्म और एक ही आस्था से जुड़े मामले एनआइए को सौंपकर मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने का प्रयास किया गया है। मानो इस देश के मुसलमान हिंदुओं पर आघात से खुश होकर कांग्रेस को वोट दे देंगे। यह गलत धारणा है। मुस्लिम समाज जिसे भी वोट देता है अपनी बुद्धि और विवेक से सोच कर देता है, यह बिहार और गुजरात के मुसलमानों ने सिद्ध किया है। लेकिन समाज को जाति और मजहब के आधार पर बांटकर अंग्रेजों को भी लज्जित करने वाले भ्रष्टाचारी यदि सत्ता का संरक्षण पाने लगें तो फिर संसद की लड़ाई सड़क तक ले जाने के सिवाय और कोई विकल्प बचता नहीं। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)
मुख्यमंत्रियों के काले धन को भी अली ने लगाया ठिकाने
हजारों करोड़ रुपये की कर चोरी के आरोपों से गुजर रहे हसन अली ने 90 के दशक में तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों की काली कमाई को भी ठिकाने लगाया था। एक अंग्रेजी अखबार में इस संबंध में रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद मंगलवार को महाराष्ट्र विधान परिषद में यह मामला उठा। विधान परिषद में विपक्ष के नेता पांडुरंग फुंदकर ने हसन अली संबंधी रिपोर्ट वाली अखबार की प्रति सदन में दिखाते हुए यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ये तीन पूर्व मुख्यमंत्री कौन हैं। हसन अली के वक्तव्य का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि उसने वर्ष 1990 से 2000 के बीच शेयर बाजार में निवेश करने के लिए नौकरशाहों तथा तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के धन का इस्तेमाल किया। फंुदकर ने इसी रिपोर्ट के हवाले से कहा कि वर्ष 1999 से 2000 के बीच शेयर बाजार में काफी काले धन का निवेश हुआ और अली ने नेताओं, नौकरशाहों और मुख्यमंत्रियों के धन का इस्तेमाल किया। इसके जवाब में महाराष्ट्र के स्कूली शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा ने कहा कि जिन दस्तावेजों के आधार पर खबर प्रकाशित हुई है, उनकी प्रमाणिकता जांचने की जरूरत है क्योंकि ये सरकारी दस्तावेज नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यह मालूम करना होगा कि ये दस्तावेज कहां से आए। किसी पत्रिका या वेबसाइट ने सूचना दी है, महज इस आधार पर खबर पर भरोसा नहीं किया जा सकता। मंत्री के जवाब पर असंतोष जताते हुए शिवसेना तथा भाजपा सदस्य नारेबाजी करते हुए सभापति के आसन के निकट आ गए। इसके बाद सभापति शिवाजीराव देशमुख ने बैठक 15 मिनट के लिए स्थगित कर दी। सदन की बैठक दोबारा शुरू होने पर सभापति ने मंत्री को दस्तावेजों की प्रामाणिकता जांचने के निर्देश दिए|
ट्रस्ट के जरिये हिमाचल में मंदिर-मठ बनाने की होड़
देशभर के जाने-माने संत व प्रवचनकर्ता हिमाचल में अपने ठिकाने तलाश रहे हैं। बर्फ की चांदी से ढके पर्वतों के आंचल में संतों को एक अदद आशियाना नसीब होना यहां भू-खरीद की सख्त धाराओं के कारण कठिन है, इसीलिए ट्रस्ट एक बढि़या विकल्प बनकर उभरा है। धर्म या समाज के प्रति सरोकारों के जरिए हिमाचल की प्राइम जगहों पर जमीन लेने और फिर आलीशान संपदा खड़ी करने का चलन बढ़ता जा रहा है। दर्जनों ने तो ट्रस्ट के जरिये बड़े-बड़े भवन बनाए हैं और निगाहें सरकार की कृपादृष्टि पर भी हैं। लिहाजा सरकारी जमीन पट्टे पर लेने के लिए ढेरों आवेदन पहुंच रहे हैं। हिमाचल की शांत वादियों में अधिकांश संत, महात्माओं की दृष्टि उन जगहों पर है जो सुगम हों, लिहाजा कुल्लू या कांगड़ा जिलों में प्राथमिकताएं तय हो रही हैं। सोलन जिले में भी कई धार्मिक न्यासों के नाम पर जमीन तेजी से खरीदी जा रही है। गर्मी आते ही प्रदेश की ठंडी वादियों में कई सत्संग स्थायी कुटिया की इच्छा से भी जुड़े हैं। हाल में सोलन जिले में बाबा रामदेव के न्यास को सरकार ने 96 बीघा भूमि क्या दे दी, अन्य धर्मगुरुओं की आस भी जगी है। सूत्रों के अनुसार पालमपुर के लिए भी ऐसे कागज चलने शुरू हो गए हैं। ट्रस्ट से जुड़े लोग दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। राजनेताओं के इर्द-गिर्द भी प्रयास हो रहे हैं, लेकिन जिनका सरकारी दांव न लगे वह गिफ्ट डीड या ट्रस्ट के नाम पर निजी भूमि ले रहे हैं। हालांकि राज्य के भूसंरक्षण अधिनियम की धारा 118 के तहत कोई भी गैर हिमाचली यहां जमीन नहीं ले सकता, लेकिन ट्रस्ट के नाम पर जमीन खरीदने की अनुमति सरकार अपने स्तर पर दे सकती है। सरकार अपनी जमीन भी लीज पर दे सकती है, लेकिन धार्मिक नेताओं की असल समस्या यह है कि बहुत बड़ी जमीन लोगों से निजी तौर पर लेने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है और उसके बाद सरकार के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे में लीज ही शार्टकट व कम सिरदर्द वाला रास्ता है। अभी तक सोलन, साधुपुल (बाबा रामदेव), डगशाई- विश्वास मेडिटेशन आश्रम, पालमपुर- डेरा सच्चा सौदा, पूरे प्रदेश में कई जगह राधा स्वामी, ब्यास, सलोगड़ा व ऊना आसाराम बापू (कुटिया), कुल्लू- विश्व जागृति मिशन, डडौर- निरंकारी, अंब-महंत सूर्यनाथ, शिमला- मानव उत्थान सेवा समिति (सतपाल महाराज) समेत कई धार्मिक न्यास बनाए जा चुके हैं|
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