सरकार के गलियारों में कितनी अंधेर है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुद संसद ने जिस कानून को रद कर दिया था, उसी के आधार पर पांच साल तक शुल्क वसूली जारी रही। दिलचस्प यह है कि शुल्क देने वाले भी इससे अनजान बने रहे कि नए कानून के आधार पर उनसे इसकी वसूली नहीं की जा सकती है। यह मामला बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में पैदा होने वाले लाख का है। लाख एक रेजिन है, जो यहां पाए जाने वाले कुछ चुनिंदा पेड़ों से निकलता है। लाख जैसी वन उपजों के निर्यात पर सेस लगाने वाला वनोपज उपकर कानून 1966 संसद ने वर्ष 2006 में ही निरस्त कर दिया था। लेकिन इस सेस यानी उपकर की वसूली बंद करने में सरकार को पांच साल लग गए। लाख निर्यातकों और उनके संगठन शेलैक एंड फॉरेस्ट प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (शेफैक्सिल) को भी पता नहीं था कि यह कानून समाप्त हो चुका है। अब उन्हें यह सेस चुकाने की जरूरत नहीं है। केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) ने पांच साल बाद 26 जुलाई, 2011 को सीमा शुल्क अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी किया। इसमें उनसे लाख पर लगे उपकर की वसूली रोकने को कहा गया है। वर्ष 2010-11 में 211 करोड़ रुपये के लाख उत्पादों का निर्यात किया गया था। चूडि़यों में इसका उपयोग तो जगजाहिर है, लेकिन खाद्य पदार्थो में चमक लाने और वुड फिनिश जैसे कामों में भी इसका इस्तेमाल होता है। शेफैक्सिल की कार्यकारी निदेशक देबजानी रॉय ने निर्यातकों को वर्ष 2009 में बंदरगाहों पर नई सॉफ्टवेयर प्रणाली लगने के बाद इस उपकर का पता चला। इसकी वजह यह है कि प्रति क्विंटल लाख उत्पाद के निर्यात पर महज 2 रुपये 30 पैसे का सेस वसूला जाता था। इसीलिए उन्हें इसका पता ही नहीं चला। वैसे सितंबर, 2006 से इस सेस के जरिये कुल वसूली भी महज 5 लाख रुपये की रही है।
Saturday, July 30, 2011
कानून पांच साल पहले रद पर जारी रही शुल्क वसूली
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