Saturday, April 16, 2011

अन्ना को थमाया झुनझुना बिना बेसिक बदले कुछ हासिल न होगा


भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए स्टिंग ऑपरेशन को बनाइए वैध
अकेले लोकपाल-लोकायुक्तों से ठीक नहीं हो सकती हद तक बिगड़ी व्यवस्था जनता को पग-पग पर परेशान करने वाले गंदे कानून हैं हमारे। भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन किये जाएं। अवैध आय स्रेत का खुलासा फ्रांस के जैसे अनिवार्य बने। गवाहों को पूरी तरह कानूनी संरक्षण दिया जाए। अन्ना के सदस्यों को कार्यपालिका के अनभुव नहीं।
अन्ना हजारे को बहुत अधिक खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए कि उन्होंने सरकार को झुका दिया और लोकपाल मुद्दे पर बड़ी जीत हासिल कर ली। मेरा भी पहला सवाल हजारेजी से यही है कि क्या बेसिक कानून बदले बिना सिर्फ लोकपाल के जरिये भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है ? मैं दूसरों की तरह नहीं कहता कि हमारे कानून अच्छे हैं लेकिन उनका ठीक से पालन नहीं कराया जा रहा। मेरा कहना है कि हमारे कानून गंदे हैं, जो कदम-कदम पर जनता को परेशान करते हैं। जन्म प्रमाण पत्र ही नहीं मृत्यु का प्रमाण पत्र भी मुश्किल से ही मिलता है। इनके लिए अकसर आम आदमी को सरकारी मुलाजिम की मुठ्ठी गर्म करनी पड़ जाती है। स्कूल में दाखिले का यही हाल है और अस्पताल में एक अदद बेड हासिल करने के लिए भी इसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अकेले लोकपाल और लोकायुक्तों के जरिये इस कदर बिगड़ चुकी व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया जा सकता। अन्ना हजारे ने जन लोकपाल विधेयक का जो मसौदा तैयार किया है, उसमें भी इन सवालों के कोई जवाब नहीं दिये हैं। मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि भ्रष्टाचार निरोधक जो कानून है, उसमें संशोधन किया जाए। इसमें होना यह चाहिए कि आय से अधिक सम्पत्ति जुटाने वाला व्यक्ति यह बताने के लिए मजबूर हो कि उसने इसे कहां से हासिल किया? इस तरह का कानून फ्रांस में है। उसे देखकर भारत के कानून में संशोधन किया जा सकता है। भ्रष्टाचारियों की लगाम कसने के लिए यह भी करना होगा कि गवाहों को कानून में पूरा संरक्षण दिया जाए। इसी परिप्रेक्ष्य में सरकार को स्टिंग ऑपरेशन की कानूनी इजाजत दे देनी चाहिए। चाहे उसे पत्रकार करें अथवा आम आदमी। सरकार की सोच यही होनी चाहिए कि जैसे भी हो, भ्रष्टाचार और गलत कामों का पर्दाफाश होना चाहिए। अभी इस मामले में सरकार का रवैया बेहद खराब है। तहलका के मामले में सरकार ने ठीक नहीं किया। तहलका ने भ्रष्टाचार में कौन- कौन और कैसे लिप्त रहता है, इसकी एक झलक भर दिखाई थी पर उसके ही खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया। कम से कम भ्रष्टाचारियों के चेहरे उजागर करने वालों के साथ तो ऐसा सलूक नहीं ही किया जाना चाहिए। स्टिंग ऑपरेशन की मैं इसलिए वकालत कर रहा हूं क्योंकि इसके जरिये ही संसद में रुपये लेकर सवाल पूछने वाले एक दर्जन सांसदों को घर भेजा जा सका है। स्टिंग ने ही एक राष्ट्रीय पार्टी के सांसद का चरित्र भी दिखाया जो एक छोटी रकम के लिए कैसे समझौता करने के लिए तैयार हो जाता है। अगर मुझसे पूछा जाए तो सरकार ने फौरी तौर पर अन्ना हजारे को सिर्फ एक झुनझुना भर थमाया है। अन्ना हजारे सरकार के आगे धोखा खा गये हैं। सरकार की इच्छाशक्ति भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कतई नहीं है। इस मामले में राजनीतिक दल भी अन्ना के साथ नहीं हैं क्योंकि उनकी भी भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कोई बहुत इच्छा नहीं दिखती। अन्ना हजारे ने अपनी समिति में जो सदस्य रखे हैं उनसे भी संतुष्ट नहीं हूं। इनमें तीन वकील तो ले लिए हैं पर किसी सदस्य को भ्रष्टाचार से लड़ने का कोई अनुभव नहीं है। लड़ने से मेरा आशय भ्रष्टाचार की तह तक जाने और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को जेल की सलाखों तक पहुंचने से है। अगर और स्पष्ट कहूं तो मेरा कहना है कि कानून को पालन कराने वाली कार्यपालिका का अनुभव रखने वाला कोई व्यक्ति इस समिति में नहीं है। मैं इसलिए इन बातों को कह सकता हूं क्योंकि मैंने सी.बी.आई. में रहते हुए भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को बेहद करीब से देखा है। मुझे उस चारा घोटाले का स्मरण है जिसमें आज 15 सालों बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला है।

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