Friday, April 8, 2011

क्यों शर्मसार नहीं करता भ्रष्टाचार


आजीवन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले अन्ना ने एक बार फिर अपने आमरण अनशन से देश की आत्मा को छू लिया है। उन्होंने लोगों में उम्मीद जगा दी है। केंद्र की की लाचारगी देखकर आश्चर्य होता है कि देश में इतना बड़ा घोटाला होने के बाद भी हीलाहवाली कर रही है। आखिर भ्रष्टाचार हमें क्यों शर्मसार नहीं करती? जिस दौर में पूरी दुनिया की तानाशाह व भ्रष्ट सरकारों के खिलाफ आंदोलन चल रहे हों भारत में इतनी शांति क्यों है? क्या हमने भ्रष्टाचार को अपना राष्ट्रीय स्वभाव बना लिया है। 2जी, राष्ट्रमंडल, आदर्श हाउसिंग घोटाले ने राजनीतिक नैतिकता के अलावा हमारी समझदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठा व्यक्ति भी कारगिल के शहीदों के खून के साथ दगाबाजी करे और सैनिकों की विधवाओं के लिए बने फ्लैट पर कब्जा करे तो आप क्या कहेंगे? जाहिर तौर पर हमें अब इन सवालों पर सोचने और इनसे दो-दो हाथ करने की जरूरत है। जैसा वातावरण बन चुका है क्या उसमें कोई राजनेता या राजनीतिक दल आगे से भ्रष्टाचार न करने की बात सोच सकता है। राजनीति में धनबल राजनीति में धन एक ऐसी आवश्यकता है जिसके बिना न तो पार्टियां चल सकती हैं और न चुनाव जीते जा सकते हैं। इसी से भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है। राष्ट्रीय संपत्ति की लूट और सरकारी संपत्ति को निजी संपत्ति में बदलने की कवायद की मूल जड़ यही जरूरत है। हर घटना के बाद हमारे पास बलि चढ़ाने के लिए एक मोहरा होता है जिसकी बलि देकर हम अपने पापों का प्रायश्चित कर लेते हैं। 2जी स्पेक्ट्रम के लिए ए. राजा, कॉमनवेल्थ के लिए कलमाड़ी और आदर्श सोसाइटी के लिए अशोक चह्वाण की बलि हो गई, किंतु क्या इससे कोई सुधार आया? राजनीति में आगे बढ़ने की एक बड़ी योग्यता भ्रष्टाचार करने की साम‌र्थ्य भी है। शहीदों के विधवाओं के फ्लैट निगल जाने का दुस्साहस हमें इस घटिया राजनीति का चरित्र बताने के लिए काफी है। राजनीतिज्ञों को लगता है कि भारतीय जनता की याददाश्त बहुत कमजोर है और वह कुछ गलत करेंगे तो भी उसे थोड़े समय बाद भुला दिया जाएगा। चुनावों के कई नतीजे यही बताते हैं। आप मुंबई हमलों की याद करें कि जिसके चलते महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव और केंद्रीय मंत्री शिवराज पाटिल को अपनी कुर्सियां गंवानी पड़ीं किंतु बाद में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इसलिए जनता को राजनीतिक तंत्र पर नियंत्रण रखने की विधि भी विकसित करनी होगी अन्यथा यह हमारे जनतंत्र को बेमानी बना देगा। हमें भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनने से रोकना होगा वरना हमारे पास उस खोखले जनतंत्र के अलावा कुछ नहीं बचेगा, जिसे राजनीति की दीमक चाट चुकी होगी। अब जबकि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रैंकिंग में भारत तीन पायदान फिसलकर 87वें स्थान पर जा पहुंचा है तो हमें यह सोचना होगा कि दुनिया में हमारा चेहरा कैसा बन रहा है? अध्ययन बताता है कॉमनवेल्थ खेलों ने हमारी भ्रष्ट छवि में और इजाफा किया है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के चेयरमैन पीएस बावा का कहना है कि भारत में कुशल प्रशासक होने के बावजूद गर्वनेंस का स्तर नहीं सुधरना चिंता और शर्म का विषय है। भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता विकास भ्रष्टाचार के चलते भारत का जैसा विकास होना चाहिए वह नहीं हुआ। इसका सबसे बड़ा शिकार वह तबका होता है जो सरकारी योजनाओं का लाभार्थी होता है। सरकार के जनहितकारी प्रयास इसीलिए जमीन पर उतरते नहीं दिखते। सार्वजनिक योजनाओं की लागत भ्रष्टाचार के कारण बढ़ती जाती है। तमाम कानूनों और प्रतिरोधक उपायों के बावजूद यह समस्या बढ़ती जा रही है। सूचना अधिकार कानून के बावजूद पारदर्शिता के सवाल पर हम काफी पिछड़े हुए हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए इस तरह की स्थितियां चिंताजनक है। क्या हम इसके समाधानों की ओर बढ़ नहीं सकते। यह सवाल सबके मन में है। आखिर क्या कारण है भ्रष्टाचार आज हमारे सामाजिक जीवन की एक अपरिहार्य जरूरत बन गया है। सवाल है क्या इसे बदला नहीं जा सकता। गरीबों को डसती भुखमरी जब अनाज गोदामों में भरा हो और भुखमरी गरीबों को डस रही हो तो लोक कल्याणकारी राज्य का क्या फायदा। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का 67वें स्थान पर रहना हमें चिंता में डालता है। इतना ही नहीं इस सूची में पाकिस्तान 52वें स्थान पर है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में तीसरे नंबर पर गिने जा रहे देश भारत का एक चेहरा यह भी है जो खासा निराशाजनक है। यह बताता है कि हमारे आधुनिक तंत्र की चमकीली प्रगति के बावजूद एक भारत ऐसा भी है जिसे अभी रोटियों के भी लाले हैं। भुखमरी में लड़ने में हम चीन और पाकिस्तान से भी पीछे हैं। हमें सोचना होगा कि आखिर हम कैसा भारत बना रहे हैं। तेजी से बढ़ती महंगाई और खाद्यान्न संकट के क्या कारण हैं? खासतौर पर गांवों, वनवासी क्षेत्रों में रहने वाले लोग इससे ज्यादा त्रस्त हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स को सामने रखते हुए हमें अपनी नीतियों, कार्यक्रम और जन वितरण प्रणाली को ज्यादा प्रभावी बनाने की जरूरत है। सरकार की इन्हीं नीतियों से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस देश में हजारों लोग भूखे मर रहे हों वहां अन्न के एक दाने की बर्बादी भी अपराध है। अब तक छह हजार टन से ज्यादा अनाज सड़ चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में अनाज सड़ाने के बजाय सरकार को इसे गरीबों और भूखे लोगों में बांट देना चाहिए। इसके लिए केंद्र हर प्रदेश में एक बड़ा गोदाम बनाने की व्यवस्था करे। जाहिर तौर पर देश की जमीनी स्थिति को अदालत समझ रही थी किंतु हमारी सरकार इस सवाल पर गंभीर नहीं दिखी। यहां तक कि हमारे कृषि मंत्री अदालत के आदेश को सुझाव समझने की भूल कर बैठे जिसके चलते अदालत को फिर कहना पड़ा कि यह आदेश है सलाह नहीं। कुपोषण की तस्वीर हमारी आंखें खोलने के लिए काफी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और तीन साल से कम के 47 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं। अनाज के कुप्रबंधन मामले में सरकार की विफलता सामने है और इसके चलते ही इस तरह के आंकड़े सामने आ रहे हैं। भ्रष्टाचार से लड़ाई यदि हमारे लोग भूखे हैं तो इस जनतंत्र के मायने क्या हैं? जाहिर तौर पर हमें ईमानदार कोशिश करने की जरूरत है। यदि ऐसा करने में हम विफल होते हैँ तो एक जनतंत्र के तौर पर हम दुनिया के सामने मानवीय और सामाजिक सवालों पर इसी तरह लांछित होते रहेंगे। महात्मा गांधी के देश में आम आदमी अगर व्यवस्था के केंद्र में नहीं है तो इसका विकल्प क्या हैं? जगह-जगह पैदा हो रहे असंतोष और लोकतंत्र के प्रति जनता में एक तरह का निराशाभाव इन्हीं कारणों से प्रबल हो रहा है। क्या हम अपने लोकतंत्र को वास्तविक जनतंत्र में बदलने के लिए आगे बढेंगे या इसी चौंधियाती हुई चमकीली प्रगति में अपने मूल सवालों को गंवा बैठेंगे? सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने के सारे प्रयास बेमानी साबित हुए हैं। भ्रष्टाचार नियंत्रण और जांच को लेकर बनी हमारी सभी एजेंसियों ने भी कोई उम्मीद नहीं जगाई है। ऐसे में भ्रष्टाचार के राक्षस से लड़ने का रास्ता सिर्फ यही है कि जनमन में जागृति आए और लोग संकल्पित हों। किंतु यह काम बहुत कठिन है। जनता के सामने विकल्प बहुत सीमित हैं। वह अपने स्तर पर बहुत कुछ नहीं कर सकती। किंतु एक जागृत समाज काफी कुछ कर सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है। अब जबकि अन्ना हजारे ने अपने संघर्ष से भ्रष्टाचार को एक राष्ट्रीय विषय बना दिया है तब केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह उनकी भावनाओं का आदर करते हुए पहल के लिए आगे आए। हमारे देश में लोकतंत्र है, लेकिन सही अर्थो में इसका अर्थ यही है कि हम देश के लोगों और उनकी भावना का आदर करें। अन्ना हजारे के अनशन पर सवाल उठाकर कांग्रेस स्वयं अपने खिलाफ वातावरण बना रही है। कांग्रेस को चाहिए कि वह समय की मांग को समझते हुए भ्रष्टाचार मिटाने के लिए प्रस्तावित जन लोकपाल बिल को पास करने के लिए सीधे जनता से संवाद करे और अपनी छवि को बचाने का प्रयास करे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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