राष्ट्रमंडल खेलों का पूरा भ्रष्टाचार क्या कांग्रेस आलाकमान की निगाह में आया था? तत्कालीन खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर की चिट्ठी तो यही साबित करती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने गुहार लगाकर परेशान हो चुके मणिशंकर ने उनके अतिरिक्त सचिव को पत्र में लिखा था कि अब वह मैडम यानी सोनिया गांधी के सामने पूरा ब्योरा रखेंगे और उसके बाद ही प्रधानमंत्री से बात करेंगे, लेकिन उनकी बात शायद मैडम के दरबार में भी नहीं सुनी गई, क्योंकि उन्हें 2008 में खेल मंत्रालय से रुखसत कर दिया गया। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध मणिशंकर के पत्र प्रमाण हैं कि घोटाला प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर दस जनपथ तक सबकी निगाह में था, मगर इस पर पर्दा डाला गया। पर्देदारी की यह परंपरा शुंगलू समिति ने भी निभाई। उसकी रिपोर्ट से यह संकेत तो मिलता है कि प्रधानमंत्री को मणिशंकर के पत्र शुंगलू की निगाह से गुजरे, लेकिन समिति ने रहस्यमय ढंग से इसे पूरे प्रसंग से किनारा कर लिया। अपनी पड़ताल में शुंगलू समिति पीएमओ की भूमिका को लेकर मौन है। कलमाड़ी की मनमानी और भ्रष्टाचार से परेशान मणिशंकर 2007 के आखिरी महीनों में पीएमओ पर चिट्ठियों की बारिश कर रहे थे, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। क्षुब्ध होकर उन्होंने 23 अक्टूबर 2007 को प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सचिव पुलक चटर्जी को लिखा कि गुरुवार 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री की बैठक से पहले मैं मैडम से मिलना चाहता हूं। उनसे चर्चा के बाद ही प्रधानमंत्री की बैठक में अपना नजरिया स्पष्ट करुंगा। मणि ने यह भी लिखा था कि उनके अधिकारी एक साल से पीएमओ और कैबिनेट सचिवालय को खेल तैयारियों में अनियमितताओं की जानकारी दे रहे हैं। उन्होंने 25 अक्टूबर 2007 की जिस बैठकका जिक्र किया है वह समीक्षा बैठक थी जिसे प्रधानमंत्री ने बुलाया था। पत्र यह भी बताता है कि खेलों का बजट 2007 के अंत में ही 20 हजार करोड़ रुपये से ऊपर निकल गया था। पत्र में लिखा है कि कलमाड़ी ने कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के माइक हूपर को ऊंची तनख्वाह पर सलाहकार रखा है। हूपर की भूमिका पर शुंगलू समिति ने भी नकारात्मक टिप्पणियां की हैं|
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