जिस मकसद को लेकर तीन दशक पहले उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त की स्थापना की गई थी, उसे पूरा करने में आज भी वह अक्षम है। लोक सेवकों के कुप्रशासन, भ्रष्टाचार व पद के दुरुपयोग के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने के लिए लोकायुक्त प्रशासन के पास न पर्याप्त संसाधन हैं और न ही अधिकार। ऐसे में भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद है और आम आदमी पस्त। दरअसल, देश के सबसे बड़े राज्य में भी भ्रष्टाचारियों से निपटने की मौजूदा व्यवस्था के कारगर न होने का ही नतीजा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ समाजसेवी अन्ना हजारे के आवाज उठाते ही बड़ी संख्या में यहां के लोग भी उनके साथ खड़े हो गए। राज्य में लोकायुक्त जैसी संस्था तो पिछले 34 वर्ष से है, लेकिन उसके पास पर्याप्त स्टाफ व अधिकार न होने से उसकी भूमिका भी कुछ खास नहीं रही। प्रशासन के पास न ही कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी है और न ही अभियंत्रण संबंधी तकनीकी जांच के लिए तकनीकी अधिकारी उपलब्ध हैं। ऐसा नहीं है कि लोकायुक्त ने सूबे में भ्रष्टाचार व कुप्रशासन पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को अधिनियम में संशोधन के लिए समय-समय पर प्रस्ताव नहीं भेजे, लेकिन प्रस्तावों पर चाहे पूर्व की सरकारें रहीं हों या फिर मौजूदा, सभी कुंडली मारे ही बैठी रहीं।
जांच का दायरा सीमित : भले ही भ्रष्टाचार में शासन-सत्ता के शीर्षस्थ पद से लेकर गांव के प्रधान तक अब कहीं ज्यादा लिप्त पाए जा रहे हों, लेकिन राज्य में लोकायुक्त की जांच के दायरे में न सूबे की मुखिया मुख्यमंत्री हैं और न ही ग्राम प्रधान। ऐसा भी नहीं है कि राज्य के तकनीकी विद्यालय, विश्वविद्यालय, प्राविधिक शिक्षा विश्वविद्यालय, चिकित्सा विश्वविद्यालय, अनुदानित शिक्षण संस्थाओं आदि में भ्रष्टाचार नहीं हो रहा है, लेकिन तमाम मामले प्रकाश में आने के बावजूद लोकायुक्त उनकी तरफ नहीं देख सकते क्योंकि ये भी उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं। कर्नाटक, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में जहां लोकायुक्त को ढेर सारे अधिकार हैं, वहीं यूपी में भ्रष्टाचार के बड़े से बड़े मामले में लोकायुक्त खुद कोई पहल नहीं कर सकते।
उन्हें किसी मामले का स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार ही नहीं दिया गया है। इतना ही नहीं अगर अधिकार क्षेत्र वाले किसी मामले में नियमानुसार शिकायत आ भी जाए तो लोकायुक्त उसकी जांच से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की वह सिर्फ राज्य सरकार (मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव) से सिफारिश कर सकते हैं जिस पर कार्रवाई करना या न करना, सरकार की मर्जी पर है।
ऐसे होती है शिकायत : लोकायुक्त प्रशासन के पास भ्रष्टाचार की शिकायत कोई भी कर सकता है। इसके लिए उसे शपथ पत्र के साथ तय प्रपत्र को भरकर देना होता है। एक हजार रुपये भी बतौर जमानत ली जाती है, यद्यपि किसी भी मामले में इसे लोकायुक्त माफ भी कर सकते हैं।
अभी जो हैं लोकायुक्त के दायरे में : मंत्री, विधायक , नगर निगमों के महापौर व पार्षद, नगर पालिका परिषद व नगर पंचायत के अध्यक्ष व सदस्य, जिला पंचायत के अध्यक्ष व सदस्य, सभी सरकारी विभागों व कंपनियां के अधिकारी व कर्मचारी।
क्या चाहिए लोकायुक्त को : भ्रष्टाचार व कुप्रशासन पर प्रभावी अंकुश के लिए लोकायुक्त प्रशासन के दायरे में मुख्यमंत्री, विवि के कुलपति, कुलसचिव व ग्राम प्रधान आदि भी हों। लोकायुक्त भ्रष्टाचार की मौखिक सूचना या जानकारी का स्वत: संज्ञान ले सकें। किसी भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी की संपत्ति, आवास या कार्यालय में तलाशी को वारंट जारी करने, अंतरिम प्रतिवेदन भेजने, जांच में राज्य या केंद्र की किसी अन्वेषण एजेंसी की सहायता लेने, जिला सतर्कता समिति गठित करने, जांच के दौरान निरीक्षण भी करने, किसी आरोपी के विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति की आवश्यकता न होने, जांच एजेंसी के कार्य का पर्यवेक्षण आदि करने का अधिकार भी लोकायुक्त प्रशासन के पास हो।

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